




ग्राम सेतु ब्यूरो.
राजनीति प्रायः घोषणाओं, रणनीतियों और समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन कभी-कभी उसका मंच साहित्य, संस्कृति और आस्था से भी जुड़ता है। ऐसा ही दृश्य हनुमानगढ़ में देखने को मिला, जब श्रीगंगानगर के प्रख्यात साहित्यकार और क्षेत्र के मूर्धन्य विद्वान लेखक पं. तनसुखराम शर्मा ‘गुरु जी’ की नवीनतम कृति खाटू श्याम चरित की एक प्रति मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को भेंट की गई। यह अवसर केवल एक पुस्तक भेंट का नहीं रहा, बल्कि इसमें धार्मिक विमर्श के साथ-साथ सियासी और आत्मीय संवाद की झलक भी देखने को मिली।
हनुमानगढ़ में आयोजित कार्यक्रम के दौरान गुरुजी के शिष्य व भाजपा नेता रतन गणेशगढ़िया ने मुख्यमंत्री के समक्ष यह धार्मिक-शोधपरक पुस्तक प्रस्तुत की। पं. तनसुखराम शर्मा ने इस कृति में खाटू श्याम के जीवन, उनके बलिदान और उनसे जुड़ी कथाओं का विस्तृत वृत्तांत प्रस्तुत किया है। पुस्तक का प्रमुख आधार स्कंद पुराण को माना गया है, जिससे यह रचना केवल भक्ति साहित्य नहीं, बल्कि शास्त्रीय संदर्भों से जुड़ा एक गंभीर शोध ग्रंथ भी बन जाती है।
रतन गणेशगढ़िया ने बताया कि कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पुस्तक को सहर्ष स्वीकार करते हुए प्रसन्नता व्यक्त की। संक्षिप्त बातचीत में खाटू श्याम की महिमा और गुरुजी की रचनात्मक यात्रा पर भी चर्चा हुई। राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच मुख्यमंत्री का इस प्रकार के धार्मिक-साहित्यिक प्रयास में रुचि दिखाना, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति उनके दृष्टिकोण को रेखांकित करता है।
इस पूरे कार्यक्रम में खास चर्चा रतन गणेशगढ़िया के साथ मुख्यमंत्री की आत्मीय मुलाकात को लेकर रही। मुख्यमंत्री ने स्वयं उन्हें आवाज देकर पास बुलाया और पुस्तक के विषय में विस्तार से जानकारी ली।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित अन्य जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत बातचीत की। एडवोकेट सुशील अरोड़ा से उन्होंने उनके पूर्व मंडल अध्यक्ष कार्यकाल का उल्लेख करते हुए वर्तमान दायित्वों के बारे में जानकारी ली। वहीं जुगल गौड़ से जिला महामंत्री के रूप में उनके लंबे कार्यकाल और संगठनात्मक अनुभवों पर चर्चा की गई। दिलीप बेनीवाल से बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री ने हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी पूछा कि वे इस समय वकील की भूमिका में हैं या किसान की, जिससे माहौल कुछ क्षणों के लिए औपचारिकता से हटकर सहज हो गया।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह कार्यक्रम सरकार और समाज के बीच संवाद की एक नरम लेकिन महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उभरा। जहां एक ओर मुख्यमंत्री की मौजूदगी ने आयोजन को राजनीतिक गरिमा दी, वहीं दूसरी ओर धार्मिक साहित्य की प्रस्तुति ने इसे सांस्कृतिक गहराई प्रदान की। सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस प्रकार के ग्रंथ को स्वीकार करना, सरकार की सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं से जुड़े रहने की नीति को भी संकेतित करता है।






