





रूंख भायला.
राजी राखै रामजी ! आज बात देस रै पैलड़ै राष्ट्रवादी कवि री ! कुण है ओ कवि ? कठै रो है ? अर क्यूं इत्तो चावो ठावो है ? इणी बाबत बंतळ करस्यां। पैली उण महाकवि रो अेक सोरठो बांचो दिखाण-
अकबर जासी आप, दिल्ली पासी दूसरा
पुनरासी प्रतापसी, सुजस न जासी सुरमा।।
जे अबै ई नीं पिछाण्यो है तो बताय दूं अे कवि है ‘दुरसा आढा’ ! अकबर रै बगत रा चावा-ठावा कवि दुरसा आढा राष्ट्रीयता रै भावां नै पोखण अर मुगल सत्ता रै विरोध मैं लडणआळै तमाम सूरां रै सुजस नै आपरी कवितावां में रच’र भारतीय जन मानस में चेतना अर चिंतन जगावण री पुरसल खेचळ करी। कदास इणी कारण सूं साहित जगत में बान्नै देस में रो पैलड़ो रास्ट्रवादी कवि बताइजै।
दुरसा भारतीय इतिहास रा अेकला कवि है जिकां नै आपरै कवित्व रै पाण इत्तो जस अर मान सनमान मिलियो कै जीवते जी बां री मूरत्यां थरपीजी। अचलेश्वर महादेव मंदिर, आबू पर्वत में पीतळ री मूरती अर सिरोही राजमहल रै सामीं, पद्मनाथ मिंदर रै बारै हाथी पर असवार बां री मूरती इण री साख भरै कै दुरसा रो कद कित्तो मोटो हो। बै मध्यकाल रै भारतीय कवियां में सैं सूं चावा ठावा, धनाढ्य अर जसजोग पावणिया कवि हा। मारवाड़, मेड़ता, सिरोही अर बीकानेर रै राजावां कान्नी सूं बान्नै बीसूं जागीरां सनमान पेटै मिली, करोड़ूं पसाव न्यारा ! जे आज घड़ी उण सनमान रो तौल करां तो कांई ठाह कित्ता ई नोबेल पुरस्कार थरप्या जा सकै।
दुरसा आढा रो जलम वि. सं.1592 (1535 ई) री माघ सुदी चवदस नै मारवाड़ रै सोजत नेड़ै धुंधळा गांम में होयो। आं रै जीसा रो नांव मेहाजी आढ़ा अर मा रो नांव धनी बाई बोगसा हो। जद दुरसा छव बरस रा हा तो बां रा जीसा हिंगलाज माताजी री तीरथां गया अर बठै ई भगवां ले लिया। अबखायां बिच्चाळै घर चलावण सारू बाळपणै में ई दुरसा नै अेक खेत धणी रै सीरी बण’र रैवणो पड़्यो। अेक दिन जद बो टाबर खेत में पाणी लगावै हो तो खाळो टूटग्यो। खेतधणी रिसाणो होय’र उण टाबर नै टूट्योड़ी आड में पटक’र उण पर माटी घाल दी कै पाणी ठम जावै। बगड़ी जागीर रो ठाकर प्रतापसिंग, जिको आपरै घोड़ै नै चरावण सारू बठै लेय’र आयोड़ो हो, ओ नजारो देख्यो। बण खेतधणी नै धमका’र टाबर नै बारै कडवायो अर आपरै साथै उण नै सोजत लेयग्यो। प्रतापसिंग ही उण टाबर री भणाई अर पोखण री व्यवस्था करी। उण घड़ी कुण जाणतो, ओ टाबर ई इतिहास में महाकवि दुरसाजी आढ़ा रै नांव सूं पिछाणीजसी !
