




ग्राम सेतु ब्यूरो.
होली पर्व को लेकर इस बार तिथियों, होलिका दहन और चंद्र ग्रहण के कारण लोगों के मन में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। कहीं 3 मार्च तो कहीं 4 मार्च को होली मनाने की चर्चाएं हो रही हैं। ऐसे में ‘graamsetu.com’ पाठकों की शंकाओं का समाधान करते हुए फाल्गुन पूर्णिमा से जुड़े सभी धार्मिक पहलुओं, होलिका दहन के शुभ मुहूर्त, ग्रहण व सूतक काल के नियम, पूजन सामग्री और राशि अनुसार आहुति विधान की प्रामाणिक जानकारी प्रस्तुत कर रहा है, जो प्रतिभा नगर, चूरू के विख्यात महाकाली-महाकाल उपासक पंडित रतनलाल जोशी (खांडल) द्वारा बताई गई है।
पंडित रतनलाल जोशी के अनुसार, फाल्गुन मास की पावन पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला होली पर्व आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है। इस वर्ष फाल्गुन शुक्ल एकादशी, 27 फरवरी 2026, शुक्रवार को प्रातः 11 बजकर 30 मिनट से पूर्व ढाल-तलवार, गर एवं होलिका स्थापना का शुभ मुहूर्त रहेगा। तदुपरांत भद्रा है। श्रद्धालु इस दिन विधि-विधान से होलिका, सूर्य, चंद्र, तलवार आदि गाय के गोबर से निर्मित कर सकते हैं।
फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी, 2 मार्च 2026, सोमवार को सायं 5 बजकर 56 मिनट तक जेलमाला पिरोकर पूजन का विशेष समय रहेगा। इस दौरान निर्धारित काल में धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे। इसके बाद 3 मार्च सुबह 5 बजकर 29 मिनट तक भद्रा काल रहेगा। होलिका दहन फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा की मध्यरात्रि में, 2 मार्च सोमवार से 3 मार्च मंगलवार के मध्य, प्रातः 5 बजकर 30 मिनट से 5 बजकर 45 मिनट के बीच शुभ मुहूर्त में किया जाना श्रेयस्कर है।
इसी दिन चंद्र ग्रहण भी रहेगा। ग्रहण का छाया प्रवेश दोपहर 3 बजकर 20 मिनट पर, सम्मिलन 4 बजकर 35 मिनट, मध्यकाल 5 बजकर 33 मिनट तथा मोक्ष सायं 6 बजकर 47 मिनट पर होगा। सूतक काल प्रातः 6 बजकर 35 मिनट से प्रारंभ हो जाएगा। सूतक अवधि में मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे तथा पूजा-अर्चना स्थगित रहेगी।
होलिका पूजन में सामान्यतः रोली, मौली,कच्चा सूत, अक्षत, हल्दी की गांठ, गुलाल, साबुत मूंग या गेहूं की बालियां, नारियल,पान, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, दीपक, कपूर, गंगाजल, मिठाई या गुड़, नई फसल के दाने, पंचमेवा आदि का प्रयोग किया जाता है। पूजन के समय होलिका के चारों ओर कच्चा सूत सात अथवा ग्यारह बार लपेटा जाना चाहिए। जल, रोली, अक्षत अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। नई फसल की बालियां अग्नि में अर्पित कर अच्छी पैदावार का आशीर्वाद मांगा जाता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अपनी राशि के अनुरूप विशेष सामग्री अग्नि में अर्पित करने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश और सकारात्मक फल की प्राप्ति होती है। इसमें मेष राशि के जातक गुड़ और गेहूं, वृषभ के मिश्री और सफेद तिल, मिथुन के हरी मूंग और इलायची, कर्क के चावल और शुद्ध घी सिंह राशि वाले गुड़ और नारियल, कन्या के साबुत मूंग और कपूर, तुला वाले सफेद वस्त्र का छोटा टुकड़ा एवं मिश्री, वृश्चिक राशि वाले लाल चंदन और गुड़, धनु वाले पीली दाल और हल्दी, मकर राशि के व्यक्ति तिल और खोपरा, कुंभ राशि वाले सरसों और तिल तथा मीन राशि वाले चना दाल और घी डालकर आहुति देते समय परिवार की उन्नति, स्वास्थ्य और सुख-शांति की प्रार्थना करें। मान्यता है कि इससे कष्टों का निवारण होता है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है।
धर्माचार्यों का कहना है कि होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। भक्त प्रह्लाद की भक्ति और आस्था की याद में यह पर्व मनाया जाता है। अतः श्रद्धालु विधि-विधान, शुद्धता और संयम के साथ पूजन करें। ग्रहण और सुतक काल के नियमों का पालन करते हुए पर्व को शांतिपूर्ण और श्रद्धापूर्वक मनाएं।







