



भरत सिंह ओळा.
आज शहीद ए आजम भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव का शहादत दिवस है । आज सशरीर भगत सिंह हमारे बीच में नहीं हैं। उनको गए 94 साल हो गए लेकिन इन 94 सालों में एक भी दिन ऐसा नहीं निकला, जिस दिन भारतीय जनमानस ने किसी न किसी रूप में, किसी न किसी स्थान पर भगत सिंह को याद नहीं किया हो। उनके जन्मदिन और शहादत दिवस पर तो हम उनको औपचारिक रूप से याद करते हैं लेकिन वह कौन से कारण है, जिनकी बदौलत भगत सिंह हर एक बेरोजगार नौजवान, गरीब किसान और शोषित मजदूर को वक्त-बेवक्त याद आते रहते हैं।
यह स्थूल सी बात तो हर भारतीय जानता है कि भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनका पैतृक गांव खट्कड़ कलां है जो पंजाब, भारत में है। इस बात को भी सभी जानते हैं कि 23 साल की उम्र में भगत सिंह देश की आजादी के लिए फांसी के फंदे पर हंसते-हंसते झूल गए। यह सब जानकारियां किसी भारतवंशी को भगत सिंह के प्रति श्रद्धा और सम्मान से तो भर सकती हैं लेकिन इतने भर से भगत सिंह भारत के बहुत बड़े वर्ग को विशेष कर कमेरे वर्ग को बारम्बार याद नहीं आ सकते ? उनके बारंबार याद आने के पीछे कमेरे वर्ग के वे दोजख हैं जो आजादी के 78 वर्ष बाद भी उसे लीलने के लिए मुंह बाये खड़े हैं।

आज राजनेताओं से लेकर आम नागरिक तक भगत सिंह की शहादत को याद करते हुए श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहा है। किए भी जाने चाहिए लेकिन क्या प्रतिवर्ष इतना भर कर देने से भगत सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ? नही, बिल्कुल नहीं। यह महज एक रस्म अदायगी होगी। आज के इस क्रूर और सबसे भयावह समय में भगत सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि यह होगी कि हम भगत सिंह के बताए मार्ग पर चलें। उनके विचारों को फॉलो करें और उनके सपनों का भारत बनाने में अपनी भागीदारी निभाएं। भगत सिंह को सबसे अधिक उम्मीद नौजवानों से थी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज भी नौजवान भगत सिंह के प्रति पूरी श्रद्धा और सम्मान रखते हैं। लेकिन सिर्फ श्रद्धा और सम्मान रखने से क्या होगा ? जाति , धर्म और संप्रदाय की कट्टरता की तरफ बढ़ रहे भारत के लिए आज भगत सिंह के विचारों को आत्मसात करने की सबसे अधिक आवश्यकता है। नौजवानों को अगर भगत सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि देनी है, तो भगत सिंह के विचारों को आत्मसात करना ही होगा। भगत सिंह के सपनों के भारत का निर्माण करने के लिए उन्हें आगे आना ही होगा। राजनीतिक दलों से इसकी उम्मीद करना बेमानी है।