दुरसा भणाई अर विद्वता रै पाण अेक चावा कवि ई नीं बण्या, बां री तलवार ई कलम दांई तेज ही। जणाई ठाकर प्रताप सिंग बान्नै आपरो प्रधान सलाहकार बणायो अर धुंधळा और नाथळकुडी री जागीर सूंपी। दुरसा आढ़ा रा दो ब्याव होया। बां रै भारमल, जगमाल, सादुल, कमजी और किसना जी नांव रा चार बेटा होया। दुरसा आढ़ा री पोती (भारमल री बेटी) देवनगा तो देवी रो औतार मानीजै। राजसमंद जिलै में देवियों की मेरडा में बां रो मिंदर ई है। देवनगा माता नै चारण, गुज्जर, सुथार आद जात्यां लोकदेवी रै रूप में पूजै।
दुरसा आढा रै कवित्त पेटै बात करां, तो बां रै रचाव में डिंगळ काव्य रा उच्च प्रतिमान मिळै।
किरतार बावनी, बिरद छिहत्तरी, छंद चाळकनेच रो, परमेसरजी री नाममाळा, कुंवर अजाजी री भूंचर मोरी री गजगत, राव अमरसिंघ रा झूलणा, करण रामोत रा दूहा, विरमदे सोलंकी रा दूहा, राव सुरताण रा झूलणा, राजा मानसिंह रा झूलणा आद सामल है।
बां री पोथी ‘किरतार बावनी’ अेक इसी रचना है जिण में मध्यकालीन भारतीय समाज रो सांगोपाग चितराम निजर आवै। उण बगत रा किरसा, कलबी, मेहतर, भील, मदारी, पहरेदार, भाट, लुहार, महावत, कासीद, वेश्या आद आपरी जियाजूण कियां जीवता, इण पोथी में आं रो भोत सांतरो बखाण है। कदास दुरसा आढा ई पैलड़ा कवि हा जिकां दलित वर्ग पर आपरी कलम चलाई। ‘किरतार बावनी’ में दुरसा री सोच शोषित, दलित, गरीब, मजदूर अर मजबूर रै पख में बोलणियै अेक संवेदनशील कवि रै रूप में प्रकटैै। बानगी देखो दिखाण-
‘जेठ महीने जोर, तपे तिहं दणियार तातो।
धरती वसदे धखै, महाबळ लुए मातो।
काळा गिरवर कहर, जोई तिहां निरधन जावै।
सिर भातो ले सबळ, धसै धर सांमो जावै।
भार संजोगै भेदियो, भूमि पाव पाछा भरै।
करतार पेट दुभर कियो, सो काम एह मानव करै।’
दुरसा री महाराणा प्रताप पर रच्योड़ी ‘बिरद छिहत्तरी’ भोत चावी ठावी रचना है जिकी मध्यकालीन भारतीय इतिहास री अेक अमोलक हेमाणी गिणीजै। छियत्तर सोरठां री आ इत्ती अमोलक है कै 1903 ई में जद मारवाड़ रा बच्छराज सिंघी इण पोथी नै छपवाई तो मेवाड़ दरबार सूं बां नै आजीवन पेंशन देणै री घोसणा होई। दरबार मुजब जे ‘बिरद छिहतरी’ नीं रचीजती तोे महाराणा प्रताप, राव सूरताण अर चन्द्रसेन री जस किरती चौफेर नीं पूगती। दुरसा अकबर रै दरबार में महाराणा प्रताप रो जस बखाण’र बां री किरत सात समदरां पार पुगाया दी। बां ‘बिरद छिहत्तरी’ में लिख्यो-
अकबर जासी आप, दिल्ली पासी दूसरा।
पुनरासी रहसी प्रतापसी, सुजस न जासी सुरमा ।।
अकबर जतन अनेक, रात दिवस रोकण करे।
पूगी संमदा पार, पंगी राण प्रतापसी।।
आं सोरठां में बां महाराणा रै स्वाभिमानी, स्वातंत्र्य चेतना अर निडर व्यक्तित्व रो भोत सांतरो बखाण रच्यो है-
अकबरिये इकबार, दागल की सारी दुनी।
अणदागल असवार, रहियो राण प्रतापसी।।
अकबर पत्थर अनेक, के भूपत भेळा किया।
हाथ न आयो हेक, पारस राण प्रतापसी ।।
अकबर रै दरबार में उभा होय’र प्रताप री मौत रो खरो अर खारो मरसियो बांचणै री हिम्मत दुरसा नै आपरै बगत रै सगळा कवियां सूं अळघो मुकाम दिरावै। बां प्रताप सारू गायो-
अस लेगो अणदाग, पाग लेगो अणनामी।
गो आडा गवड़ाय, जिको बहतो धूरबामी।
नवरोजे नहं गयो, न गो आतसा नवल्ली।
न गो झरोखा हेठ, जेथ दुनियाण दहल्ली।
गहलोत राणं जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी।
नीसांस मूक भरिया नयण, तो म्रित साह प्रतापसी।।
कहिजै, महाराणा प्रताप रै अबखै बगत में भामासाह जिकी धन सम्पदा बां नै सूंपी ही उणमें दुरसा आढा रा दियोड़ा 4 लाख पसाव ई भेळा हा। राणा प्रताप आपरै छेकड़लै बगत में बेटै अमरसिंह सूं वचन लियो हो कै म्हूं दुरसाजी आढ़ा रो चावो मान सनमान नीं कर सक्यो पण थूं करीजै। राणा अमर सिंह दुरसाजी नै रायपुरिया री जागीर देय’र बाप रै बचनां रो मान राख्यो।
दुरसा डिंगळ रै निपुण कवियां में मान्या जावै, बां दूहा, सोरठा, छप्पय, नीसाणी, झूलणां, भाखड़ी, पंखाळो, पालवणी, गजगत आद छंद-गीतां में रचनावां करी है। दुरसा री रचनावां में शब्दालंकार रो प्रयोग प्रधानता साथै हुयो है। ओज, स्फूर्ति, प्रेरणा, प्रोत्साहन, उद्बोधन, आद रै साथै दुरसा री रचनावां रम्य रूप में पाठकां सामीं आवै।
वि. संवत् 1699 वैसाख सुदी सातम नै दुरसा सौ बरस पूरा करग्या पण बां री कीरत जसजोत जुगां जुगां तंई बळती रैवेली। बै साचौ अरथां में एक राष्ट्र कवि अर उद्भट विद्वान हा। वांरी रचनावां डिंगल अर राजस्थानी साहित्य री हेमाणी है।
आज बस इत्तो ई……। बाकी बातां आगली हथाई में, आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं



