




रूंख भायला.
कुण जाणै, विख कुण के पाण पड़ैगो
अर इमरत कुण ले जावैगो आपणीं लैरां…
राजी राखै रामजी ! आज बात ‘पानखर में प्रेम’ री। पानखर बोलै तो पतझड़…। लारलै दिनां आपणी भासा में अेक नवी कविता पोथी आई है, धूर हाड़ौती सूं। हाड़ौती कैवो तो कोटा-बूंदी रो इलाको, जठै गीतकारां अर कवियां री अेक भोत सांतरी परम्परा है। उणी रीत में बधेपो करती इण पोथी में प्रेम नै लेय’र सांतरो रचाव है, फूटरा बिम्ब है, हाड़ौती री मीठी मुळक है, सोचूं, ‘हेत री हथाई’ रा पाठक आज इण पोथी चरचा रो आनंद लेवै।
…तो सुणो, आपणै लोक में प्रेम रो ताणो भोत ई सरलता सूं गूंथीज्योड़ो है, बिना किणी सांधा जोड़ी, किणी गांठ रै। बुल्लेसाह तो अठै तंई कैयो है, ‘बुल्लया दिल नूं की समझावणा/अेत्थों पुटणा ते ओत्थे लावणा’। घनानंद री ओळयां ‘अति सूधो स्नेह को मारग है, जहां नेकू सयानप बांक नहीं’ इण बात री साख भरै। ‘प्रेम गली अति सांकरी…’ का फेर ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो ना कोई…’ सिरखा भाव सरलता री उणी रीत नै निभावता लखावै जिकी जुगां-जुगां सूं मिनख री संवेदना में प्रगटीजती रैयी है। प्रेम बा भावना है, जिण नै मैसूस करण सारू आपनै प्रेम में होवणो पड़ै। जिण ढाळै आप नदी में उतरयां बिना तिरणो नीं सीख सको, हाथ-पग हलायां बिना नाचणो नीं आ सकै आपनै, उणी ढाळै प्रेम में पड़्यां बिना आप उण नै सावळ अरथा नीं सको, जी नीं सको। साची बूझो तो प्रेम निराकार है अर उण रो विस्तार अनंत, जिण नै फगत आदमी लुगाई, का भौतिक जगत रै दूजै सगपणां में नीं बांध्यो जा सकै। समदर कान्नी भाजता नदी नाळा होवै, का थार रै आभै मंडयोड़ी बादळी, बां में जिकी कशिश है, खिंचाव है बो भी तो अेक निरवाळो रूप है प्रीत रो। ओशो प्रीत रै इण भाव नै भोत गैराई सूं अरथायो है, जठै प्रेम छेवट जावतो ध्यान अर अध्यात्म रो रूप धार लेवै।
प्रेम में मिलणै अर गमणै री दुनियावी बातां भोत बार कथिजी है, पण म्हूं सोचूं, प्रेम में होवणै नै लेय’र अजेस भोत कीं कैवणो बाकी है। कदास इणी बाकी री भरपाई करणै री खेचळ है, कवि अतुल कनक री पोथी ‘पानखर में प्रेम’। हाड़ौती री निरवाळी मठोठ में रचिज्योड़ी अे कवितावां प्रीत री रीत अर मिनखा जियाजूण रै सांच नै आपरै ढंग सूं अरथावै। हिंदी, राजस्थानी अर अंगरेजी रा चावा ठावा लिखारा अतुल कनक आज घड़ी देस दुनिया में आपरी निरवाळी पिछाण राखै, बां रो रचाव सदांई सबदां रै सांच नै अरथावणै रो अेक भरोसो दिरावै।
