



गोपाल झा.
हनुमानगढ़ जिले का टिब्बी इलाका। आज उस मोड़ पर खड़ा है, जहां शोर कुछ कम है, लेकिन बेचैनी कहीं ज्यादा। आंदोलन खत्म नहीं हुआ है, वह बस अपने शब्द बदल रहा है। सड़कों पर भीड़ कम है, नारे धीमे हैं, लेकिन किसानों के मन में उठा सवाल अब भी उतना ही तीखा है, आखिर फैसला कब होगा? प्रशासन के आश्वासन ने माहौल को एक पल के लिए ठंडा जरूर किया है, पर यह ठंडक वैसी ही है जैसी गर्म तवे पर पानी की बूंद गिरने से होती है, कुछ क्षणों की राहत, फिर वही तपन।
जिला प्रशासन के पास ‘समाधान’ नहीं है, सिवाय कानून व्यवस्था बनाए रखने के। लिहाजा, प्रशासन ने उच्चाधिकारियों की मौजूदगी में ‘गेंद’ सरकार के पाले में डाल दिया है, यह लिखकर कि ‘लोकहित’ में उचित निर्णय लिया जाए। यही लोकतंत्र का तकाजा भी है। लोकहित सर्वोपरि। किसान चाहते हैं, एथनॉल प्लांट को लेकर किया गया समझौता रद्द किया जाए और आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज किए गए मुकदमे वापस लिए जाएं। बात सीधी है, मांग भी स्पष्ट है। लेकिन इसी स्पष्टता के बीच एक बड़ा खालीपन है, समय। न प्रशासन ने कोई समय-सीमा तय की है, क्योंकि यह उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं, और न ही सरकार की ओर से यह कहा गया है कि फलां तारीख तक निर्णय हो जाएगा। यह अनिश्चितता ही आंदोलन की असली खाद बन गई है।
किसानों ने इस अनिश्चितता को अपनी भाषा में जवाब दिया है। उन्होंने अपना फरमान सुना दिया है। अगर 6 जनवरी तक कोई फैसला नहीं हुआ, तो 7 जनवरी को संगरिया में महापंचायत होगी। यह तारीख अब कैलेंडर का एक साधारण पन्ना नहीं रही। यह उम्मीद और आक्रोश के बीच खिंची एक मोटी लकीर बन चुकी है। तैयारियां चल रही हैं, बैठकें हो रही हैं और संकेत साफ हैं कि यह आंदोलन यहीं रुकने वाला नहीं। माना जा रहा है कि इसके बाद संयुक्त किसान मोर्चा जिले की तहसीलों से निकलकर दूसरे जिलों की ओर कूच कर सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में राजनीति भी अपने रंग दिखा रही है, लेकिन इस बार कुछ बदले हुए अंदाज में। संयुक्त किसान मोर्चा को माकपा और कांग्रेस का समर्थन मिल चुका है। 17 दिसंबर को जंक्शन धान मंडी में हुई महापंचायत में यह समर्थन साफ नजर आया। कांग्रेस विधायक अभिमन्यु पूनिया, जिलाध्यक्ष मनीष मक्कासर और कई नेता भीड़ का हिस्सा बने। वे मंच पर सिर्फ भाषण के वक्त दिखे, बाकी क्षण वे आम किसानों के बीच मंच के नीचे नजर आए। हां, माकपा नेता और पूर्व विधायक बलवान पूनिया जरूर पूरे कार्यक्रम में मंच पर मौजूद दिखे, मानो आंदोलन की परिणति और सियासी भविष्य का आकलन कर रहे हों।
लेकिन राजनीति की सबसे दिलचस्प पंक्ति मंच पर नहीं, मंच तक पहुंचने के रास्ते में लिखी गई। जब कांग्रेस के विधायक और नेता वहां पहुंचे, तो उनके हाथों में पार्टी का झंडा नहीं था। वे संयुक्त किसान मोर्चा का झंडा थामे हुए थे। यह एक खामोश लेकिन गहरा संकेत था। कांग्रेस इस मसले पर अपनी पहचान आगे नहीं रखना चाहती, वह किसानों के पीछे खड़ी दिखना चाहती है, आगे नहीं। संदेश साफ है, यह लड़ाई किसानों की है, राजनीति की नहीं, कम से कम दिखावे में तो नहीं।
उधर, प्रशासन और पुलिस दो दिनों से राहत की सांस लेते नजर आ रहे हैं। लंबे समय से छिनी हुई चैन जैसे लौट आई हो। थानों में सामान्य कामकाज शुरू हो गया है। पुलिस अधिकारी और कर्मचारी उन फाइलों को निपटाने में जुट गए हैं, जो आंदोलन के शोर में दब गई थीं। यह शांति प्रशासन के लिए सुकून हो सकती है, लेकिन सवाल अब भी हवा में तैर रहा है, यह शांति कब तक?
सूत्र बताते हैं कि राज्य सरकार ने अब इस मामले की गंभीरता को समझने की कोशिश शुरू की है। सत्तापक्ष के नेताओं से फीडबैक लिया जा रहा है। कागजों पर नहीं, तराजू पर पूरा मामला तौला जा रहा है, कहां फायदा है, कहां नुकसान। किसानों की नाराजगी कितनी भारी है और उद्योग का सपना कितना कीमती। यही सियासी गणित अब फैसले की दिशा तय करेगा।
इस पूरे दृश्य में एक बात साफ है। यह विवाद अब केवल एक एथनॉल प्लांट का नहीं रहा। यह भरोसे, समय और संवाद की परीक्षा बन चुका है। सरकार अगर समय रहते फैसला करती है, तो यह आंदोलन एक उदाहरण बन सकता है कि संवाद से टकराव टल सकता है। अगर फैसला टलता रहा, तो यह खामोशी फिर शोर बनेगी, और शायद पहले से ज्यादा तेज।
कहना न होगा कि हनुमानगढ़ आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां से दो ही रास्ते निकलते हैं, या तो समाधान की ओर, या संघर्ष के विस्तार की ओर। सरकार का फैसला ही तय करेगा कि इतिहास इसे समझदारी का अध्याय मानेगा या एक और चूके हुए अवसर की कहानी।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं




