




रूंख भायला
राजी राखै रामजी! आज बात बधावै रै गीतां री, आं गीतां रै मिस आपणै सैंस्कारां री, आपणी पिछाण री। बधावो बोलै तो हरख अर बधाई रो मौको, जद अे गीत गाइजै। ब्याव हो का पछै कोई उच्छब, बधावै रै गीतां सूं अपणायत री अेक सोरम फूटै जिकी घर आंगणियै भेळै सुणनियै रो मन सरसावै। आपणै लोकगीतां में सैं सूं चावाठावा गिणीजै बधावै रा गीत, जिकां नै गीतेरण जद जद उगेरै तो च्यारूंकूंट मतैई सैंचन्नण हो जावै।
ब्याव उच्छब रै मौकै भांत-भांत रा बधावा गाइजै, रेखा लगा’र गावती गीतेरणां इसो समो बांधै जाणै सुण ई बोकरै ! कई बधावा तो इत्ता लाम्बा लाम्बा, कै ना पूछो। ‘सोनै रूपै री सायबा ईंट थपाय देवो, सखरो चिणाय देवो धण रो माळियो..’ ‘म्है तो नित उठां लीपां आंगणो, आज बधावो देवानंद रो…’ लूंगा रो बूंटो राज गांठ गंठीलो, सासूजी जायो राज घणो आंटिलो…’, ‘सुण सुण ओ म्हारा सुगणां रे सायब…’ बधावै रा चावा गीत है। मंगळ मोद मनावती लुगायां जद आ गीतां नै उगेरै तो लखावै बां रै कंठा सांचाई सुरसत आ बिराजी है। बधावै रै आं गीतां नै सुणां तो ठाह लागै कै अे फगत गीत कोनी, आं रै मिस लुगायां आपणी संस्कृति, आपणै सैंस्कारां नै सांवठो करै, भेळा बैठण, भेळा जीमण अर दुख सुख में सागै रैवण री सीख नै टणकाबो करै। साची बूझो तो संयुक्त परिवारां री हेमाणी रा सांचा संवाहक है अे गीत। पण चिंता री बात आ है कै ज्यूं धोरिया खतम हो रैया है, सागी उण ढाळै, अंवेर नीं होवणै सूं बधावै रा गीत ई गमता जा रैया है।

तो कांई करां ! चलो, आपणी हथाई में बधावै रै अेक गीत नै अंवेरणै री बात ई करलां। ‘सुण सुण ओ म्हारा सुगणां रे सायब’ बधावै रो अेक चावो गीत है जिण में धणी लुगाई बंतळ रै मिस संयुक्त परिवार रै बधेपै री बात करै। सायब जी नै जोड़ायत बतावै कै उण नै कालै रात सुपनो आयो। सुपनै में कांई-कांई देख्यो, बा सगळी बात इण गीत में बतावै अर धणी सूं सुपनै नै अरथावण सारू कैवै। गीत री फुटराई अर सबद नाद देखो, गजबण कित्तै सांतरै ढंग सूं हियै उतरतै सबदां नै गा रैयी है-
सुण-सुण ओ म्हारा सुगणां रे सायब
सूती नै सुपनो आयो जे…
आंगण चौक पुरीजता देख्या
ऊपर कुंभ कळस देख्यो जे
महलां में दिवलो जगतो जी देख्यो
केळ झबरको बारणो जे
हाथां रै बाजूबंद बांध्योड़ा देख्या
लूंबड़ली लटक रैयी जे
हाथां में चुड़लो पैरयोड़ो देख्यो
सोवन गुजरी सोभ रैयी जी
आभै में बिजळी चमकती देखी
सावण लोर बरस रैयो जे
बागां में कोयल कुळकती देखी
सरस जंवाई देख्या जे
सुण-सुण ओ म्हारा सुगणां रे सायब
सूती नै सुपनो आयो जे…
सुगणां सायब स्याणां घणां जी,
सुपनै नै अरथावै जी

सायब जी जद आपरी गीतेरण धणियाणी री बात सुणै तो घणा मुळकै। गीत रै दूजै भाग में देखो, धणियाणी सुपनै में जिकी चीजां देखै, सायबजी वांन्नै पारिवारिक रिस्तां गूंथ देवै, अर भोत सांतरै ढंग सूं सुपनै नै अरथावै, देखो दिखाण-
कुंभ कळस थारा सुसरो जी गोरी
आंगण चौक थारी सासू जी जे
महलां रो दिवलो पूत जी थारो
केळ झबरको कुळबहू जे
हाथां रा बाजूबंद जेठजी थारा
लूंबड़ली जिठाणी जे
हाथां रो चुड़लो देवरियो थारो
सोवन गुजरी दिराणी जे
आभै री बीजळी नणदल थारी
सावण लोर नणदोई जी जे
बागां री कोयल धीवड़ है थारी
सरस जंवाई सूवटो जी जे….।

इण गीत रो फुटरापो ओ है कै इण में रिस्तां नै चावी उपमा अर ठावो माण दिराय’र धणियाणी रो सुपनो अरथाइज्यो है। सायबजी आपरी अमोलक दीठ सूं सासू सुसरै सूं लेय’र बेटो बिनणी, जेठ जिठाणी, देवर दिराणी, नणद नणदोई अर बेटी जंवाई तकात नै अेक गीतमाळा में पो दिया है। जणाई, सुपनै रो मरम ठाह लागतां ई धणियाणी घणी मोदीजै, उण नै लखावै, सायबजी उण रै सगळै परिवार नै सरायो है, बिड़दायो है, अर बा भळै गावण लागै-
थे जुग जीवो सुसरै जी रा जाया
सुपनै रो अरथ बतायो जी
थे जुग जीवो साजनियां री जायी
थां म्हारो बंस बधायो जी
थे जुग जीवो सुसरै जी रा जाया
थे म्हारो परिवार सरायो जी…।
अब थे विचार करो, आज रै दौर में कांई इस्यै गीतां रो रचाव हो रैयो है ? कांई ब्याव उच्छब में आपां अे गीत सुण रैया हां ? कित्ती’क लुगायां है जिकी आ गीतां नै अजेस ई गा रैयी है ? कित्ती’क छोर्यां है जिकी आं गीतां नै सीख रैयी है ? आं सवालां रै पड़ूत्तर में फगत सरणाटो सुणीजै का सुणीजै डीजे रो कानफोड़ू संगीत ! पछै भेळै परिवार री संस्कृति कियां बचसी अर कियां बचसी आपणी पिछाण !!

आज री हथाई रो सार ओ है कै आं गीतां री साम्ह भोत जरूरी है। अे गीत बचसी तो आपणी पिछाण बंचौला, घर परिवार बंचौला, नीं पछै बचौलो अेकलपै रो छातीकूटो ! आ संभाळ जद ई होवैली, कै आपां आपणै घरां में नवी पीढी री बैन बेट्यां नै अे गीत अंवेरणै री सीख दिरावां। आपणी बैन बेट्यां दादी-नानी रै सा’रै बैठ’र हथाई करै, हथाई रै मिस आं गीतां नै सीखै, बां रो मरम जाणै अर ब्याव उच्छब रै मौकै भुवा, काकी, मौस्यां सागै आवै जिस्यो ई गावै….। ज्यूं तिरणो सीखण सारू पाणी में उतरयां ई सरै, नाचणो सीखण सारू हाथ पग हिलावणा पड़ै, सागी उण ढाळै गाणो सीखणै सारू तो गावणो ई पड़सी ! बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं


