




गोपाल झा.
राजनीति की दुनिया में कई बार रास्ते सीधे नहीं होते। कोई व्यक्ति डॉक्टर बनने का सपना लेकर निकलता है और मंज़िल उसे जनसेवा के किसी और मैदान में ले आती है। राजस्थान की हनुमानगढ़ विधानसभा सीट से चार बार विधायक रहे और राज्य सरकार में मंत्री रहे डॉ. रामप्रताप की कहानी कुछ ऐसी ही दिलचस्प दास्तान है। चिकित्सा सेवा से सार्वजनिक जीवन में आए इस नेता का सफर केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि क्षेत्रीय विकास और स्थानीय पहचान से भी जुड़ा रहा। आज वे 83 वर्ष के हो गए हैं। उनके जन्मदिन के मौके पर समर्थकों में खासा उत्साह है और सोशल मीडिया पर लोग उन्हें मुबारकबाद और दुआएं दे रहे हैं।
5 मार्च 1943 को हनुमानगढ़ जंक्शन के पास स्थित गांव जोड़कियां में जन्मे डॉ. रामप्रताप ऐसे दौर में बड़े हुए, जब ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के अवसर आज की तरह आसान नहीं थे। पढ़ाई के लिए बच्चों को गांव से बाहर जाना पड़ता था और सुविधाएं भी सीमित थीं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त की, जहां कक्षा 3 तक पढ़ाई की। इसके बाद चौथी कक्षा के लिए उन्हें पास के गांव रोडावाली में दाखिला दिलाया गया।

इसी दौरान जोड़कियां का स्कूल क्रमोन्नत हो गया, जिससे कक्षा 5 और 6 की पढ़ाई उन्होंने अपने गांव में ही पूरी कर ली। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें हनुमानगढ़ जंक्शन के रेलवे स्कूल जाना पड़ा, जहां से 7वीं और 8वीं कक्षा पास की। इसके बाद उनकी पढ़ाई श्रीगंगानगर में हुई। खालसा स्कूल से कक्षा 9 से 11वीं तक की शिक्षा प्राप्त की और 12वीं की पढ़ाई राजकीय कॉलेज श्रीगंगानगर से पूरी की।
उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र को चुना और मेडिकल की पढ़ाई के लिए बीकानेर चले गए। वहां सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज में उन्हें प्रवेश मिला। हालांकि परिस्थितियों के कारण बाद में उन्हें अजमेर मेडिकल कॉलेज में स्थानांतरित होना पड़ा। यहीं से उन्होंने एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। इसके बाद अजमेर के कल्याण कॉलेज से इंटर्नशिप पूरी की।
इंटर्नशिप के बाद वे अपने क्षेत्र हनुमानगढ़ लौट आए। यहां हनुमानगढ़ जंक्शन के भगत सिंह चौक के पास उन्होंने ‘नेशनल क्लीनिक’ के नाम से अपनी चिकित्सा सेवा शुरू की। उस समय इलाके में डॉक्टरों की संख्या कम थी, इसलिए लोग इलाज के लिए दूर-दूर से आते थे। धीरे-धीरे मरीजों के बीच उनका भरोसा और पहचान बनने लगी। कहा जा सकता है कि यहीं से उनका जनसंपर्क बढ़ा और लोगों के बीच उनकी साख मजबूत हुई।
चिकित्सा सेवा करते-करते उनका रुझान सार्वजनिक जीवन की ओर बढ़ने लगा। उन्होंने राजनीति में कदम कांग्रेस के माध्यम से रखा। भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रेम बंसल ‘ग्राम सेतु डॉट कॉम’ से कहते हैं, ‘वर्ष 1980 में कांग्रेस की ओर से उनका टिकट लगभग तय हो चुका था। लेकिन उस समय केंद्र की राजनीति में डॉ. बलराम जाखड़ का प्रभाव माना जाता था। बताया जाता है कि अपने बहनोई चौधरी आत्माराम के दबाव में जाखड़ ने रामप्रताप का टिकट रद्द करवा दिया और टिकट आत्माराम को मिल गया।’
प्रेम बंसल के मुताबिक, यह घटना डॉ. रामप्रताप के राजनीतिक जीवन में एक अहम मोड़ साबित हुई। इसके बावजूद उन्होंने कांग्रेस से दूरी नहीं बनाई। उस समय के कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष रामनारायण चौधरी के साथ उनके आत्मीय संबंध बताए जाते हैं। उन्होंने पंचायत समिति प्रधान का चुनाव भी लड़ा, लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली।
सियासत की दुनिया में हार-जीत का सिलसिला चलता रहता है। वर्ष 1990 में उन्होंने बिना किसी पार्टी टिकट के निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस चुनाव में उन्हें अच्छी संख्या में वोट मिले। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यही चुनाव उनके लिए एक तरह से ‘टर्निंग पॉइंट’ बन गया। लोगों के बीच उनकी पकड़ और पहचान अब साफ दिखाई देने लगी थी।
इसके कुछ समय बाद यानी 1993 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए वे पहली बार विधायक बने और उन्हें राज्य सरकार में राज्यमंत्री बनने का अवसर मिला। अपनी सक्रिय कार्यशैली के कारण वे तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के करीबी माने जाने लगे।

