



ग्राम सेतु ब्यूरो.
हनुमानगढ़ जिले के टिब्बी क्षेत्र में प्रस्तावित एथनॉल फैक्ट्री के खिलाफ चल रहा किसान आंदोलन एक बार फिर सीधे टकराव की दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है। डेढ़ साल से शांतिपूर्ण ढंग से चल रहे इस आंदोलन ने अब निर्णायक मोड़ ले लिया है। तलवाड़ा स्थित गुरुद्वारा सिंह सभा में आयोजित प्रेस वार्ता में किसान नेताओं ने 11 फरवरी को होने वाली विशाल महापंचायत को संघर्ष का अगला चरण बताते हुए ‘आर-पार की लड़ाई’ का ऐलान कर दिया।
किसान नेताओं का कहना है कि अब तक प्रशासन को कई बार ज्ञापन दिए गए, वार्ताएं की गईं और शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए गए, लेकिन हर बार किसानों की आशंकाओं को नजरअंदाज किया गया। किसान नेता मंगेज चौधरी ने प्रशासन पर आरोप लगाया कि वह लगातार किसानों को भ्रमित कर रहा है। रेलवे ट्रैक पर खाना बनाने जैसे उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आंदोलन पूरी तरह संगठित और अनुशासित है, इसके बावजूद सरकार सच्चाई स्वीकार करने से बच रही है।
यह बयान साफ संकेत देता है कि किसानों को अब सरकार की नीयत पर भरोसा नहीं रहा। शांतिपूर्ण आंदोलन को कमजोर समझने की भूल, प्रशासन को भारी पड़ सकती है।
किसान नेता जगजीत सिंह जग्गी ने दावा किया कि 11 फरवरी की महापंचायत में हजारों किसान और ग्रामीण जुटेंगे। हालांकि इस महापंचायत की अहमियत केवल भीड़ में नहीं, बल्कि उसके संदेश में है। जग्गी के अनुसार यह आंदोलन किसी एक फैक्ट्री के विरोध तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे इलाके के भविष्य की लड़ाई है। जल, जमीन और पर्यावरण, तीनों को खतरे में डालने वाली किसी भी परियोजना को किसान स्वीकार नहीं करेंगे। यह बात आंदोलन को स्थानीय से व्यापक सामाजिक मुद्दे में बदल देती है, जहां सवाल सिर्फ विकास का नहीं, बल्कि टिकाऊ और संतुलित विकास का है।
महंगा सिद्धू ने प्रशासन पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि किसानों की सहनशक्ति की परीक्षा ली जा रही है। डेढ़ साल का लंबा समय अपने आप में बताता है कि किसान जल्दबाजी में नहीं, बल्कि मजबूरी में आंदोलन को तेज करने जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि दमन की नीति जारी रही तो आंदोलन शांत नहीं रहेगा और इसके परिणामों की जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
एडवोकेट रघुवीर वर्मा का बयान भी इसी दिशा में जाता है। उनका कहना है कि अब रोज-रोज की महापंचायतों का दौर खत्म हो चुका है और किसान सीधे मुकाबले के मूड में हैं। 11 फरवरी के बाद आंदोलन की दिशा और स्वरूप और स्पष्ट होगा।
किसानों का आरोप है कि एथनॉल फैक्ट्री से प्रदूषण फैलेगा, भूमिगत जल पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। टिब्बी और आसपास के इलाके पहले ही जल संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में पानी पर निर्भर एक बड़ी औद्योगिक परियोजना किसानों की आजीविका और आमजन के जीवन के लिए खतरा बन सकती है।
संदीप कंग ने ने स्पष्ट किया कि यह संघर्ष किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि किसान अस्तित्व की रक्षा के लिए है। यह बयान आंदोलन को राजनीतिक रंग से दूर रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
किसान नेताओं ने अंत में प्रशासन से अपील की कि वह दमन और भ्रम की नीति छोड़कर किसानों की मांगों पर गंभीरता से विचार करे। साथ ही यह चेतावनी भी दी कि यदि 11 फरवरी के बाद भी समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन को प्रदेश स्तर तक फैलाया जाएगा।
कुल मिलाकर, हनुमानगढ़ का यह किसान आंदोलन अब निर्णायक बिंदु पर खड़ा है। एक तरफ सरकार औद्योगिक विकास को आगे बढ़ाना चाहती है, और दूसरी तरफ किसान अपने जल, जमीन और पर्यावरण को बचाने के लिए आखिरी लड़ाई की बात कर रहे हैं। अब देखना यह है कि 11 फरवरी की महापंचायत संवाद का रास्ता खोलती है या टकराव को और गहरा करती है।




