


ग्राम सेतु डेस्क.
सियासत में बड़बोलापन अक्सर नुकसान नहीं, बल्कि कई बार फायदे का सौदा साबित होता है। तीखे बयान, ऊँची आवाज़ और आक्रामक तेवर। इनसे नेता अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं और समर्थकों की तालियाँ बटोर लेते हैं। लेकिन अफ़सरशाही के लिए यही बड़बोलापन हमेशा से वर्जित माना गया है। अफ़सरों को संयम, मर्यादा और शब्दों की नाप-तौल सिखाई जाती है। ऐसे में जब कोई शीर्ष अधिकारी खुद बड़बोलेपन का प्रतीक बन जाए, तो चर्चा होना तय है। इन दिनों सिंचाई विभाग के चीफ इंजीनियर प्रदीप रुस्तगी इसी वजह से सुर्खियों में हैं।
हाल ही में चीफ इंजीनियर प्रदीप रुस्तगी और हनुमानगढ़ विधायक गणेशराज बंसल के बीच फोन पर हुई तीखी नोंकझोंक ने स्थानीय राजनीति में हलचल मचा दी। मामला सार्वजनिक होते ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। चीफ इंजीनियर ने विधायक पर धमकाने का आरोप लगाया, जबकि विधायक ने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया। विधायक का कहना था कि चीफ इंजीनियर का व्यवहार अलोकतांत्रिक है और उन्हें जनप्रतिनिधियों से बात करने का सलीका तक नहीं आता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह का रवैया बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
यह विवाद यहीं नहीं रुका। बाद में चीफ इंजीनियर ने अपने अधीनस्थ इंजीनियर्स और कर्मचारियों के ज़रिये विधायक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। धरने और प्रदर्शन के माध्यम से विधायक पर माफी मांगने का दबाव बनाया गया। हालांकि यह रणनीति पूरी तरह नाकाम रही। न विधायक झुके, न राजनीतिक समीकरण बदले। उलटे, सूत्रों का कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम पर सरकार की नाराज़गी चीफ इंजीनियर तक पहुँची और उन्हें फटकार भी लगी। नतीजतन, आंदोलन को स्थगित करना पड़ा। विवाद औपचारिक रूप से खत्म नहीं हुआ, लेकिन शोर जरूर थम गया। इसके बावजूद चीफ इंजीनियर के व्यवहार को लेकर चर्चाएं सियासी फ़िज़ा में आज भी तैर रही हैं।
दरअसल, यह पहला मौका नहीं है जब चीफ इंजीनियर अपने आचरण को लेकर चर्चा में आए हों। सिंचाई विभाग के भीतर उनके बड़बोलेपन और अजीबोगरीब हरकतों के किस्से आम हैं। विभाग के एक अधिकारी बताते हैं, ‘चीफ साब की हरकतों से कभी-कभी यकीन ही नहीं होता कि वे इतने बड़े पद पर बैठे हैं।’ अफ़सरों और कर्मचारियों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा उस आदत की होती है, जब कार्यालय परिसर में कोई वाहन गलत जगह खड़ा हो जाए तो चीफ साब कथित तौर पर ‘सुआ’ चुभोकर टायर की हवा निकाल देते हैं। अफ़सरशाही में यह तरीका अनुशासन से ज्यादा सनक का प्रतीक माना जाता है।
मैदानी निरीक्षण के दौरान भी उनके तेवर अक्सर विवाद की वजह बन जाते हैं। एक घटना घग्घर बहाव क्षेत्र की बताई जाती है। जब वहां पानी की आवक बढ़ी तो चीफ इंजीनियर निरीक्षण के लिए पहुँचे। बहाव क्षेत्र में झाड़ियां देखकर वे आपा खो बैठे और संबंधित इंजीनियर को गाली तक दे डाली। मौके पर मौजूद इंजीनियर ने साहस जुटाकर उन्हें टोका, ‘साब, गाली मत निकालो।’ इसके बाद कहीं जाकर वे थोड़े संयत हुए। लेकिन यह घटना विभाग में लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रही।
किसानों के साथ उनके व्यवहार को लेकर भी कई किस्से मशहूर हैं। एक बार कुछ किसान अपनी फसल के लिए पानी की मांग कर रहे थे। किसानों ने बताया कि सिंचाई पानी के अभाव में फसलें झुलसने लगी हैं। इस पर चीफ इंजीनियर ने तपाक से कह दिया, किससे पूछकर फसल की बिजाई की थी? हमने उस फसल को बोने के लिए आपको पीला चावल दिया था क्या?’ यह तंज किसानों को इतना नागवार गुजरा कि वे सीधे उनके दफ्तर पहुँचे और टेबल पर पीला चावल फेंकते हुए बोले, ‘पीला चावल भी दे दिया, अब पानी दो।’ यह दृश्य विभाग के गलियारों में लंबे समय तक किस्सों के रूप में दोहराया जाता रहा।
आज हालत यह है कि सिंचाई विभाग के लगभग हर दफ्तर में चीफ इंजीनियर के बड़बोलेपन के किस्से सुनाई दे रहे हैं। कोई इसे अफ़सरी का रौब बताता है, तो कोई ‘संस्कारों’ की कमी। सवाल यह नहीं है कि अधिकारी सख्त हो या नरम, सवाल यह है कि सत्ता और पद के साथ संयम है या नहीं। लोकतंत्र में एक रिटायर्ड अधिकारी कहते हैं, ‘जनप्रतिनिधि और अधिकारी दोनों की भूमिका तय है। जब शब्द मर्यादा लांघते हैं, तो विवाद पैदा होता है और काम की जगह टकराव हावी हो जाता है।’
फिलहाल विवाद शांत है, लेकिन ‘चीफ साब’ के किस्से सियासी और अफ़सरी गलियारों में अब भी तैर रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में यह बड़बोलापन सबक बनेगा या फिर किसी नए विवाद की भूमिका।




