




रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आज बात राड़ री, राड़ आडी बाड़ री। राड़ नै कुण चोखो बतावै, सगळा कैवै-‘राड़ रो मूं बाळ’, पण राड़ तो राड़ है, जचौ जठै, अर जचौ जणा हो जावै। नीं पछै पिताय’र देखल्यो ! घर में, गळी में, गवाड़ में, समाज में, देस में, दुनिया में… राड़ करता लोग आधी रात नै ई लाध जासी। के आदमी के लुगाई….,लड़ै जणां गाळमगाळ, झींटमझींटा, थापामुकी, कस्सिया, कुहाड़िया, बंदूकां तकात….। इयां लागै, लड़नै में जिनावर सूं भोत आगै है आदमी !
धिरजाई रो पाण आयां पछै राड़ होवै तो बात समझ आवै, पण उच्छळभाठो लेवणियां री….! जावण द् योे के पड़्यो है ! राड़ रै मूळ में ज्यादातर लालीबाई री लपलप होवै जिकी सगळां रै मूंडै में लपलपावै। आपां जाणां, राड़ छोटी सी बात सूं सरू होवै, का पछै किणी बै’सबाजी सूं, पण आकासां चढतां उण नै जेज नीं लागै। कदैई-कदैई तो आंगळी लगावणिया ई मजा लेवण सारू राड़ नै चक देवै। बात कीं नीं होवै पण मिनख मरा देवै आ राड़, लंका क्यूं बाळिजी, महाभारत क्यूं रचीज्यो, आपां चोखी तरियां जाणां।
किरपाराम खिड़िया आपरै अेक सोरठै में कैयो है-
‘रोग अगन अरू राड़, जाण अलप कीजै जतन
बधियां पछै बिगाड़, रोक्यां रैवै नी ‘राजिया’
हारी बेमारी, आग अर राड़ नै तो छोटै रूप में ई मेट लेवणो चाहिजै, नीं बधियां पछै बिगाड़ ई होवै। अबार इरान अर इजरायल री राड़ नै ई देख लो, सिलगी अर सिलगी। धिंगाणियो गोधो अमेरिका इण लड़ाई में फदड़पंच बण्योड़ो है। बेटो ट्रम्पड़ो कैवै-‘इरान नै पीळो मुतास्यां !’ बो गैलसप्पो जाणै ई कोनी, अकड़ तो सोननगरी रै राजा रावण री नीं रैयी, पछै थारै जिस्यां रो तो बटै ई के ! राड़ करयां राखो लाडी, पण बारूदी आणविक आग री लपटां जद थारै गाभां तंई पूगसी, थान्नै ई भेळो बळनो पड़सी।
आ जरूर है, कै अबार इण जुद्ध में इरान रो खासा नुकसान हो रैयो है, पाड़ौस्यां रै ई कीं जूत पांती आया है। कूटीज्या तो अमेरिका अर इजरायल ई है, पण बै मारकणा पाडा है, दो चार गदीड़ां नै कद धारै बै ! सुणनै अर देखणै में तो आ राड़ फगत दो-तीन देसां बिच्चाळै है पण आज घड़ी जद कठैई जुद्ध मंडै, आखी जगती उणरी जद में होवै। पच्छिम में अेक कैबत है-‘जिको जुद्ध नै नीं जाणै, उणनै जुद्ध मीठो लागै’। जुद्ध री बिडरूपता अर डरावणपणै पर कोई सक, सूबो नीं हो सकै पण जुद्ध सूं भी माड़ी भोत सी चीजां है। खास बात आ है, कै जुद्ध अे सगळी चीजां आपरै साथै लावै। दुखां री पराकाष्ठा, मतलब छेड़ो आ लेवै दुखां रो, जेकर कठैई जुद्ध मंडै। कैवण नै ढाई आखरां रो सबद है ओ जुद्ध, पण सबदकोसां में सैं सूं डरावणो गिणीजै।
इणी बाबत राजस्थानी रा चावा लिखारा सत्यप्रकास जोशी री अमोलक पोथी ‘राधा’ चेतै आवै। इण काव्य पोथी में राधा महाभारत रै जुद्ध नै टाळनै सारू किरसण सूं भोत गळगळी होय’र अरज करै, लगै हाथ कीं अंस बांचो-
मन रा मीत कान्हा रै
मुड़जा फौजां नै पाछी मोड़ ले….
जग में जे मंडग्यो घमसांण, तो
भाई पर भाई करसी वार,
आपस में लड़सी, मरसी मानखो।
चुड़ला फोड़ैला काळा ओढ़,
अमर सुहागण थारी गोपियां।
कांमणियां बिकसी बीच बजार,
कुण तो उघड़ी बै‘नां नै ढांकसी।
पिरथी पुरखां सूं होसी हीण,
टाबर कहासी बिना बाप रा।
कुण करसी धीवड़ियां रो ब्याव,
कुण तो कडूंबो वांरो पाळसी !