इण पोथी रै रचाव में कवि आपरी मनगत में उठतै दरद अर प्रीत रै भावां नै सबदां में ढाळनै री खेचळ ई नीं करै, सवाल हो का भलंई ऊथळो, बो बान्नै अेक ठावी ठौड़ तंई पुगा’र छोड़ै। कवि री इणी खिमता रै पाण बां री ओळ्यां अपूरण सूं पूरण होवती जावै। कैवण नै कवि इण रचाव नै अेक ‘नारसिसिस्ट’ री कवितावां बताई है जिको फगत आपोआप नै निरख परखबो करै पण साची बात तो आ, कै आं कवितावां रै मनोभावां में कठैई खाताई कोनी, प्रीत रै मारग रा ठहराव है, घड़ीभर री बिसांई है, जियाजूण रा सांच है, अेक धिरजाई हैै जिकी अंतस री गै’राई में उतरयां बिना उकळै ई कोनी। ओ रचाव अेक उंडी दीठ अर मून रो भोत सांयत वातावरण मांगै जिण में सबद अर मन अेकाकार होय’ भावां नै रचौ जिका पाठक रै हियै तंई बिना किणी दोराई रै जा पूगै।
अतुल कनक रै हिड़दै में जोगमाया रो ठावो भरोसो है, होवणो ई चाइजै, जगती रो आधार रै मा ! जणाई बै बरसां सूं नौरतां में सगती मां री ध्यावना करै अर नौ दिन मून राखै। कविता री सीख अर बिंब इणी मून सूं ऊपजै। बै इण बात नै हंकारता थकां लिखै भी है-‘यो मून ई म्हारै तांई सबद की तागत समझावै छै। कोय करड़ी परख होवै, बोलबो जाबक जरूरी सो लागै अर उं बगत मून को बरत धारयो होवै, तो कष्यो लागैलो !’
इणी संग्रै री अेक कविता ‘ले, बता..’ में ओ कवि मून रै पेटै आपरी प्रीत सूं बूझै-
थं ने क्ही के भरी पड़ रैयो छै/थं पे म्हारो बोलबो/ले म्हंनै मून धार लियो…/बता कतनो हळको होग्यो/म्हं सूं नाळो होबा को थारो दरद ?
आं कवितांवां में प्रीत रै ओळै-दौळै गूंथीज्योड़ा सवाल जवाब इत्ता सरल अर ग्राह्य है कै बांचणियो बां री संवेदना रै साथै बैवण लागै। स्थूल अर सूक्ष्म रो भेद करे बिना, मनगत नै अेक जिग्यां टिकाय’र, आपरै चौफेर इण ढाळै बांध लेवणो, कै सो कीं बंधनमुगत होय’र आपोआप उघड़ जावै अर उण री सोरम आपनै देर तंई हरखावती रैवै तो कैवणो चाइजै आप ‘पानखर में प्रेम’ नै बांच रैया हो। दुखां रै पेटै कवि रा भाव सीधा आपरै अंतस उतरै- ‘दुख की कोय जात न्हं होवै, दुख को कोय डील न्हैं होवै। दुख ऊंको ई होवै छै जे ऊं ई महसूस कर सकै।’
संगै्र री पैली कविता ‘बगत छै’ में चार चितराम है। पैलड़ो चितराम ई सवाल खड़्यो करै-
बगत छै/अश्यो ऊंळो होवै छै कदी-कदी/के वां सूं ही आथड़नो पड़ै छै म्हांई/ज्यां के बेई/सगळी दुनिया सूं लड़ जाबा की हूंस होवै छै….।
‘भरम’ कविता में प्रीत रै मिस कवि भळै अेक सवाल उठावै-
हेत न्हं र्म यो अबार भी/पण मरगी/थंई बांथ में बांध्या रहैबा की वांछा/थंनै ओळमो दियो/कै म्हंनै परदेस की सैर न्ंह कराई थारै तांई/अर म्हूं बावळो यो ही मानता रैयो/के म्हारां साथ में ही/सगळो संसार दीखै छै थारै तांई….
अेक नारसिसिस्ट कवि री मनगत भी प्रीत सूं अळघी नीं हो सकै। आपरी ठसक में बो प्रीत सामीं तो मुजरो ई करै। बानगी देखो दिखाण-
थं नै कही/तो स्यात नारसिसिस्ट ही होऊंगो म्हूं/म्हूं तो हरमेस कहूं छूं/के म्हारै तांई/म्हैं सूं बत्ता तो/तू जाणै छै….