कहना न होगा कि आज भगत सिंह के सपनों का भारत छिन्न-भिन्न है। त्रस्त है। पस्त है। गुलामी के नए दौर में प्रवेश कर रहा है। धार्मिक कट्टरता और पाखंड बढ़ रहे हैं। आदमी आदमी के बीच जाति ,धर्म ,संप्रदाय की खाई खोदी जा रही है। नई पूंजीवादी आर्थिक नीति भगत सिंह के सपनों के भारत को खंड खंड कर रही है। भगत सिंह के सपनों का भारत अपने ही देश के लोगों की मार खाकर कर्राह रहा है। बेरोजगारी, महंगाई, अशिक्षा, लूट, धर्म के नाम पर पाखंड खुले रुप से तांडव कर रहा है। भगत सिंह के सपनों के भारत के विपरीत विचारों के कारण ही आज युवा दिग्भ्रमित है, किसान निराश है, कमेरे वर्ग का चहुंओर शोषण है। हिंसा और संवेदनहीनता दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। धर्म और राजनीति ने गठजोड़ कर लिया है। सरपंच से लेकर प्रधानमंत्री तक अविश्वास के घेरे में खड़े हैं। दो जून की रोटी के लिए लोग दिन-रात खप रहे हैं लेकिन ढंग का खाना नसीब नहीं हो रहा है। भगत सिंह की लड़ाई सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता के लिए थी। यही कारण है कि जनता को आज सत्ता परिवर्तन में रुचि नहीं है, बावजूद इसके चुनाव के वक्त उस पर गहरा चुनावी रंग चढ़ता है और वह जाति, धर्म ,संप्रदाय के फिरकों में उलझा अफीमची की तरह नाचता है। वह भूल जाता है कि इस तरह सत्ता परिवर्तन से उसका जीवन नहीं बदलने वाला है। अफसोस चुनाव के इस शोरगुल में भगत सिंह के सपनों के भारत की आवाज कहीं सुनाई नहीं दे रही है। बाजार और पूंजी के इस हो-हल्ले में भगत सिंह उदास और मौन खड़े हैं। क्या आज के नव युवकों को उनका मौन दिखाई नहीं देता ?
भगत सिंह हमारे आदर्श हैं, तो उन विचारों के कारण होना चाहिए जिसमें तपकर वे कुंदन बने लेकिन हत्भाग्य कि भगत सिंह के विचारों की दूर-दूर तक चर्चा नहीं है। उनके शौर्य और बलिदान के किस्से महज एक रस्म अदायगी के रूप में सुनाए जा रहे हैं। क्यों ? मध्यम वर्ग का एक बड़ा हिस्सा आत्मलीन है। मानसिक जड़ता अपने पूरे वजूद के साथ पांव जमाए बैठी है। निराश और हताश युवक राशिफल और भविष्यफल में उलझा हुआ है। वह किंकर्तव्यविमूढ़ है। साम्राज्यवादी ताकतें चाहती है कि जनता जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर आपस में लड़ती-झगड़ती रहे लेकिन आज का नौजवान इस बात से बेखबर है। वह धर्म-धर्म के नशे में आत्ममुग्ध हुआ डोल रहा है।

भगत सिंह का मानना था कि उनकी क्रांति पूंजीवाद, वर्गवाद और कुछ खास लोगों को विशेष अधिकार दिलाने वाली प्रणाली का अंत कर देगी लेकिन आजादी के 78 साल बाद भी क्या ऐसा हुआ ? भगत सिंह ने तो कहा था कि क्रांति की तब तक आवश्यकता है जब तक समाज में विषमता व्याप्त है ? क्या समाज से विषमता समाप्त हो गई ? अगर नहीं तो फिर युवा मौन क्यों बैठा है ? मतलब भगत सिंह सिर्फ नाम से याद किए जाते रहे हैं विचारों से नहीं।
कभी रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था-
जब तक मनुष्य मनुष्य का सुख भाग नहीं सम होगा।
शमित ना होगा कोलाहल संघर्ष नहीं कम होगा ।
किसने कहा महापाप है स्वत्व प्राप्ति हित लड़ना।
उठा न्याय का खंग समर में अभय मारना मरना ।
लेकिन मारे कौन ? नौजवान तो बेखबर है। आज किसी भी राजनीतिक दल के पास सर्वहारा वर्ग के लिए कोई सपना नहीं है। अगर दिखाया भी जाता है तो वह जानता है कि चुनाव के बाद उस सपने का कुछ बंटने वाला नहीं है। उसको उतना ही दिया जाएगा जिससे वह एक वोट के रूप में जिंदा रह सके और 5 साल बाद उसका उपयोग किया जा सके।
सर्वहारा वर्ग को ध्यान ही नहीं है कि उसे जाति और धर्म के खातों में बांटने की साजिश रची जा रही है। धर्म और पूंजी को शीर्ष पर रखने वाले लोग कभी भी कमेरे वर्ग के उत्थान की सोच नहीं रख सकते।

