



गोपाल झा.
हनुमानगढ़ के टिब्बी इलाके में एथनॉल प्लांट को लेकर जो हालात बने हुए हैं, वे किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के माथे पर शिकन डालने के लिए काफी हैं। यह टकराव अचानक फूटा हुआ ज्वालामुखी नहीं, बल्कि लम्बे समय से सुलगता हुआ असंतोष है, जिसे सरकार ने शायद हल्का समझ लिया। नागरिकों की भीड़ जब सुरक्षा घेरा तोड़कर निर्माणाधीन प्लांट की ओर बढ़ी और पुलिस ने बल प्रयोग किया, तो टकराव का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। भीड़ में मौजूद विधायक अभिमन्यु पूनिया घायल हो गए, वहीं सांसद कुलदीप इंदौरा, पूर्व विधायक बलवान पूनिया सहित अन्य कांग्रेस और माकपा नेता खुलकर नागरिकों के साथ खड़े दिखे। यह साफ-साफ बताता है कि कांग्रेस और माकपा का रुख इस मुद्दे पर बिल्कुल स्पष्ट और जनता के पक्ष में है।
अब असली सवाल उस खामोशी का है, जो भाजपा के पाले में पसरी हुई है। न कोई बयान, न कोई पहल, न लोगों से संवाद। इलाके में हजारों की भीड़ सड़कों पर उतर रही है, असंतोष उबल रहा है, पुलिस-प्रशासन में तनाव है, लेकिन क्षेत्र के सत्ताधारी दल से जुड़ा कोई भी नेता प्रकरण में कहीं नहीं दिख रहा। राजनीति में मौन भी वक्त पर बोले तो नीति बनता है, लेकिन यह वाला मौन सिर्फ सवाल खड़ा कर रहा है।
आंदोलनकारियों का रुख भी दो टूक है। उन्हें प्लांट से समस्या नहीं, संभावित प्रदूषण से है। वे विकास चाहते हैं, लेकिन कीमत अपनी जमीन, हवा और पानी की नहीं चुकाना चाहते। यह बात न तो गैरवाजिब है, न नई। हर बड़ा प्रोजेक्ट तभी स्वीकार्य होता है, जब स्थानीय जनता भरोसा पाए कि उसका भविष्य सुरक्षित है। यहाँ हालत उलट हैं, जनता आशंकित है, और सरकार सुरक्षा घेरे में प्लांट निर्माण आगे बढ़ा रही है। यही वह रवैया है जिसे लोग ‘ढिठाई’ कह रहे हैं।
सरकार का यही रुख पूरे विवाद को और अधिक उलझा रहा है। जब इतने बड़े स्तर पर असंतोष मौजूद हो, तब सरकार की पहली जिम्मेदारी लोगों में भरोसा जगाना होती है। उसका प्रतिनिधि मौके पर जाकर संवाद स्थापित करे, दोनों पक्षों के बीच मसौदा बनाए, उद्यमी को अपनी बात तथ्यों के साथ रखने का मंच दे, और आंदोलनकारियों की आशंकाओं का संतुष्टिपूर्वक समाधान करे। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का बुनियादी ढांचा है। लेकिन जब बातचीत की जगह पुलिस के पहरे से काम चलाया जा रहा हो, तो फिर भरोसा टूटता ही है।
पिछले पखवाड़े से जिले की पुलिस टिब्बी के विवादित क्षेत्र में तैनात है। यह न तो लंबे समय तक व्यवहारिक हो सकता है और न ही यह कानून-व्यवस्था के लिए स्वास्थ्यप्रद है। हनुमानगढ़ जंक्शन, टाउन, सदर, महिला थाना, संगरिया और टिब्बी थाना, सभी जगह मुकदमों की जांच और रोज़मर्रा का कामकाज प्रभावित हो रहा है। पुलिस बल एक उद्योग की पहरेदारी में व्यस्त है और अपराध से निपटने वाली मशीनरी स्वतः कमजोर पड़ रही है। यह ऐसी स्थिति है जिसे कोई जिम्मेदार शासन अपनी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं करना चाहेगा।
अब बात भाजपा नेताओं की भूमिका की। जनता ने उन्हें जनप्रतिनिधि इसी लिए बनाया है कि संकट की घड़ी में वे लोगों और शासन के बीच पुल बनें। आंदोलन तेज होता जा रहा है, जनता और प्रशासन के बीच अविश्वास बढ़ रहा है, हालात लगातार तनावपूर्ण हैं, और ऐसे समय पर उनका मूकदर्शक बने रहना लोकतांत्रिक मर्यादा के बिल्कुल विपरीत है। विपक्ष तो अपना रुख साफ कर चुका है। सवाल यह है कि सत्ताधारी दल के नेता क्यों चुप हैं? क्या वे वास्तविक स्थिति सरकार तक नहीं पहुँचा सकते? क्या उन्हें पता नहीं कि इलाके में आग सुलग रही है?
सरकार की नीतियां प्रशासन लागू करता है, और प्रशासन के आदेश पुलिस मानती है। इस क्रम में जनता की बात यदि बीच में कहीं खो जाए, तो हालात बेकाबू होना तय है। अभी भी विंडो बंद नहीं हुई है। सुलह की जमीन तैयार की जा सकती है, लेकिन इसके लिए पहले सत्ताधारी दल के प्रतिनिधियों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। संवाद ही तनाव को शांत करता है, और संवाद का रास्ता वही खोलते हैं जिनके हाथ में शासन का भरोसा और जनता की अपेक्षा दोनों होती हैं।
बहरहाल, टिब्बी का आंदोलन सिर्फ एक प्लांट का विवाद नहीं रहा। यह प्रशासनिक रवैये, जनप्रतिनिधियों की भूमिका और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुका है। इस परीक्षा में कौन पास होगा और कौन फेल, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं






