



गरिमा सिंह
ना शर्त थी, ना सौदा, ना कोई हिसाब कभी,
मेरे हर कल से पहले तूने देखे थे सपने सभी।
थकी आँखों में भी तू उजास भर जाती है,
माँ, तू बिना पूछे ही मेरी बात समझ जाती है।
मेरी खामोशी भी तुझसे अनसुनी न रही,
भूख हो या मन का बोझ, तू पहले ही जान गई।
थाली में रोटियाँ नहीं, अपनापन सजाती है,
माँ, तू रसोई में भी दुआएँ पकाती है।
तेरे पल्लू की ओट में दुनिया बहुत छोटी थी,
मेरी शरारतें बड़ी, और तेरी डाँट मीठी थी।
डाँट के बाद वो चुपचाप गले से लग जाना,
माँ, वही तो था मेरा सबसे सच्चा खज़ाना।
तेरे आँचल की छाँव में डर ठहर जाता है,
तेरी गोद में सिर रखूँ तो वक़्त रुक जाता है।
लोरी में तेरी नींद नहीं, भरोसा बसता है,
माँ, तेरी आवाज़ में ही मेरा पूरा घर बसता है।
मेरा होना, मेरी उड़ान, सब तुझसे ही शुरू हुई,
तेरे त्याग की मिट्टी में ही मेरी पहचान उगी।
आज जो थोड़ा-सा नाम, थोड़ी-सी राह मिली है,
माँ, ये सब तेरे आशीर्वाद की ही छाया बनी है।
ना शब्द पूरे पड़ते हैं, ना काग़ज़ गवाही दे पाता,
माँ, तू जो है, उसे कोई छंद बाँध नहीं पाता।
बस एक बेटी की तरह सिर झुका कर कहती हूँ,
माँ, तुझे प्रणाम, तुझसे ही हूँ, तुझ पर ही ठहरती हूँ।







