



रूंख भायला.
राजी राखै रामजी ! आज बात रातीजोगै री। ‘के बात ! देवउठणी ग्यारस नेड़ै आवतै ई राग-रंग री बातां, किणी ब्याव सावै री कूंकी पतरी पूगी दीसै, जणाई रातीजोगा चेतै आ रैया है !’ म्हारै तो चेतै आयोड़ा ई है, पण लोगड़ा भूलता जा रैया है भई। थेई चेतो करो दिखाण, पैली हरेक कूंकूं पतरी में रातीजोगै रो जिकर होवतो, तारीक रैवती रातीजोगै री, सै फूफां-जंवाई, सग्गा परसंगी मोड़ा बेगा आया रैवता उण दिन, पण आज…..! घणकरी कूंकू पतरयां में तो विगत ई कोनी मिलै रातीजोगै री, हां ‘लेडिज संगीत’ जरूर लाधै, थे ई बतावो, उण नै रातीजोगो कियां कैवां !

आपणी संस्कृति में तो रातीजोगै री महिमा न्यारी ! गीतेरण लुगायां रै तो उण रै नांव सूं ई घूघरिया बंध जावै। बंधणा ई चाइजै, रातीजोगै में मंगळ गाइजै, मोद मनाइजै, मैंदी मांडिजै, काजळ पाड़ीजै, सूंठ मसरको बणाइजै, अधरातियो करीजै, गीतां रै मिस देई देवता अर पितरां नै रिझाइजै। आनंद ई आनंद..। खास बात आ कै रातीजोगै रो आनंद फगत लुगायां रै पांती है, आदम्यां रो कोई काम कोनी, बां सारू तो जागण अर जम्मा है, जे कोई लगावै तो !

ब्याव उच्छब रो मौको होवै का पछै देवतावां अर पितरां री ध्यावना, घरां में रातीजोगो लगावण री जूनी परम्परा है आपणै। रातीजोगा में आपरै देई देवतावां, जोगमाया अर पितरां री ध्यावना करीजै जिण सूं मंगळ बेळा में बां री किरपा अर मैर बणी रैवै, कोई बिघ्न बिजोग नीं पड़ै। ब्याव उच्छब नै छोड देवां, तो भी आपणै अठै हड़मानजी, माताजी, भैंरूजी, पितरजी अर भौमियोजी रै नांव सूं न्यारा निरवाळा रातीजोगा लगावण री रीत पाळीजै। जे घर परिवार में कोई अबखाई आ जावै, कोई आस पूरी नीं होवै तो लुगायां देवतावां अर पितरां रा रातीजोगा बोल देवै। आस पूरीजतां ई रातीजोगा तो देवणा ई पड़ै, देवतावां नै रूसाण्यां पार कियां पड़ै !

मा बतावै, रातीजोगो सरू करण सूं पैली घर री बडेरी धणियाणी सिंझ्या पौ’र में देई थानां में घी रो मोटो दीवलो चासै, गुड़, आखा अर जळ रै कळसै सूं रातीजोगै री थरपना करै। लुगायां देई देवतावां सामीं माथा टेकै, धोक देवै अर बठैई जाजम बिछाय’र सरू करै रातीजोगो। ब्याव रो मौको होवै तो ब्यावलै छोरै का छोरी नै ई धोक दिराइजै। गीतेरण लुगायां जद बिना किणी साज-बाज रै आपरै कंठा सूं आलाप लेवै, अर गीत उगेरणा सरू करै तो भगतीभाव रो अेक न्यारो ई समों बंध जावै। रातीजोगै में बिंदायक जी नै सैं सूं पैली गाइजैै-‘रणतभवन सूं आया बिनायक/आय उतरिया हरियै बड़ तळै/ढूंढत ढूंढत नगर ढिंढोरो, घर तो बताय देवो ‘फळाणारामजी’ रो…।’उण रै पछै पांच गीत देवतावां अर पितरां रा गावण री रीत है। आखी रात भांत-भांत रा गीत उगेरती लुगायां रा भाव अर भावना सूं इस्या रंग लागै कै कांई कैवणो !

रातीजोगै में ‘मैंदी’, ‘चा’ अर ‘नींद’ रा ई गीत होवै, बानगी देखो-‘उण घर जाजै म्हारी नींद जिण घर राम-नाम नीं होवै…।’ गीतेरण जाणती होवै तो ‘जैतल’ भेळै ‘जसमल ओडणी’ रा गीत ई गाइजै। कैबत ई है ‘गुड़ बिना क्यां री चौथ, जैतल बिना क्यां रो रातीजोगो !’ रातिजोगो तो मैंदी बिना ई नीं लागै, मैंदी घोळ्यां पछै पैली देई-देवतांवां रै चढाइजै पछै गीत गावती लुगायां आपरै हाथां पर लगावै, ताबै लागै तो भुवा अर मास्यां तो पगथळ्यां रै ई थेथड़ लेवै। रातीजोगै में काजळ पाड़नै री रीत है, आप कैय सको, काजळ बणाइजै। आखी रात जगतै रातीजोगै रै दीवलै पर थाळी, का तवै री अडेखण करीजै, गीत गाइजै-‘जग म्हारा दिवला झबरकै री बाती कुणां रो तेल बळै अधराती…’ दीवलै सूं उठती लाट रो काळमिस अडेखण पर भेळो होबो करै, दिनुगै तंई काजळ त्यार ! एक और चीज है, सूंठ मसरकै बिना क्यांरो रातीजोगो, आ तो पुरसादी है रातीजोगै री। गीतेरण लुगायां रै कंठा सारू मिसरी, खोपरो, काळी मिरच अर सूंठ नै रळा’र कूटै, जद बणै सूंठ मसरको। गावण नै तो रातीजोगै में ‘कूकड़ो’ ई गाइजै, जिण सूं ओ ठाह लागै अबै रातीजोगो पूरो होवणआळो है। आं गीतां री चरचा बगत सारू फेर कदेई करस्यां।