मांझल रात में इण कवि रो भटकतो मन सवालां सूं र्घि यो रैवै। उण रा सवाल कविता में खुद जवाब बण जावै, आगै कीं कैवण री, पूछणै री दरकार ई नीं रैवै। ‘मांझल रात’ कविता बांचो दिखाण-
अेकलो भटकूं छूं/घर का पाछी हाळी सड़क पे/मांझल रात में/कोई सुपनो भटकतो मिलतो/तो पूछतो उं सूं/कांई थं नै भी कोय का हेत पे/पतियारो धर्याे छै ?
‘रूंख पे ऊदियां’ कविता बांचां तो ठाह पड़ै, प्रीत रै पेटै उकळता सागी सवाल कवि री मनगत रै पधेड़ियां माथै हर घड़ी किणी बेताल दांई चढ्या रैवै।
तड़कै जांऊ छूं जद घूमबा/गैला में देखूं छूं अेक रूंख/रूंख पे छै ऊदियां मनमान/ऊदियां चट करगी जीव रूंख रो/रूंख कतई सूखो छै यां दनां/म्हूं रूंख के सौढे खड़्यो खड़्यो सोचूं छूं/ कांई ईं रूंख ने भी प्रेम र्क यो छो कोय सूं ?
पानखर में प्रीत रा पानड़ा आप बांचो तो सवालां भेळै कवि मन में अेक हरियल आस आपनै सदांई निगै आवैली। भलंई इनबॉक्स, ई-मेल में प्रीत रा कोई सनेसो नीं लाधै पण फेर ई कविमन हाथ जोड़ै-हे परमेसर/आज की नांई/क्हाल भी म्हारी आस जीवती रखाणजे…!’ इणी तरियां ‘भरोसो’ कविता में कवि धीजो राखतां थकां कैवै-‘आस की जड़ां हरी रखाणो/जे जड़ां हरि रही तो सुख फेरूं हरियावैगो…। आ आस ई तो जियाजूण रो आसरो है, नीं पछै प्रीत पांघरती ई कियां !
कवितावां बांचां तो ठाह लागै, कवि अतुल कनक कन्नै प्रीत रै पेटै फगत सवाल ई नीं है, सवाल-जवाबां रै बिच्चाळै कवि नै प्रीत रो पतियारो ई सागीड़ो है। ‘हेरबो’ कविता इण री साख भरै-
घर की सगळी चीजां तो/थं ने ही धर मेली छीं अठी उठी/हेरबो चाहूं छूं घणकरी चीजां/पंण न्ंह मिले लाख जतन करबा पे भी/थारे बगैर/म्हूं तो आपणै तांई ही न्हैं हेर पा रैयो छूं अबार…..।
हर कवि कन्नै अेक निरवाळी ताकत होवै, सबद री ! आ ताकत उण नै सदांई हौसलो देवै जिको बो सबदां रै मिस जगती नै सूंपै। इणी सगति रै पाण बो अबखायां में आस नै जीवती राखै। इणै संग्रै रो कवि सागी बात कैवै, ‘पानखर लाम्बो हो सकै छै अम्मर न्हं हो सके कदी भी।’ आपां जाणां, पीळै पानड़ां रो झड़नो ई आगत है बसंत री, दुख अर सुख तो बारीबंटा है जियाजूण रा। ‘पानखर भी जरूरी है’ कविता में जियाजूण रै सांच नै अरथावतो कवि कैवै-खिरेगा पात, तो खिरबा दो/पानखर भी जरूरी है…।’
इण पोथी में प्रीत नै अेक निरवाळी दीठ सूं अरथावती आं कवितावां री घड़त तो सांतरी है ही, भासायी दीठ सूं भी पाठक रै हियै में हाड़ौती री सोरम फूटबो करै। कविता रो फूटरापो ई इणी बात में है कै भावां रै साथै कवि री भासायी पकड़ कित्ती’क सबळी है। पोथी रो मोल ई फगत 250 रिपिया है, जिको समैं देखतां कोई घणो कोनी। बात रा टका तो लागै ई पछै ! जे आप राजस्थानी में रचाव रा सांतरा आधुनिक रंग अर बुणगट बांचणा चावो तो आपनै ‘पानखर में प्रेम’ भणनी चाइजै।
बाकी बातां आगली हथाई में…..। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं







