



ग्राम सेतु ब्यूरो.
न्यायपूर्ण समाज की परिकल्पना क्या सिर्फ शांति से पूरी हो जाती है, या फिर उसके लिए न्याय की ठोस बुनियाद भी जरूरी है? इसी बुनियादी सवाल को केंद्र में रखकर सामुदायिक रेडियो ‘चेतना रेडियो’ संगरिया की ओर से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर एक विशेष वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। ‘न्यायपूर्ण समाज में समता व समानता के लिए महिला को भूमि अधिकार आवश्यक है’ विषय पर केंद्रित यह कार्यक्रम रवींद्र सदन, चेतना रेडियो, ब्लू बेल्स चिल्ड्रन एकेडमी परिसर में हुआ। कार्यक्रम में विचारों की टकराहट भी दिखी और संवेदनाओं की गर्माहट भी। कुल मिलाकर बहस में वह ‘जज़्बा’ था जो समाज को आईना दिखाता है।
कार्यक्रम की भूमिका में वक्ताओं ने साफ कहा कि भूमि अधिकार का सवाल केवल कागजों का नहीं, बल्कि सोच और नीयत का है। कहीं यह अधिकार महिला सशक्तिकरण की रीढ़ बताया गया, तो कहीं इसे सामाजिक ढांचे के लिए एक कठिन इम्तिहान कहा गया।
पक्ष में तर्क रखते हुए प्रतिभागियों ने कहा कि महिला को भूमि का अधिकार देना आर्थिक सशक्तिकरण की नींव है। आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी डॉ. जयश्री शर्मा ने आंकड़ों के साथ अपनी बात रखते हुए बताया कि जिन परिवारों में महिलाओं के नाम भूमि है, वहां शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के स्तर बेहतर पाए गए हैं। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर विनोद धारणिया ने दो टूक कहा कि महिला भूमि अधिकार केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा और घरेलू हिंसा में कमी लाने का मजबूत हथियार है। उनका कहना था कि अगर समाज को वाकई इंसाफ़ की राह पर ले जाना है, तो महिलाओं को जमीन पर हक देना वक्त की सबसे बड़ी मांग है।
वहीं, विपक्ष में बोलने वाले वक्ताओं ने इस मुद्दे के स्याह पहलू भी सामने रखे। प्रबुद्ध नागरिक वर्ग से पूर्व पार्षद एवं एडवोकेट कंचन धारणिया और सामाजिक कार्यकर्ता व शिक्षिका कल्पना बिश्नोई ने कहा कि पैतृक संपत्ति में महिला को भूमि अधिकार देने से पारिवारिक विवाद बढ़ने, संपत्ति के विखंडन और सामाजिक तनाव जैसी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। उन्होंने दलील दी कि वर्तमान में भूमि अधिकार कई बार सिर्फ कागजी रह जाता है, जबकि ज़मीनी हकीकत में इसके क्रियान्वयन में कानून, परंपरा और मानसिकता, तीनों आड़े आते हैं। उनका कहना था कि बिना सामाजिक तैयारी के ऐसा कदम कई घरों में फसाद भी पैदा कर सकता है।
विषय का संतुलन साधते हुए पूर्व प्राचार्य एवं उपभोक्ता संरक्षण समिति के महासचिव लालचंद कोचर ने बेहद मार्मिक अंदाज़ में कहा कि न्यायपूर्ण समाज का पैमाना ‘शांति’ नहीं बल्कि ‘न्याय’ होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाई-बहन के रिश्ते इस बात पर टिके नहीं होने चाहिए कि बहन अपने अधिकारों का त्याग करे। अगर ऐसा है, तो वह रिश्ता मोहब्बत पर नहीं, बल्कि शोषण पर खड़ा है। भूमि का अधिकार केवल मिट्टी के टुकड़े का मालिकाना हक नहीं, बल्कि उस सोच पर चोट है जो महिला को ‘पराया धन’ या आश्रित मानती आई है।
कार्यक्रम का परिचय देते हुए दीप्ति आर्य ने बताया कि यह आयोजन चेतना रेडियो के विशेष कार्यक्रम ‘भूमि की बात: महिलाओं के साथ’ की श्रृंखला का हिस्सा है। विशेष आकर्षण के रूप में कार्यक्रम के सूत्रधार, चेतना रेडियो के निदेशक एवं सचिव एडवोकेट संजय आर्य ने इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को हाल ही में दिवंगत हुई विद्यार्थी भावना को समर्पित किया और कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया। सदन ने इसे महिला सशक्तिकरण के प्रति एक गहरा संकेत मानते हुए सहमति दी।
इस अवसर पर विनोद कुमार गुप्ता, सुमन गिरी और एडवोकेट रविंद्र कुमार ने सक्रिय भागीदारी निभाई। अंत में ‘भूमि की बात: महिलाओं के साथ’ पॉडकास्ट का प्रदर्शन किया गया, जिसमें स्थानीय समुदाय के अनुकरणीय उदाहरण भी रखे गए।





