




ग्राम सेतु ब्यूरो.
साहित्य, शिक्षा और सेवा। इन तीनों को जीवन का उद्देश्य मानने वाले साहित्य अकादमी से सम्मानित प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. भरत ओला और उनकी शिक्षिका पत्नी सरोज ओला ने एक ऐसा निर्णय लिया है, जो समाज को सोचने और सीखने के लिए मजबूर करता है। दोनों ने हनुमानगढ़ स्थित राजकीय मेडिकल कॉलेज में देहदान का संकल्प पत्र भरकर यह स्पष्ट कर दिया कि सच्ची शिक्षा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में दिखाई देती है। डॉ. भरत ओला बताते हैं कि उन्होंने जीवनभर अध्ययन और अध्यापन को अपना धर्म माना है। मृत्यु के बाद भी यदि शरीर चिकित्सा शिक्षा के विद्यार्थियों के काम आ सके, तो यह ज्ञान की अंतिम सेवा होगी। उन्होंने कहा कि बेहतर डॉक्टर तभी बन सकते हैं, जब उन्हें व्यावहारिक और नैतिक शिक्षा मिले, और देहदान इसमें एक महत्वपूर्ण कड़ी है। सरोज ओला कहती हैं कि शिक्षक का दायित्व केवल कक्षा तक सीमित नहीं होता। शिक्षक जीवन भर और जीवन के बाद भी समाज को दिशा दे सकता है। यदि उनके इस निर्णय से किसी विद्यार्थी का भविष्य संवरता है, तो इससे बड़ा संतोष और कुछ नहीं हो सकता।
डॉ. भरत ओला साहित्य, भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में अपने उल्लेखनीय योगदान के लिए देशभर में पहचाने जाते हैं। वे आदर्श शिक्षक के तौर पर राष्टपति अवार्ड से नवाजे जा चुके हैं। उन्हें साहित्य अकादमी से सम्मानित किया जा चुका है, जो किसी भी साहित्यकार के लिए गौरव की बात मानी जाती है। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, सामाजिक सरोकार और भाषा की सशक्त अभिव्यक्ति स्पष्ट दिखाई देती है। वहीं सरोज ओला ने भी लंबे समय तक शिक्षण कार्य करते हुए अनेक विद्यार्थियों को न केवल पढ़ाया, बल्कि उन्हें जीवन के मूल्यों से भी जोड़ा।
मेडिकल कॉलेज की प्राचार्या डॉ. कीर्ति शेखावत ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि देहदान जैसे संकल्प चिकित्सा विद्यार्थियों को वास्तविक और व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करने में अत्यंत सहायक होते हैं। उन्होंने इसे समाज के लिए अनुकरणीय कदम बताया। कॉलेज के प्राध्यापक डॉ. सुनील बेनीवाल, डॉ. अर्जुन सिंह राठौड़ और डॉ. दीपक सहित अन्य अधिकारियों ने भी कहा कि ऐसे उदाहरण विद्यार्थियों के भीतर सेवा, संवेदना और जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करते हैं।
उल्लेखनीय है कि डॉ. भरत ओला और सरोज ओला मूल रूप से भिरानी गांव के निवासी हैं। वर्तमान में वे नोहर में दिव्यांग बच्चों के लिए होराइजन स्पेशल अकादमी का निशुल्क संचालन कर रहे हैं। यह संस्थान न केवल शिक्षा देता है, बल्कि समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग को आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी प्रदान करता है। यह तथ्य इस दंपती के सामाजिक सरोकारों को और अधिक मजबूत बनाता है। प्रबुद्धजनों, साहित्यकारों और शिक्षकों ने दंपती के इस कदम को मानवता की सच्ची सेवा बताया है।
आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. एमपी शर्मा ने कहा कि ऐसे निर्णय समाज में देहदान के प्रति जागरूकता बढ़ाते हैं और मृत्यु को भी सेवा का माध्यम बना देते हैं। आज जब दिखावे और स्वार्थ का बोलबाला है, ऐसे समय में डॉ. भरत ओला और सरोज ओला का यह संकल्प आने वाली पीढ़ियों के लिए एक शांत, लेकिन गहरी सीख है कि जीवन का मूल्य उसके अंत के बाद भी समाज को कुछ देने में है। यह पहल न केवल चिकित्सा शिक्षा के लिए उपयोगी सिद्ध होगी, बल्कि यह भी याद दिलाएगी कि सच्चा शिक्षक और सच्चा साहित्यकार कभी रिटायर नहीं होता, वह अपने विचारों और कर्मों से हमेशा जीवित रहता है।