अणगिण मावडियां देसी हाय,
मुड़जा, फौजां नै पाछी मोड़लै….
मन रा मीत कांन्हा रै
जग मे जे मंडग्यो घमसांण, तो
कोयल कुरळासी बागां मांय,
नाचता थमसी बन में मोरीया
चीलां मंडरासी हरियै खेत,
गीधण भंवैला सगळै देस पर।
डाकणियां रमसी रात्यूं रास,
चौसठ जोगणियां खप्पर पूरसी।
धरती माता रौ लागै स्त्राप,
मुड़जा, फौजां नै पाछी मोड़लै…
मन रा मीत कांन्हा रै
आजा रे दूधां धोल्यां हाथ,
मुड़जा फौजां नै पाछी मोड़लै।
गोरस माखण सूं रंगल्यां होठ,
मुड़जा फौजां नै पाछी मोड़लै।
आजा रे ओज्यूं रमल्यां रास,
मुड़जा फौजां नै पाछी मोड़लै….।
जुद्ध हो का राड़, उण रो अेक दूजो पख भी है, उण पर भी बात करां। ओ पख है अन्याव रो ! जेकर दुनिया रै किस्यै ई कूणै में अन्यावू बात होवै तो उण रै सामीं बोलणो चाहिजै, खरी अर खारी बात कैवणी चाहिजै। इण डर सूं कै राड़ होसी रै…, बळन दो…, आपणो कांई है…, तो माफ चावूं, आप अर आपरो मिनखपणो घणा दिन को धिकै नीं। सागी अन्याव आप नै ई भुगतणो पड़ सकै।
‘मनुस्मृति’ रै अेक सुक्त में जुद्ध पेटै भोत सांतरी बात मांड्योड़ी है, ‘बस पूगता जुद्ध नीं करणो, पण जे अणबसी में करणो ई पड़ै तो लारै नीं सिरकणो चाहिजै ! जुद्ध सदांई धर्म संगत होवणो चाइजै। मनुस्मृति जुद्ध रा काण कायदा ई बतावै, उण रै मुजब लुगाई, टाबर, बूढा, पांगळां अर घायलां पर वार नीं होवणो चाहिजै, दिन ढळ्यां पछै जुद्ध करणो मिनख मरजादा रै खिलाफ होवै है जुद्ध…। बगत भलंई बदळग्यो होवै, मनु री बात में तत है, सार है।
चावा कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ ई आपरी अेक कविता में राड़ रै पेटै भोत सांतरी बात राखै-
तू पून मांगै तो बै राड़ करै/तू सूरज रो तावड़ो मांगै तो बै राड़ करै/तू आभै नीचौ बैठणो चावै तो बै राड़ करै/तू बोलणो चावै तो बै राड़ करै/तो बता-/ इण राड़ आडी बाड़ कित्ता’क दिन करसी/छेकड़ आ राड़ तो होवणी ई है/होवण दे/जकै भूत सूं तू डरै/बो भूत नीं भूताड़ है/बीं नै टाळ दे/ थारै सगळै रोगां री जड़/आ बाड़/ईं नै बाळ दे !
अन्याव रै सामीं तो लड़नो मिनख री पिछाण है। पंजाबी रा चावा कवि अवतार संधू ‘पाश’ लिख्यो है, ‘लड़ो, लड़्यां बिना कीं नीं मिलै’। वां री अेक कविता है-
‘म्हे लड़ांला भायलो/उदास मौसम रै खिलाफ/म्हे चुणांला भायलो जियाजूण रा टुकड़ा…/ म्हे लड़ांला, म्हे लड़ांला, म्हे लड़ांला….।’
गळत बात पर आपनै रीस आणी ई चाहिजै, मानखै री आ ई पिछाण है। पण इण रो मतळब ओ कोनी कै राड़ करण लाग जावां। पैलपोत बंतळ रै मारग सूं अन्याव रो निबेड़ो होवणो चाहिजै, बस पूगतां गळती सुधारणी चाहिजै। अर जे पछै ई बात नीं बणै, तो फेर मनुस्मृति री सीख अंगेजणी चाहिजै।
आज री हथाई रो सार ओ है कै बस पूगतां राड़ नीं करणी, ना घर में, ना बास में, ना देस में अर ना ही समाज में….। बातां सूं बात नै परोटणो चाहिजै, आ ई स्याणप है। बाकी बातां आगली हथाई में…..। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी व हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं




