




डॉ. विजय गर्ग
पंजाब की धरती पर जब बसंत ढलने लगता है और खेतों में गेहूं की सुनहरी बालियाँ हवा के संग झूमती हैं, तो यह केवल एक सुंदर दृश्य नहीं होता, यह किसान के पूरे साल की तपस्या का उत्सव होता है। गेहूं यहां सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और पहचान का हिस्सा है। रोटी से लेकर रीति-रिवाज तक, हर जगह गेहूं की मौजूदगी बताती है कि यह फसल हमारी जीवनशैली में कितनी गहराई से रची-बसी है।
प्राचीन दौर में गेहूं की खेती पूरी तरह परंपरागत थी, कम साधन, ज्यादा श्रम और दिल से किया गया काम। लकड़ी के हल, बैलों की जोड़ी और किसान के मजबूत हाथ, यही उस समय की मशीनें थीं। बीज हाथ से बोए जाते थे, पानी नहरों और कुओं से आता था, और कटाई के समय पूरा परिवार खेत में जुट जाता था।
कटाई केवल काम नहीं, सामूहिकता का पर्व होती थी। गांव के लोग कतारों में खड़े होकर दांती से फसल काटते, ‘भरी’ बांधते और बैलों से गहाई कर अनाज अलग करते। इसमें समय लगता था, पसीना बहता था, लेकिन साथ ही रिश्ते मजबूत होते थे। खेती साझेदारी की सीख देती थी, आज का काम, सबका काम।
1960 के दशक में आई हरित क्रांति ने पंजाब की खेती की दिशा बदल दी। नई किस्मों, बेहतर सिंचाई और वैज्ञानिक तरीकों ने उत्पादन को कई गुना बढ़ा दिया। जिस देश में कभी खाद्यान्न की कमी चिंता का विषय थी, वहां अनाज के भंडार भरने लगे।
इस बदलाव का सबसे बड़ा श्रेय किसान की स्वीकार्यता और मेहनत को जाता है। नई तकनीक अपनाना आसान नहीं था, लेकिन किसान ने जोखिम उठाया और देश को खाद्य सुरक्षा की मजबूत नींव मिली। गेहूं सचमुच ‘सोना’ बन गया, जिसने खेतों के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी चमक दी।
आज खेती का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है। ट्रैक्टर, सीड ड्रिल, सुपर सीडर और कंबाइन हार्वेस्टर ने समय और श्रम दोनों बचाए हैं। जहां पहले कटाई और गहाई में महीनों लगते थे, वहीं अब कंबाइन कुछ ही समय में खेत साफ कर देती है।
पराली प्रबंधन के लिए आधुनिक मशीनें जलाने की मजबूरी को कम कर रही हैं, और ड्रोन के जरिए खाद व कीटनाशकों का छिड़काव नई संभावना बन चुका है। उत्पादन बढ़ा है, काम आसान हुआ है, लेकिन रफ्तार के साथ खर्च भी बढ़ा है। छोटे किसानों के लिए महंगी मशीनें अब भी चुनौती हैं।
प्रगति के साथ चुनौतियाँ भी आई हैं। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर असर डाला है। लागत बढ़ी है, निर्भरता बढ़ी है, और खेती का जोखिम भी।
आज जरूरत है संतुलन कीकृजहां मशीनें सुविधा दें, वहीं जैविक और पारंपरिक तरीकों से मिट्टी की सेहत संभाली जाए। फसल चक्र, जैविक खाद, जल संरक्षण और सामुदायिक सहयोगकृये पुराने सबक आज भी उतने ही काम के हैं।
अंततः, सुनहरे गेहूं की यह कहानी हमें सिखाती है कि बदलाव जरूरी है, लेकिन जड़ों से कटकर नहीं। परंपरा की समझ और तकनीक की ताकत दोनों साथ चलें, तभी खेती टिकाऊ बनेगी और किसान का भविष्य सचमुच सुनहरा होगा।







