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राजस्थान में पंचायत समितियों और जिला परिषदों का कार्यकाल खत्म होने लगा है और सरकार ने साफ संकेत दे दिया है कि इस बार ‘स्टेटस को’ यानी पुरानी परंपरा ही चलेगी। सरपंचों को तो पहले की तरह प्रशासक बना दिया गया, पर प्रधान और जिला प्रमुखों की उम्मीदें धूप में रखे गुड़ की तरह पिघल गईं। सरकार ने उनका कार्यकाल नहीं बढ़ाया और साफ कहा कि प्रशासन का पहिया अफसरशाही ही घुमाएगी? पंचायत समितियों में एसडीएम और जिला परिषदों में कलेक्टर।
राजनीति में फैसले कभी खाली नहीं लिए जाते; हर निर्णय की जड़ में सत्ता का संतुलन, संगठन की रणनीति और आने वाले चुनावों का दबाव होता है। सरकार का यह कदम भी इसी राजनीतिक गणित से अलग नहीं। पहले सरपंचों का कार्यकाल बढ़ाकर उन्हें प्रशासक बनाया गया, यह सीधा-सीधा गांव स्तर पर नाराजगी रोकने का तरीका था, क्योंकि गांव के वोट सबसे संवेदनशील और तुरंत रिएक्ट करने वाले होते हैं। लेकिन पंचायत समितियों का मामला अलग है। यहां प्रधानों की मांगें तेज थीं, पर सरकार ने उन्हें ठंडा रखकर एक तरह का सिग्नल भी दिया, लोकतंत्र में पद जनता देती है, चाहने से नहीं मिलता।
सत्ता की चाल यहां और भी दिलचस्प है। एसडीएम और कलेक्टर को प्रशासक बनाने से अफसरशाही की पकड़ मजबूत होगी। चुनावों से पहले प्रशासनिक नियंत्रण पूरी तरह सरकार के हाथ में रहेगा। जिस राज्य में पंचायत चुनाव बड़े राजनीतिक संदेश भेजते हैं, वहां अफसरों को बीच में लाना सरकार के लिए एक सुरक्षित दांव है। यह कदम दिखाता है कि सरकार गांव से लेकर जिला स्तर तक माइक्रो-मैनेजमेंट मोड में है, और चाहती है कि चुनावी माहौल में किसी भी स्तर पर राजनीतिक सत्ता वैक्यूम न बने।
प्रधानों की नाराजगी अपने आप में कहानी है। वर्षों से अपनाई जा रही परंपरा के आधार पर वे भी प्रशासक बनने की उम्मीद में थे। कई दौर की बातचीत, मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार, सब बेअसर। सरकार ने यहां परंपरा का हवाला दिया, पर असल कारण यह है कि पंचायती समिति स्तर पर राजनीतिक नियंत्रण अगर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के हाथ में दे दिया जाता, तो चुनावों के पहले गैर-बेखौफ़ शक्ति केंद्र उभर सकते थे। अफसर उनके मुकाबले ज्यादा “मैनेजेबल” होते हैं। और राजनीति सदियों से यही कहती आई है, जब हालात संवेदनशील हों, तो कमान उन हाथों में दो जो सीधे सरकार के अधीन हों।
राज्य की 222 पंचायत समितियों में यह बदलाव लागू हो रहा है। 21 जिला परिषदों में भी कलेक्टर प्रशासक बनाए जाएंगे। प्रशासनिक तौर पर यह फैसला मजबूत दिखता है, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह एक सख्त संदेश है कि सत्ता का पहिया फिलहाल राजनीतिक पदाधिकारियों के बजाय प्रशासनिक ढांचे के माध्यम से चलेगा। पंचायत स्तर पर सरकार ने नरमी दिखाई थी, मगर ऊपरी दो पायदानों पर उसने कठोर रूट अपनाया है।
चुनाव नजदीक आते ही यह व्यवस्था सरकार को दो फायदे देगी। एक, प्रशासन पर सीधा नियंत्रण; दूसरा, सत्ता विरोधी स्थानीय समूहों को सीमित करना। राजस्थान की पंचायत राजनीति कभी भी केवल विकास का मंच नहीं रही; यह हमेशा बड़े राजनीतिक समीकरणों की प्रयोगशाला रही है। इस फैसले ने आने वाले महीनों का माहौल पहले ही सेट कर दिया है, सरकार मैदान अपने तरीके से तैयार कर रही है, और विपक्ष अब देखे कि इस बदली हुई पिच पर खेलना कैसे है।




