



ओम पारीक.
मरुस्थल में मृगमरीचिका देखने वाला हर जीव जानता है कि पानी की कीमत क्या होती है और उसकी बिसात कितनी बड़ी है। हनुमानगढ़ जिले की बात करें तो यहां जल कभी सुविधा नहीं रहा, बल्कि अस्तित्व की शर्त रहा है। सदियों तक अकाल-दुष्काल झेलते इस रेगिस्तान ने जलाभाव को अपना भाग्य मान लिया था। लेकिन इस सदी के सफर में इंदिरा गांधी नहर ने उस ‘गर्वित अभाव’ को तोड़ दिया। हिमालय का कितना पानी गडरा रोड के मुहाने तक पहुंचा, इसका कोई सटीक आंकड़ा नहीं, लेकिन इतना तय है कि पानी ने मरु के चेहरे की रेखाएं बदल दीं। तकनीक के सहारे धरती का सीना चीरकर भूमिगत जल निकाला गया और रेगिस्तान नखलिस्तान में तब्दील होने लगा।
इस इलाके के लोगों ने निर्जलीकरण के दौर में जो जीवटता दिखाई, वह अपने आप में इतिहास है। चौतरफा राजनीतिक उथल-पुथल के बीच इस मरु ने लोगों को पनाह दी और लोगों ने मरु को जीवन दिया। जल के लिए संघर्ष यहां की सामूहिक स्मृति का हिस्सा है। कुएं, बावड़ियां, तालाब, कुंड और टांके बरसात की हर बूंद को सहेजना सांस्कृतिक पर्व जैसा था। पानी को घी की तरह बरतने की सीख पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली। यही वजह रही कि विपरीत हालात में भी जीवन की लौ बुझी नहीं।
एक समय ऐसा भी आया जब विक्रम संवत 1956 में पूरा पश्चिमी रेगिस्तान भीषण दुष्कल में डूब गया। अन्न और जल के अभाव में लोग मर रहे थे। बाहर से सहायता के साधन सीमित थे और देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। तब शासकों को भविष्य के लिए बड़े संकल्प लेने पड़े। हिमालय का पानी मरु तक लाने की योजना बनी और गंग नहर का सपना साकार हुआ। आज़ादी से पहले ही श्रीगंगानगर जिले के सैकड़ों मील क्षेत्र की काया पलट गई। बाद में भाखड़ा और इंदिरा गांधी नहर ने इस बदलाव को स्थायी बना दिया। खेती और पानी दोनों के लिए प्रगति के नए द्वार खुले।
जहां कभी ओरण मानी जाने वाली जमीनें थीं और पशुपालन ही मुख्य व्यवसाय था, वहां आज खेती की विविधता चकित करती है। बारिश होने पर बाजरा, ग्वार और मोठ तक सीमित उत्पादन अब मिर्च, मसाला, जीरा, ईसबगोल, सौंफ, खजूर, अनार, बेरी और यहां तक कि सेव की खेती तक पहुंच गया है। नहरी पानी ने भूगर्भीय जल की स्थिति भी बदली और ट्यूबवेल व बोरिंग के जरिए गहरे पानी का उपयोग आसान हुआ। बीकानेर और जोधपुर संभाग में कृषि और व्यापार की रौनक फैल गई। सैकड़ों गांव, कस्बे और शहर विकास की नई इबारत लिखने लगे, ऐसी कल्पना पहले संभव नहीं थी।
लेकिन इस स्वर्णकाल के साथ नई चिंताएं भी जन्म ले रही हैं। जिन नहरों में हिमालय का पानी आता रहा, उनमें अब बड़े शहरों का सीवरेज और सेम का पानी मिल रहा है। ट्यूबवेल आधारित खेती ने भूजल दोहन को भयावह स्तर पर पहुंचा दिया है। मरु की जैव विविधता पर इसका असर साफ दिखने लगा है। खेजड़ी, रोहिड़ा, केर, कुमठ, फोग, खींप, दामन और सेवन घास जैसी वनस्पतियां सिमट रही हैं। रासायनिक खेती बीमारियों को न्योता दे रही है। पानी पराया धन है, उधार का और हमारे विकल्प सीमित हैं। भावी पीढ़ियों के लिए इसे संजोना जरूरी है।
महाभारत काल की कथा में ऋषि उतंग को मिला वरदान याद दिलाता है कि मरु की बरसात अमृत समान है। अगर उस अमृत की हम बेकद्री करेंगे, तो यह सभ्यता के लिए शुभ नहीं होगा। हर घर की छत से गिरने वाला पानी सहेजना, बरसाती जल का सम्मान करना और उसका विवेकपूर्ण उपयोग ही मरु का भविष्य सुरक्षित रख सकता है। पानी पहली आवश्यकता है और उसके साथ बर्ताव भी उतना ही सभ्य होना चाहिए।







