



रूंख भायला.
राजी राखै रामजी! आज बात लोक ब्यौहार री, उण में आयै बदळाव री। बात पेटै ही बात करां, तो अबार आपणी मनगत घणी बदळगी है। पहली जद कदेई कोई माड़ी बात होवती, लोग कैवता, ‘दाबो… बात नै दाबो!’ लोक ब्यौहार ई ओ हो, गंदगी नै उपणनो नंई, बांस पसरै चौफेर, चुगली चांटै नै कुण आच्छो बतावै। पण आज घड़ी …. जावण देवो, के पड़्यो है!
लोक री एक जूनी बात कैवूं, जे कीं पल्लै पड़ै ई तो! एक राजा हो, बडो नेमी धरमी। बण एक भोत मोटो यज्ञ करवायो, छेकड़लै दिन बण बामणां सारू घणी सरधा सूं खीर खांड रा जीमण बणवाया। भागजोग कैवो का जोगमाया रा रंग, आंगणै में जद राजाजी रा रसोइया खीर बणावै हा, उणी बगत आभै में एक चील उड़ती फिरै ही। उण री पंजाळी में एक जीवतो सरप दबेड़ो, बो काळो सरप बचाव सारू ताफड़ा तोड़ै हो, बण चील रै पंजै में डसणै सारू झै‘र री फूंकार छोड़ी। उणी झै‘र री दो-चार बूंदां आंगणै में बणती खीर में जाय पड़ी, कीं ठाह नीं पड़्यो, कुण नै ई।
अबै बामण जिका जीमण सारू आयोड़ा हा, झैश्रीली खीर खावणै सूं बां सगळां री मौत होगी। राजा जी नै इण ब्रह्महत्या सूं भोत पिछतावो होयो, मटी आ के बणी, पून्न करतां पाप ! पण करै ई के !!
धरमराज रै ई गळदाई होगी, इण हत्या रो पाप किण रै खातै में खतावां ?
(1) राजा …. जिकै बामणां नै जीमण रा नूंता दिया।
(2) रसोइया …. जिकां जीमण बणायो अर पुरस्यो।
(3) चील …. जिकी काळै नै दाब्यां आभै में उडती फिरै ही।
(4) सरप…. जिकै झैर री फूंकार छोडी ।
बात तो न्याव री ही, कुण डंडीजै। धरमराज कन्नै आ फाइल इणी घरळ-मरळ में अटक्योड़ी पड़ी ही, के करां !
बिन्नै धरती पर थोड़ा‘क दिनां पछै दूजी नगरी रा कीं बामण दिखणा री आस में उणी सागी राजा रै दरबार में जावै हा। मारग में बांन्नै एक लुगाई मिली, जिण सूं बां दरबार रो रस्तो पूछ्यो। बण लुगाई मारग री सीध तो कर दी पण ओ भी कैय दियो-
‘देखो बिरामण देवता ….कीं ख्यांत राख्या …. बो राजा थारै जिस्यै बामणां नै झै‘र देयश्र मरवावै है !’
बस ज्यूं ई बा बोली, धरमराज
अटक्योड़ी फाइल रो फैसलो ले लियो। आपरै दूतां ने बो पाप इण लुगाई रै खातै में खतावणै रो हुकम दियो।
दूत बूझ्यो-परभु इयां कियां ? ब्रह्महत्या में उण लुगाई रो कांई दोष है
धरमराज बोल्या-‘देखो जद कोई मिनख पाप करै तद उण नै थोडो घणो आनंद आवै, पण बां बामणां री हत्या सूं ना तो राजा राजी होयो …. ना ही बां रसोइयां नै आनंद आयो …. …. अर ना ही उण चील नै कीं मिल्यो….. सरप रो कैवणो ई कांई, बण तो लाई मरतोडै झै‘र री फूंकार छोडी ही ।
उण माड़ी बात नै दाबणो चाइजो हो, पण बीं लुगाई नै तो बात आगै बधावण में चुगल रस रो अणूतो आनन्द आयो, इण सारू राजाजी रै उण अणजाण पाप-कर्म रो फळ अबै इण लुगाई रै खातै में घालणो ई न्यावू बात है।’
जणा ई कैवां, माड़ी बात नै सदांई दाबणी चाइजै, आगै पुरस्यां उण रो पाप आपरै खातै में खताइजसी।
तो पछै…..बगत रो कैवणो है, बाकी बातां आगली हथाई में… बात दाय आई होवै तो आगै सीर कर देया। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं






