




ग्राम सेतु ब्यूरो.
हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय स्थित जीएम रिसोर्ट शनिवार को एक अनूठे संवाद का गवाह बना, जहां किसान और व्यापारी पहली बार बिना किसी संगठन के बैनर तले एक ही मंच पर जुटे। ‘अन्न से अर्थ तक’ विषयक कार्यशाला में दोनों वर्गों ने न केवल अपनी-अपनी समस्याओं को रखा बल्कि इस बात पर सहमति भी जताई कि किसान और व्यापारी एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि पूरक हैं। अन्न पैदा करने और बाजार तक पहुंचाने की इस श्रृंखला को मजबूत करने के लिए साझा मंच की आवश्यकता को सबने महसूस किया।


इस कार्यशाला का संयोजन सामाजिक कार्यकर्ता अमित महेश्वरी ने किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हनुमानगढ़ कृषि आधारित जिला है। यहां का किसान अन्न उपजाता है और व्यापारी उस अन्न को बाजार तक पहुंचाता है। इसी से इलाके की खुशहाली संभव है। ऐसे में समय आ गया है कि दोनों पक्ष एक साझा मंच पर बैठकर आपसी समस्याओं का समाधान खोजें और सामूहिक प्रयासों से बेहतर भविष्य का रास्ता तय करें।

अमित महेश्वरी ने हनुमानगढ़-श्रीगंगानगर को ‘अन्न का कटोरा’ बताते हुए कहा कि यहां गेहूं, चावल और कपास का रिकॉर्ड उत्पादन होता है। लेकिन सरकार समय पर सरकारी खरीद सुनिश्चित नहीं करती, जिससे किसानों को घाटा उठाना पड़ता है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार एमएसपी पर सभी फसलों की खरीद की गारंटी करे या किसानों को अतिरिक्त सब्सिडी उपलब्ध कराए, ताकि नई पीढ़ी खेती-किसानी से विमुख न हो।

कार्यशाला का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि किसान और व्यापारी एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं हैं। किसान उत्पादन करता है और व्यापारी उस उत्पादन को बाजार तक पहुंचाता है। दोनों की साझेदारी से ही अर्थव्यवस्था और समाज का संतुलन बना रह सकता है। संवाद में यह भाव स्पष्ट हुआ कि आपसी अविश्वास और टकराव की जगह अब सहयोग और समझदारी का वातावरण तैयार किया जाना चाहिए।

कार्यशाला में पूर्व सभापति सुमित रणवां, किसान नेता सुभाष मक्कासर, रेशम सिंह मानुका, रमणदीप कौर, बलकरण सिंह, फूडग्रेन मर्चेंट्स एसोसिएशन अध्यक्ष नरोत्तम सिंगला, बालकृष्ण गोल्याण, पवन गोल्याण, पदम जैन सहित विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

किसानों ने यूरिया संकट का मुद्दा जोरशोर से उठाया। उनका कहना था कि समय पर खाद उपलब्ध न होने से फसल पर सीधा असर पड़ता है। साथ ही यूरिया के साथ किट खरीदने की बाध्यता ने उनकी परेशानियां बढ़ा दी हैं। व्यापारियों ने भी किसानों की इस बात का समर्थन किया और कहा कि यह कंपनियों का खेल है, सरकार की मिलीभगत के बिना ऐसा संभव नहीं। उनका कहना था कि यूरिया बेचने में उन्हें खास मुनाफा नहीं है, फिर भी आवक होने पर बेचना उनकी मजबूरी है। उन्होंने किसानों के साथ मिलकर सरकार से यह बाध्यता समाप्त करने की मांग करने पर सहमति जताई।

किसानों ने पराली जलाने पर रोक संबंधी सरकारी नीतियों पर भी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि पराली जलाने से प्रदूषण का जो तर्क दिया जाता है, वह उतना प्रभावी नहीं है जितना प्रचारित किया जाता है। बल्कि, पराली की राख से मिट्टी को पोटाश मिलती है, जो जमीन की उर्वरता के लिए लाभकारी है। किसानों ने यह भी कहा कि यदि सरकार कोई व्यवहारिक विकल्प मुहैया कराए तो उन्हें पराली जलाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

संवाद के अंत में यह तय हुआ कि किसानों और व्यापारियों को अपनी समस्याओं और सुझावों को सरकार तक सामूहिक आवाज में पहुंचाना चाहिए। चाहे वह एमएसपी की गारंटी हो, यूरिया संकट का समाधान हो या पराली जलाने का विकल्पकृयदि किसान और व्यापारी मिलकर अपनी बात रखेंगे तो सरकार पर दबाव बनेगा और नीतिगत सुधार संभव होंगे। व्यापारी नेता बालकृष्ण गोल्याण ने बताया कि जीएम रिसोर्ट का यह आयोजन महज एक कार्यशाला नहीं, बल्कि किसान-व्यापारी संबंधों में बदलाव की एक नई शुरुआत माना जा रहा है। ‘अन्न से अर्थ तक’ के इस मंथन ने यह संकेत दिया कि अब हनुमानगढ़ में किसान और व्यापारी साथ खड़े होकर अपने और क्षेत्र के हितों की लड़ाई लड़ेंगे।




