




तुलसी देमीवाल
आज का भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। सड़कें, मेट्रो, मोबाइल और इंटरनेट यह दिखाते हैं कि देश विकास की राह पर है। लेकिन इस चमक के बीच एक शब्द हर जगह सुनाई देता है, गाँव की गलियों में, चाय की टपरी पर और मेट्रो स्टेशन पर, वह शब्द है बेरोज़गारी। हैरानी की बात यह है कि आज की बेरोज़गारी वैसी नहीं है जैसी 20-30 साल पहले थी।
पहले लोग ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते थे। तब शिक्षा की कमी को बेरोज़गारी का मुख्य कारण माना जाता था। लेकिन आज स्थिति बिल्कुल अलग है। आज इंजीनियर, वकील, पीएच.डी. डिग्रीधारी युवा भी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी के लिए परीक्षा देने को मजबूर हैं। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब शिक्षा का स्तर बढ़ा है, तो बेरोज़गारी क्यों बढ़ रही है?
एक समय में कहा जाता था, ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब।’ उस दौर में डिग्री मिलते ही नौकरी की उम्मीद बन जाती थी। लेकिन आज यह कहावत कमजोर पड़ गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह हमारी शिक्षा प्रणाली है, जो आज भी काफी हद तक पुराने ढर्रे पर चल रही है। हम आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल टेक्नोलॉजी और तेज़ी से बदलती दुनिया में जी रहे हैं, लेकिन हमारी पढ़ाई अब भी किताबों और रटने तक सीमित है।
आज के युवाओं के पास डिग्री तो है, लेकिन वह कौशल नहीं है जिसकी आज के समय में ज़रूरत है। आज सिर्फ मेहनत करना काफी नहीं, बल्कि स्मार्ट तरीके से काम करना ज़रूरी है। कंपनियाँ और संस्थान यह नहीं देखते कि आपने कितनी डिग्रियाँ ली हैं, बल्कि यह देखते हैं कि आप काम को कितनी अच्छी तरह कर सकते हैं। खुद को समय के साथ अपडेट करना और नई चीज़ें सीखते रहना अब अनिवार्य हो गया है।
आज की बेरोज़गारी उन लोगों में ज़्यादा दिखाई देती है जो सिर्फ डिग्री के भरोसे बैठे हैं। वे मान लेते हैं कि पढ़ाई पूरी होते ही नौकरी मिल जाएगी। लेकिन आज ऐसा नहीं है। बेरोज़गारी से लड़ने के लिए सबसे पहले सोच बदलनी होगी। जो पढ़ा है, वही काफी नहीं; हर दिन कुछ नया सीखना होगाकृजैसे डिजिटल स्किल्स, कंप्यूटर ज्ञान, कम्युनिकेशन और किसी खास क्षेत्र में महारत।
यह भी समझना ज़रूरी है कि सिर्फ सरकारी नौकरी ही जीवन का लक्ष्य नहीं होनी चाहिए। प्राइवेट सेक्टर में भी अच्छे अवसर हैं, बशर्ते व्यक्ति अपने काम में निपुण हो। आज रोज़गार वहीं है जहाँ काम करने की क्षमता है।
इस पूरी स्थिति में स्कूलों और कॉलेजों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है। शिक्षा संस्थानों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान, प्रशिक्षण और वास्तविक जीवन से जुड़े अनुभव देने की ज़रूरत है, ताकि वे पढ़ाई के बाद सीधे काम के योग्य बन सकें।
बेरोज़गारी केवल आर्थिक समस्या नहीं है, यह मानसिक समस्या भी है। इससे तनाव, निराशा और आत्मविश्वास की कमी पैदा होती है। दुनिया बदल रही है और काम करने के तरीके भी बदल रहे हैं। बेरोज़गारी तभी कम होगी जब युवा यह कहे, ‘मुझे नौकरी चाहिए’ नहीं, बल्कि ‘मुझे काम आता है और मैं काम करना चाहता हूँ।’ यही सोच आने वाले समय में भारत को मज़बूत बनाएगी।
-एलएलबी स्टूडेंट, एसकेडीयू हनुमानगढ़