महज 23 साल की उम्र में भगत सिंह हमारे बीच से चले गए। उनका चले जाना एक देश भक्त का चले जाना नहीं है। उनकी मौत एक क्रांतिकारी की मौत नहीं है बल्कि उनकी मौत कमरे वर्ग के सपनों की मौत है। क्या हम भगत सिंह के सपनों के भारत को पुनर्जीवित करने का सपना देख सकते हैं ? अगर नहीं तो भगत सिंह जयंती या शहादत दिवस पर पुष्प अर्पित करना भी महज एक रस्म अदायगी है। इससे इस देश का कुछ भला होने वाला नहीं है ? अगर भगत सिंह के सपनों के भारत का निर्माण करना है, तो नौजवानों को भगत सिंह और उसके साथियों के संपूर्ण दस्तावेजों को पढ़ना होगा। विचारों की धार तीखी करके उसे अमलीजामा पहनाना होगा। जाति ,धर्म और संप्रदाय के खाचों से बाहर निकलना होगा। भगत सिंह ने कहा था-पढ़ो, आलोचना करो, सोचो और इतिहास की सहायता से अपने विचार बनाने का प्रयत्न करो। क्या नौजवान कभी भगत सिंह के इस वक्तव्य पर मनन करते हैं ? अगर हां तो फिर जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर यह इतना हो हल्ला क्यों है ? और अगर नहीं, तो फिर भगत सिंह के सपनों के भारत का निर्माण कैसे होगा ? शहीदे आजम भगत सिंह ने कहा था-इंकलाब की तलवार विचारों की शान पर तेज होती है। लाला राम शरण दास की पुस्तक ‘ड्रीमलैंड’ की भूमिका में भगत सिंह ने लिखा था-‘जिस समाज का हम निर्माण करना चाहते हैं, उसमें न गरीब होंगे, न जरूरतमंद। न दान देने वाले न दान लेने वाले।’ उन्होंने आगे लिखा था कि दिमागी काम करने वाला शारीरिक काम करने वाले से ऊंचा नहीं माना जाएगा। आज हालात हमारे सामने है। भगत सिंह के सपनों का भारत लहूलुहान पड़ा है और उसकी कोई सुध लेने वाला भी नहीं है। भगत सिंह ने कहा था त्र-जब तक काला-गोरा, सभ्य-असभ्य, शासक-शोषित, धनी-निर्धन, छूत- अछूत आदि शब्दों का प्रयोग होता रहेगा, तब तक कहां विश्व बंधुता और विश्व प्रेम संभव है। आप सोच सकते हैं कि भगत सिंह कैसे भारत का निर्माण चाहते थे ? वे देश को जाति धर्म और संप्रदाय के खाचों में ढला हुआ देखना नहीं चाहते थे। लेकिन आज इस देश में क्या हो रहा है ? भगत सिंह एक धर्मनिरपेक्ष भारत का निर्माण चाहते थे ? वे राजनीति और धर्म को अलग अलग रखना चाहते थे लेकिन आज दोनों का इतना गठजोड़ हो गया है कि मैं फिर कहूंगा कि भगत सिंह के सपनों का भारत एकदम से त्रस्त है। भगत सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम भगत सिंह के विचारों के साथ भगत सिंह के सपनों के भारत का निर्माण करने के लिए कटिबद्ध हो। प्रत्यक्ष अन्याय पर आधारित वर्तमान व्यवस्था में बदलाव हो। उत्पादन कर्ता समाज का आवश्यक हिस्सा बने। असमानताओं का अंत हो। निराशा और आक्रोश के साथ कहना पड़ रहा है कि राजनीतिक वामपंथी दल भी व्यवस्था बदलने की बजाय उसके हिस्सेदार बन गए। चंहुओर पूंजी का बोलबाला है। युवकों की ऊर्जा धर्म धर्म चिल्लाने में या रोजी रोटी का जुगाड़ करने में बर्बाद हो रही है। देश हित में सोचने की फुर्सत इस बेचारे को कहां ? जब युवकों में राजनैतिक चेतना विकसित होने की संभावना बढ़ने लगती है, तब शासक वर्ग शिक्षा को बदतर और पंगु बनाने की भरसक कोशिश करता है। छद्म राष्ट्रवाद और घद्म राष्ट्रभक्ति अलापने वाले क्या बताएंगे कि किसान, मजदूर और निम्न वर्ग के बेटों की यह हालत क्यों है ? उन्हें इस बात को समझ लेना चाहिए कि वह लंबे वक्त तक वे आपकी कोठियों और संपत्ति की रखवाली करने वाले नहीं है। एक दिन भगत सिंह उनके कान में जरूर कहेगा-सोए हुए शेरों उठो और जाति, धर्म , संप्रदाय, शोषण के खिलाफ बगावत खड़ी करो और भगत सिंह के सपनों के भारत का निर्माण करो। अगर वे भगत सिंह की इस आवाज को नहीं सुनते हैं तो चौक चौराहों पर लगी भगत सिंह की प्रतिमा एक दिन जरूर कह उठेगी-जिनके मन में कमेरे वर्ग के लिए पीड़ा नहीं है और जो भगत सिंह की क्रांति और शहादत का अर्थ नहीं समझते, वे इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए भगत सिंह की प्रतिमा पर फूलमाला न चढ़ाएं तो ही बेहतर है।
-लेखक सुविख्यात साहित्यकार हैं