गांम में तो अजेस ई रातीजोगै री रीत नै सांगोपांग निभाइजै पण सै’रदारी में रातीजोगो लगावणो अबखो काम, गीतेरण लुगायां लावां ई कठै सूं ! अेकलपो भोगतै परिवारां में बेटी-बीनण्यां तो लोकगीतां स्यार जाणै ई कोनी। इयां लागै, मोबाइल जुग में कंठां सूं कंठां तंई चालती लोकगीतां री जातरा अबार ठमगी है, आगै कुण बधावै। जे मोल री गीतेरणां कठैई लाध ई जावै तो बां में सूं घणकरी तो गीतां रो गुड़ गोबर कर देवै, कोई टप्पो किणी गीत रो, कोई लैण कठैई री…कोई राग नीं, कोई टेर नीं। मा नै तो भोत झूंझळ आबो करै इसी गैलीसप्पी गीतेरणां पर, बै सदांई कैवै, आपणै लोकगीतां सूं छेड़छाड़ नीं करणी चाइजै, माण घटै गीत अर गावणियै रो ! पण मा नै कियां समझावां, माण तो सांचाणी घट रैयो है, कियां ढाबां ! ब्याव सूं अेक दिन पैली होवतै रातीजोगै री तो
लोग लीक पीटता दीसै। बै आजकलै दो दिन पैली ई रातीजोगो लगा देवै, क्यूं कै सागी दिन तो ‘लेडिज संगीत’ है नीं !

पण इण ‘लेडिज संगीत’ रा रंग देखां तो भोत ई अपरोगा लागै। कानफाड़ू डीजे पर ज्यादातर भूंडा गीत बाजता रैवै, लुगायां अर छोरियां मटकबो करै। ना गाणो जाणै ना बजाणो, गीत कोई होवै, बस मटकणो है। आं गीतां रा बोल जे सावळ समझ लेवै तो बां रा कान खुस’र हाथां में आ जावै। डीजे रै अेक चावै गीत री बानगी देखो, ‘जदों नचे भैण दी, पूरा लंडण ठुमकदा…।’ क्वीन फिल्म रै इण भूंडै गीत रा अंतरा सुणां तो लागै, लिखणियै जमां ई पत रेड़ दी होवै, ‘लट्ठै दी चादर उत्ते हनीमून रख माहिया, मेरा की साइज है, दस माहिया….!’ कुलखणै कवि पंजाबी संस्कृति रै अेक भोत सांतरै लोकगीत री इसी-तिसी कर दी, जिको इण भांत है, ‘लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया, आवो सामणे कोळों दी रूस के नां लंघ माहिया…।’ कोई के करल्यै ! अबै थे ई बतावो, साइज रा नपूछा लेवतै इस्यै चलताऊ गीतां पर जे आपणी बैन-बेट्यां नाचौ, पछै पोत तो चौड़ै आयोड़ा ई है आपणा अर आपणी बिडरूप होवती संस्कृति रा…। आवो भलंई, लेडिज संगीत बिना क्यांरा ब्याव ! चार घंटां रै इण रोळैरप्पै में ‘फ्लोर डीजे’ आळो भाइड़ो ई आखतो हो लेवै, ‘ओ नंई, बो लगावो, बो नंई…बो…हां हां…ओ…नंई….नंई बो…..वोल्यूम फुल करो….और तेज’। बस इण सूं बेसी कीं नीं है लेडिज संगीत में…।

आज री हथाई रो सार ओ है, कै रातीजोगै रै गीत राग री संस्कृति नै कियां ई बचावां, दादी-नानी अर घर री बडेरी लुगायां आपरी बेटी-बीनण्यां नै लोकगीतां रा संस्कार सूंपै, भेळा बैठ’र गावै, जणाई आपणी पिछाण बंचौला। रातीजोगै में गाइजण आळै गीतां रा रंग अर ठसक घणी न्यारी है, जैतल, जसमल ओडणी, मैंदी, नींद, काजळ सणै अेक-अेक गीत पर लाम्बी हथाई हो सकै, पण हथाई रै रसियां नै बगत रो चेतो राखणो, जोगमाया री मैर बणी रैवै, आं गीतां पर चरचा आगली हथाई में…..। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक हिंदी और राजस्थानी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं



