




डॉ. भरत ओला
11 अप्रैल को महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती है। इस दिन देश में महात्मा ज्योतिबा फुले को किसी न किसी माध्यम से याद किया जाएगा। कभी-कभी लगता है कि आपाधापी और भागम भाग के इस युग में महापुरुषों की जयंती एक रस्म अदायगी बनकर रह गई है। धर्म के रंग में रंगा आज का युवा या तो महापुरुषों के विचार जानने की कोफ्त ही नहीं उठाता और अगर जानना भी चाहता है तो बहुत से ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से वह चाहते हुए भी उनके मर्म तक नहीं पहुंच पाता। इसके पीछे एक नहीं बल्कि अनेक कारण हैं। एक तो इन वर्षों में धर्म इतने चरम पर है कि युवा धर्म का वास्तविक अर्थ ही भूल गया है। दूसरा बेरोजगारी और अर्थ के दबाव ने आज के युवक से महापुरुषों के विचारों को जानने-समझने का मौका छीन-सा लिया है।

वैसे तो किसी भी महापुरुष के विचारों की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होती है लेकिन वर्तमान के जाति भरे दौर में महात्मा ज्योतिबा फुले सरीखे महापुरुषों के विचार बारंबार याद आते हैं। स्थूल रूप से हम जानते हैं कि 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र में जन्मे महात्मा ज्योतिबा फुले एक महान विचारक, समाज सुधारक, लेखक और शिक्षाविद् थे। लेकिन कुछ पलों के लिए सोच कर देखिए कि महात्मा ज्योतिबा फुले ने उस वक्त सामाजिक असमानता, जातिवाद और महिलाओं के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई, जब भारत की अधिकांश जनता इस बारे में अनभिज्ञ थी, अशिक्षित थी। हालांकि उनकी इस आवाज का विरोध भी जबरदस्त हुआ लेकिन वे इतने परिपक्व, प्रखर और निडर थे कि उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की। वे इस बात को समझ चुके थे कि समाज का उत्थान तभी संभव है जब शोषित वर्गों, खासकर महिलाओं और तथाकथित निचली जातियों को शिक्षा और समानता का अधिकार मिले। जब शूद्रों , अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार लगभग बंद थे, तब महात्मा ज्योतिबा फुले ने उनके लिए शिक्षा के द्वार खोलने का अभूतपूर्व कार्य किया। 1848 में महिलाओं के लिए विद्यालय की स्थापना करना निश्चित ही क्रांतिकारी कदम था। जिसमें उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले प्रथम महिला शिक्षक बनी। उनकी शिक्षा तर्क और विज्ञान पर आधारित थी। उन्होंने सिर्फ अक्षर ज्ञान की शिक्षा नहीं दी बल्कि वे अंधविश्वास, पाखंड, रुढ़िवादिता और भेदभाव के विरुद्ध न केवल खड़े हुए, बल्कि वैज्ञानिक सोच के साथ आगे भी बढ़े। वे तर्कशील विचारों के निर्भीक और मानवतावादी व्यक्ति थे। ज्योतिबा फुले एक ऐसे क्रांतिकारी विचारक, समाज सुधारक और शिक्षक थे, जिन्होंने अपने समय से बहुत आगे की सोच रखते हुए समाज के सबसे कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के खिलाफ अपनी सोच को जन-जन तक पहुंचने का काम किया। इसी के चलते 1873 में उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। जिसका उद्देश्य समाज में समता स्थापित कर अंधविश्वासों से मुक्त करना था। वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने दलित .पीड़ित पिछड़ों और महिलाओं की पीड़ा को समझा और उनके उत्थान के लिए सकारात्मक प्रयास किए। वे करुणा और संवेदनशीलता से भरे हुए व्यक्ति थे। यही कारण था कि उन्होंने महिलाओं, दलितों, पिछड़ों और पीड़ितों की पीड़ा को समझा और उसे अपनी आवाज दी। बाल विवाह , विधवा उत्पीड़न और सती प्रथा का जमकर विरोध किया और उसके खिलाफ अभियान चलाया। जब विधवा को अभागी और विधवा विवाह को पाप समझा जाता था, उस वक्त उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और उनके लिए सत्य शोधक समाज जैसे आश्रम की स्थापना की। सत्यशोधक समाज का उद्देश्य जातिगत भेदभाव को समाप्त करना, शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना, सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना,अंधविश्वास मुक्त समाज और वैज्ञानिक सोच की स्थापना करना था।