उनके राजनीतिक जीवन की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में हनुमानगढ़ को जिला बनाने की पहल शामिल मानी जाती है। वर्ष 1994 में उन्होंने मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत से हनुमानगढ़ को जिला घोषित करवाने की घोषणा करवाई। इसके बाद 12 जुलाई 1994 को हनुमानगढ़ आधिकारिक रूप से जिला बन गया। उस समय के राज्यपाल बलिराम भगत और मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत की मौजूदगी में यह निर्णय अमल में आया। स्थानीय लोगों के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि मानी गई।
जिला बनने के बाद यहां प्रशासनिक ढांचे और विकास की जरूरतें भी बढ़ीं। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष बलवीर बिश्नोई ‘ग्राम सेतु डॉट कॉम’ से कहते हैं, ‘डॉ. रामप्रतापजी ने अपने राजनीतिक संबंधों का इस्तेमाल करते हुए सरकार से अधिकाधिक बजट स्वीकृत करवाया और विकास कार्यों की बुनियाद रखी। इसी वजह से कई लोग उन्हें हनुमानगढ़ का ‘विकासदूत’ कहकर भी याद करते हैं।’
राजनीति के जानकार महादेव भार्गव बताते हैं कि डॉ. रामप्रताप की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2003 में चुनाव हारने के बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उन्हें अपनी सरकार में जिम्मेदारी दी। उन्हें इंदिरा गांधी नहर बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया। बाद में जब वे दोबारा विधानसभा पहुंचे तो मुख्यमंत्री ने उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा देते हुए सिंचाई विभाग की जिम्मेदारी सौंपी। इस दौरान नहरी व्यवस्था को बेहतर बनाने के प्रयासों में उनकी भूमिका का जिक्र किया जाता है।

भाजपा के जिला उपाध्यक्ष ओम सोनी के अनुसार, डॉ. रामप्रताप की एक खासियत यह भी रही कि वे अपने कार्यकर्ताओं पर भरोसा करते हैं। वे उन्हें केवल राजनीतिक सहयोगी नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा मानते हैं और उनके सुख-दुख में शरीक होते हैं। यही अंदाज़ कार्यकर्ताओं के बीच उनके प्रति एक अलग तरह का लगाव पैदा करता है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. रामप्रताप 83 वर्ष की उम्र में भी बेहद सक्रिय्र हैं। अपने आवास पर नियमित जन सुनवाई करते हैं। कार्यक्रमों में शरीक होते हैं। पिछले चुनाव में बीजेपी ने उनका टिकट काट दिया और उनके बड़े बेटे अमित चौधरी को हनुमानगढ़ से प्रत्याशी बनाया था। अब वे सच्चे अर्थों में मार्गदर्शक की भूमिका में हैं।







