




गोपाल झा.
हनुमानगढ़ के टिब्बी में प्रस्तावित एथेनॉल फैक्ट्री के खिलाफ उठी आवाज अब गांव की सीमाओं में सिमटने वाली नहीं रही। यह संघर्ष धीरे-धीरे एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां स्थानीय असहमति राज्य की सत्ता से सीधा संवाद या टकराव चाहती है। 23 मार्च को प्रस्तावित ‘सेमीफाइनल’ महापंचायत और उसके बाद जयपुर में ‘फाइनल’ प्रदर्शन की घोषणा ने इस आंदोलन को प्रतीकात्मक और रणनीतिक दोनों अर्थों में निर्णायक बना दिया है। मुख्यमंत्री आवास के घेराव की चेतावनी बताती है कि आंदोलनकारी अब अपनी मांगों को अंतिम रूप से मनवाने के लिए सत्ता के दरवाजे तक दस्तक देने को तैयार हैं।
आंदोलनकारियों की दो प्रमुख मांगें हैं, एथेनॉल फैक्ट्री से जुड़ा एमओयू रद्द किया जाए और आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएं। ये दोनों मांगें जिला प्रशासन के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। यही कारण है कि रणनीतिकारों ने संघर्ष की दिशा बदलते हुए इसे जयपुर तक ले जाने का निर्णय लिया है। यह बदलाव केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि राजनीतिक है।
11 फरवरी को तलवाड़ा में आयोजित चौथी महापंचायत में उमड़ी भीड़ इस बात का प्रमाण है कि आंदोलन की जड़ें गहरी हैं। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 700 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की, इंटरनेट सेवाएं बंद कीं और धारा 163 लागू की। इन एहतियाती कदमों के बावजूद स्थिति शांतिपूर्ण रही, जो यह दर्शाती है कि आंदोलन संगठित और अनुशासित है।
एथेनॉल फैक्ट्री का प्रस्ताव विकास और निवेश के नाम पर सामने आया था। परंतु ग्रामीणों के लिए यह प्रस्ताव आशंका का कारण बन गया। जनवरी में पर्यावरणीय मानकों की जांच के लिए गठित कमेटी ने मौके पर निरीक्षण किया, किसानों की आपत्तियां सुनीं और सैंपल लिए। यह प्रक्रिया पारदर्शिता का संकेत अवश्य देती है, लेकिन ग्रामीणों का भरोसा अब भी डगमगाया हुआ है।
राजस्थान के सीमित जल संसाधनों वाले क्षेत्र में एथेनॉल जैसी जल-आधारित उद्योग की स्थापना स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय है। किसानों को डर है कि इससे भूजल स्तर, फसल उत्पादन और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। कंपनी द्वारा राठीखेड़ा में फैक्ट्री न लगाने का निर्णय और अन्य राज्यों से प्रस्ताव मिलने की बात इस पूरे घटनाक्रम को और जटिल बना देती है। यह प्रश्न अनुत्तरित है कि यदि परियोजना पूरी तरह सुरक्षित थी, तो स्थान परिवर्तन का निर्णय क्यों लिया गया?
10 दिसंबर को आयोजित महापंचायत के बाद फैक्ट्री परिसर में तोड़फोड़ और आगजनी के आरोपों में किसानों पर एफआईआर दर्ज की गई थी। इस कदम ने आंदोलन को कानूनी उलझनों में डाल दिया। हालांकि हाईकोर्ट ने एक ही मामले में दो एफआईआर दर्ज करने को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब घटना, तथ्य, पक्षकार और अपराध की प्रकृति समान हों, तो दोहरी एफआईआर अनुचित है।
यह निर्णय आंदोलनकारियों के लिए नैतिक और कानूनी दोनों दृष्टियों से राहत लेकर आया है। प्रशासन ने बताया कि मांगों के संबंध में राज्य सरकार को पत्र भेजा जा चुका है और मामलों की जांच सीआईडी-सीबी को सौंपी गई है। फिर भी किसानों का अविश्वास पूरी तरह दूर नहीं हुआ है।
राजस्थान में महापंचायत केवल विरोध का मंच नहीं, बल्कि सामूहिक निर्णय की परंपरा है। 23 मार्च को प्रस्तावित ‘अंतिम महापंचायत’ को ‘सेमीफाइनल’ कहना आंदोलन की मनोवैज्ञानिक रणनीति का हिस्सा है। यह शब्दावली संघर्ष को निर्णायक मुकाबले का रूप देती है। यदि मांगें पूरी नहीं हुईं, तो जयपुर कूच और मुख्यमंत्री आवास का घेराव तय है।
यह कदम सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है। विपक्ष इस मुद्दे को किसान असंतोष और पर्यावरणीय उपेक्षा के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। ऐसे में यह संघर्ष केवल औद्योगिक परियोजना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्य की राजनीति में भी हलचल पैदा करेगा।
टिब्बी का यह आंदोलन हमें याद दिलाता है कि विकास की योजनाएं केवल कागजी सहमति से सफल नहीं होतीं; उन्हें सामाजिक स्वीकृति की भी आवश्यकता होती है। प्रशासनिक कठोरता और कानूनी कार्रवाई अस्थायी शांति दे सकती है, पर स्थायी समाधान संवाद और पारदर्शिता से ही संभव है।
आज टिब्बी की धरती पर जो असंतोष सुलग रहा है, वह केवल एक फैक्ट्री के विरोध का परिणाम नहीं, बल्कि निर्णय-प्रक्रिया में सहभागिता की मांग है। यदि सरकार समय रहते सार्थक संवाद की पहल करती है, तो यह संघर्ष सहमति में बदल सकता है। अन्यथा 23 मार्च की महापंचायत के बाद यह ‘आग’ जयपुर की चौखट पर दस्तक देगी और विकास बनाम जनविश्वास की बहस को और तीखा कर देगी।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं








