


ग्राम सेतु ब्यूरो.
राजस्थान की सियासत में आज यानी 5 मार्च को एक अहम मोड़ आने जा रहा है। पंचायतीराज और शहरी निकाय चुनावों में पिछले तीन दशकों से चली आ रही ‘दो बच्चों की बाध्यता’ अब इतिहास बनने वाली है। सरकार विधानसभा में राजस्थान पंचायतीराज संशोधन बिल-2026 और नगरपालिका संशोधन बिल-2026 पेश करने जा रही है। इन दोनों विधेयकों के पारित होते ही पंचायत से लेकर नगर निगम तक, चुनाव लड़ने के लिए बच्चों की संख्या कोई शर्त नहीं रहेगी। सियासी गलियारों में इसे ‘देर से सही, मगर बड़ा फैसला’ कहा जा रहा है।
आज मदन दिलावर पंचायतीराज संशोधन बिल और झाबर सिंह खर्रा नगरपालिका संशोधन बिल को विधानसभा में पेश करेंगे। इन विधेयकों को कब पारित किया जाएगा, इसका फैसला विधानसभा की कार्य सलाहकार समिति (बीएसी) की बैठक में होगा। फिलहाल विधानसभा का कार्यकाल 6 मार्च तक तय है। अगर बीएसी कामकाज आगे बढ़ाती है, तो 9 मार्च को दोनों बिल पारित हो सकते हैं, वरना 6 मार्च को ही इन पर मुहर लग सकती है।
सरकार की मंशा पहले ही साफ हो चुकी है। 25 फरवरी को हुई कैबिनेट बैठक में दोनों विधेयकों को मंजूरी दी जा चुकी है। उस दिन फैसलों की जानकारी देते हुए उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़, कानून मंत्री जोगाराम पटेल और डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा ने साफ कहा था कि यह संशोधन सामाजिक हकीकत और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुताबिक है।
दरअसल, साल 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने पंचायतीराज और शहरी निकाय चुनावों में दो से ज्यादा बच्चों वाले उम्मीदवारों पर रोक लगा दी थी। उस दौर में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर यह कदम उठाया गया था। पंच, सरपंच, प्रधान, जिला प्रमुख से लेकर पार्षद, नगर पालिका अध्यक्ष और मेयर तककृहर पद के लिए यह शर्त लागू थी। नतीजा यह हुआ कि काबिल होने के बावजूद कई लोग सिर्फ बच्चों की तादाद के कारण चुनावी मैदान से बाहर हो गए। अब वही बीजेपी सरकार 31 साल बाद इस बंदिश को खत्म करने जा रही है, जिसे सियासत की जुबान में ‘यू-टर्न नहीं, अपडेट’ बताया जा रहा है।
दोनों संशोधन बिल पारित होने के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी। अब चाहे जितने बच्चे हों, उम्मीदवार बनने पर कोई पाबंदी नहीं रहेगी। यानी वार्ड पंच से लेकर मेयर तक, हर पद के लिए दरवाज़ा सबके लिए खुला होगा। सियासी जानकारों का कहना है कि यह फैसला ज़मीनी हकीकत को कबूल करने जैसा है। बदलते वक्त में परिवार की संरचना, सामाजिक परिस्थितियां और निजी फैसले अब कानून की कसौटी पर नहीं कसे जाएंगे। यही वजह है कि इस फैसले को लेकर स्थानीय नेताओं में खासा जोश और उत्साह है।
इस बदलाव का असर आने वाले चुनावों में साफ दिखेगा। संभावना है कि इसी महीने पंचायतीराज चुनावों की घोषणा हो जाए। अब तक जो नेता दो से ज्यादा बच्चों की वजह से चुनाव नहीं लड़ पाते थे, वे भी मैदान में उतर सकेंगे। इससे मुकाबला और सख्त होगा, समीकरण बदलेंगे और कई सीटों पर दिलचस्प टक्कर देखने को मिलेगी। गांव-कस्बों की सियासत में अब नए चेहरे, पुराने दावेदार और दबे हुए अरमानकृसब एक साथ सामने आएंगे।
कुल मिलाकर, यह फैसला सिर्फ एक कानूनी संशोधन नहीं, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र को नया दायरा देने जैसा है। जहां पहले एक शर्त ने रास्ता रोका हुआ था, अब वहां खुली फिज़ा है। सियासत की इस नई करवट पर सबकी नजरें टिकी हैं, देखना यह है कि आने वाले चुनावों में इसका रंग कितना गाढ़ा चढ़ता है।





