


रूंख भायला.
राजी राखै रामजी! परबीती तो सदांई करां, आज कीं घरबीती। घरबीती कैवां तो बातां घरां री, घर में रैवणियै धणी लुगायां री। कदे प्रीत कदे राड़, कदे रूसारासी, कदे छेछुवा हांसी, घर में आं दोनूं जीवां बिच्चौ बीतै बा ई तो घरबीती, और भळै किसी !
घरबीती री कमी कठै ! आथण दिनुगै गाबो करो भलंई, नेवड़ो आवै नीं। हथळेवै सूं लेय’र जूण बिछौड़ै तंई जिकी खाटी-मीठी, चरकी-मरकी अर आछी-माडी बंतळ धणी लुगाई में होवै, उण रा रंग ई न्यारा…तो पछै सरू करां थोड़ी खाटी अर कीं मीठी….!
दियाळी रा दिन ! धणियाणी कीं भोळीढाळी, के बणावां, के बणावां करै ही, कै चाणचकै चेतै आयो, पारकी साल तौळियासर भैंरूजी री धोक लगावण गया जणा फूसियै रा पापा बीकानेर में दही-बड़ा खुवाया हा, जचगी, बै ई बणावूं। पण होयो ओ, कै बापड़ी बड़ै रो नांव भूलगी। घरधणी नै बोली-
‘‘हैं ओ आपां बै बणावां !’’
‘‘बै के ?’’ धणी धिरजाई सूं बोल्यो।
‘‘बै ओ……गोळ गोळ !’’
‘‘के गोळ गोळ ? सावळ बता दिखाण !’’
‘‘बै ई आपां खाया हा नीं पारकी साल’’

‘‘चेतै कोनीं कालै रो ई, थूं बात कर बरसां पैली री !’’ धणी नै झूंझळ आवण लागी।
‘‘बै ई ओ,….गोळ-गोळ….के नांव हो बां रो….!’’ डोफी लुगाई, लायण गोळ-गोळ सूं आगै ई नीं बधै। धणी नै आई रीस, उळाथ री अेक जचा’र धरदी उण रै मूंडै पर…‘‘करै है गोळ गोळ, थां सूं कीं नीं बणाइजै !’’
थाप खाय’र लुगाई कूकण ढुकगी, थोड़ी ताळ रोवाकूकी, पछै आंसूड़ा पूंछपांछ बोली रैयगी, लायण करै ई कांई ! थाप सूं उणरो उपरलो होठ न्यारो सूजग्यो। घरआळै उण रै मूंडै सामीं जोयो अर बोल्यो-
‘‘मूं करै बड़ो सो !’’
लुगाई उळाथ री सारी पीड भूलगी, हांसती सी बोली, ‘हां ओ….,बे ई तो, म्हूं ‘बड़ा’ ई तो कैवै ही…!’’

अबै बताओ, कोई के करल्यै। कुटीज्यां पछै ई जे घर में हरख हांसी बापरै तो बात रो कैवणो ई के ! मा तो इण बात नै और आगै बधावै, आ सागी लुगाई अेकर गुलगला बणावण बैठी, तो घरआळै बरज्यो, थारै सूं ताबै नीं आवैला, बळन दै। पण क्यां री, गुलगला तो बणासूं, परात में आटो ले लियो, गुड़ रो पाणी घाल लियो…कीं बेसी घलग्यो…..दूसर आटो रळायो तो सूको होग्यो….फेर पाणी….फेर आटो…….करतां-करतां होगी घाट राबड़ी…। ‘हैं ओ, थे साची कैवा, ओ तो ताबै ई कोनी आवै !’ धणी कांई कैवतो, मुळकबो कर्याे। राफां फलरकावती बा मिरगानैणी बोली-
‘ओ तो ढोळनो पड़सी !’
धणी बोल्यो, ‘थारै सूं सावळ ढोळीजै ई कोनी, रैवण दे थूं।’

‘इत्ती तो गैली कोनी, ढोळनो तो जाणूं ई हूं।’ बारै जासूं तो आड़ौसी-पाड़ौसी देखसी, हांसी करसी, ओ सोच’र बण गजबण तो भींत उपराकर ई परात री घाटराबड़ी बगाय दी। भागजोग सूं बारै गळी में अेक छैल आदमी न्हायो धोयो जावै हो, बापड़ै नै राबड़भूत बणाय दियो। कियां खेड़ो छूट्यो होसी, ओ थे सोचबो करो।
जूनै बगत री अेक और बात चेतै आवै, बिस्नोइयां रै किणी गांम में अेक परिवार बसतो। धणी-लुगाई अर दो छोटा टाबरिया, कोई सासू न सुसरो। घर धणी पंचोटियो हो अर लुगाई कीं गिटोकड़ी, लारै पी’र में आछो खायोड़ो हो उण रो। बा दिनुगै रोटी पोयां पछै मोयण देय’र अेक न्यारो रामरोट बणावती अर भोभर में ओट देवती। रोटियो मंदी आंच में सिकबो करतो जित्तै बा टाबरां अर धणी नै जिमा देवती।
धणी कैवतो, ‘‘थूं ई जीमलै, लारै पछै रोटी बचसी का नीं !’’

थे तो धाप’र जिमो, म्हारो कांई है, म्हूं पड़ूं चूल्है मांय ! जीम लेसूं लुखो मिसो होसी जिस्योई !’’ बा सदांई कैवती। धणी बिचारतो, लायण है तो साखात ई अन्नपूर्णा, आपां नै जिमायां पछै जीमै।
अेक दिन री बात, रोटी जिम्यां पछै बो चौकी पर हथाई करै हो, कै चिलम सारू खीरा री जरूरत पड़ी। खीरा लेवण नै चूल्है सा’रै आय’र भोभर फरोळी, मांय देखै तो घी सूं पाटतो ‘रामरोट’ ओटेड़ो। सा बात समझग्यो, लुगाई पळिंडै सारै उभी ही, बण देख तो लियो कै पोत चौड़ै आयग्या, राफ खिंडा’र मुळकण लागी। धणी रिसाणो तो होयो, कै आपां नै बांदर बणावती रैयी इत्ता दिन। पण फेर बिचारयो, खाणै सारू के तो टोकां, रैइज्यो कोनी, उण नै छेड़तो सो बोल्यो-
आर चक बार चक, चूल्है बीच्चौ धमचक
बता, आधो देही कै नंई ?
जोड़ायत बात में उण सूं चार चंदा चढती ही, बोली-
बालूं मूंछ मरोड़ूं पट्टा
गिटणखोरा, सिकण देही का नंई !

आं घरबीती बातां में तत होवै का नीं, जीवण रो सार है। स्याणप सूं की कमती सही, गूंगी बातां रा ई मोल होवै। आज री हथाई रो सार ओ है, सै धणी लुगाई सणै टाबरियां अर मायतां बार तिंवार सुख सूं मनावै, मंगळ गावै मोद मनावै। घरबीती बातां इंयां ई चालती रैवै, जोगमाया री मैर बणी रैवै, बाकी बातां आगली हथाई में…..। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं




