

देवकीनंदन चौधरी.
भारत की सांस्कृतिक धारा में कुछ ऐसे पर्व हैं, जो केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि लोकजीवन की आत्मा हैं। छठ पूजा उन्हीं में से एक है, आस्था, अनुशासन और तप का अद्भुत संगम। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है, जिनकी उपासना से जीवन में प्रकाश, स्वास्थ्य और समृद्धि का संचार होता है।
हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला यह पर्व चार दिनों तक चलता है, ‘नहाय-खाय’, ‘लोहंडा और खरना’, ‘सांझी अर्घ्य’ और ‘भोर अर्घ्य’ के रूप में। भक्तजन इस दौरान न केवल उपवास रखते हैं, बल्कि तन, मन और आत्मा की निर्मलता के साथ सूर्याेपासना करते हैं। यह केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मसंयम और प्रकृति से तादात्म्य का उत्सव है। सभी पौराणिक और लोक मान्यताओं में एक बात पर सहमति है, छठ पूजा की उत्पत्ति बिहार की भूमि से हुई। विशेष रूप से मुंगेर जिला इस परंपरा की जननी माना जाता है, जहाँ माता सीता ने पहली बार यह अनुष्ठान किया था।

त्रेता युग से प्रारंभ
छठ पूजा की जड़ें त्रेता युग तक फैली हुई हैं। रामायण के अनुसार, जब भगवान राम और माता सीता वनवास पूर्ण कर अयोध्या लौटे, तब रावण वध के प्रायश्चित हेतु उन्होंने सूर्य देव की उपासना की। मुग्दल ऋषि के निर्देश पर माता सीता ने बिहार के मुंगेर स्थित गंगा तट पर छह दिनों तक सूर्य साधना की। आज भी मुंगेर के ‘सीता चरण मंदिर’ में उनके पदचिह्न इस कथा के साक्षी हैं।

महाभारत काल की झलक
छठ का उल्लेख महाभारत काल में भी मिलता है। कहा जाता है कि द्रौपदी ने पांडवों के संकट काल में सूर्य देव से आराधना कर शक्ति और समृद्धि की कामना की थी। एक अन्य मान्यता के अनुसार, सूर्यपुत्र कर्ण प्रतिदिन अपने पिता सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते थे, उन्हें ही छठ पर्व का प्रथम उपासक माना जाता है।

कलयुग में आस्था का पुनर्जागरण
कलयुग में भी इस पर्व की महिमा बनी रही। लोककथाओं के अनुसार, बिहार के देव नामक स्थान पर एक कुष्ठ रोगी ने छठ का विधिपूर्वक अनुष्ठान किया और उसे रोगमुक्ति प्राप्त हुई। तभी से छठ को आरोग्य और उन्नति का पर्व माना जाने लगा।

युगों से परे, आस्था का उत्सव
छठ पूजा न केवल युगों को जोड़ती है, बल्कि मानव और प्रकृति के बीच के संबंध को भी पुनः स्थापित करती है। जब अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तब वह क्षण यह संदेश देता है कि हर अंत एक नई शुरुआत है। आज भी जब घाटों पर हजारों दीपक जलते हैं, व्रती अपने संकल्पों के साथ नदियों में उतरते हैं और गीत गूंजते हैं, ‘केलवा के पात पर, उगले सूरज देव…’ तो लगता है जैसे युगों पुरानी परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी त्रेता में थी। छठ केवल एक पर्व नहीं, यह भारतीय जीवन दर्शन का उज्ज्वल प्रतीक है, जहाँ श्रम ही साधना है, और सूर्य ही साक्षात् जीवन।