महात्मा ज्योतिबा फुले के विचारों को समझने के लिए उनकी ‘गुलामगिरी’ जरूर पढ़नी चाहिए। इस कृति में उन्होंने गुलामी, शोषण और सामाजिक कुरीतियों पर जमकर प्रहार किया है। पहली बार किसी व्यक्ति ने ब्राह्मणवादी सोच की आलोचना की और शूद्रों की स्थिति पर प्रकाश डाला। गुलामगिरी वह पुस्तक है जिसने खुलकर यह बताया कि धर्म के नाम पर ब्राह्मणवाद ने किस तरह से मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद पैदा किया, उनका शोषण किया। तथाकथित धार्मिक ग्रंथो के माध्यम से शूद्रों को सामाजिक और मानसिक रूप से गुलाम बनाया। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत गुलामी की तुलना अमेरिका की दास प्रथा से की। दरअसल यह पुस्तक अमेरिका में दास प्रथा के खिलाफ चल रहे आंदोलन से प्रेरित थी और इसी कारण इसकी भूमिका में उन्होंने अमेरिकी एंटी-स्लेवरी मूवमेंट को समर्पित किया। महात्मा ज्योतिबा फुले ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों, खासकर वेदों और मनुस्मृति की आलोचना की। उनका कहना था कि ये ग्रंथ ऊंची जातियों ( ? ) द्वारा नीची जातियों ( ? ) के शोषण के रूप में इस्तेमाल किए गए। उन्होंने पौराणिक कथाओं का पुनर्विश्लेषण कर स्थिति को स्पष्ट किया। गुलामगीरी महज एक पुस्तक नहीं है, बल्कि सामाजिक क्रांति का उपक्रम है। यह जाति व्यवस्था के खिलाफ एक शक्तिशाली हथियार है और आज भी सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करने वालों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। महात्मा ज्योतिबा फुले ने तर्क दिया कि जाति व्यवस्था एक कृत्रिम और शोषणकारी व्यवस्था है, जिसे ब्राह्मणों ने अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए बनाया। उन्होंने वेदों और पुराणों जैसे ग्रंथों को शूद्रों के दमन का साधन बताया। ब्राह्मणों ने शूद्रों और अति शूद्रों को गुलाम बनाने के लिए इन्हें हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने पुरुष सूक्त के उस सिद्धांत की खुलकर आलोचना की कि ब्रह्मा ने ब्राह्मणों को मुख से, क्षत्रियों को भुजा से, वैश्यों को उदर से और शूद्रों को पैरों से पैदा किया। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों ने जानबूझकर इन समुदायों को शिक्षा से वंचित रखा, ताकि वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न हो सके। इसमें कोई दो राय नहीं कि ब्राह्मणवाद ने शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षा, संपत्ति, और सम्मान से वंचित रखा। महात्मा ज्योतिबा फुले ने हिंदू धर्म के कई रीति-रिवाजों और कर्मकांडों को शूद्रों के शोषण का साधन बताया। उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा बनाए गए ग्रंथों को शूद्रों के खिलाफ षड्यंत्र का हिस्सा बताया। उनका मानना था की जन्म से सभी मनुष्य एक समान है। जाति , लिंग, धर्म के आधार पर भेदभाव किया जाना निहायत ही गलत है।
महात्मा ज्योतिबा फुले, राजा राममोहन राय ,बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर , शहीदे आजम भगत सिंह ,राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे विचारक अगर हमारे बीच नहीं होते तो हम आज भी उसी दासता में जी रहे होते। महात्मा ज्योतिबा फुले सरीखे महापुरुषों की जयंती पर उनको याद कर उनके प्रति आदर सम्मान प्रकट करना और उनके उपकारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना प्रसन्नता तो देता है लेकिन इतना भर कर देने से महात्मा ज्योतिबा फुले के मिशन को कामयाबी मिलना बहुत मुश्किल है। इसके लिए जरूरत इस बात की है कि हम महात्मा ज्योतिबा फुले के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएं और उनको जन-जन तक पहुंचने में अपनी भूमिका तय करें।
-लेखक सुविख्यात साहित्यकार हैं






