




रूंख भायला
राजी राखै रामजी ! आज बात भासा री, भासा सारू खेचळ खावतै आपणै टाबरां री ! जैपर में राजस्थान विश्वविद्यालय है, कैवै तो जगतपोसाळ !! इणी जगतपोसाळ में आपणा कीं टाबरिया लारलै पांच दिनां सूं भूख हड़ताल पर बैठ्या है, बांरी मांग है, जगतपोसाळ में राजस्थानी भासा रो अलायदा विभाग खोल्यो जावै।
आपां नै ठाह होवणो चाइजै, 1947 में राजपुताणा विश्वविद्यालय रै नांव सूं थरपीजी, राज्य री सैं सूं जूनी जगतपोसाळ है राजस्थान विश्वविद्यालय। इण में अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत, उर्दू, पर्सियन अर विदेशी भासावां, जिण में फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश सामल हैं, रा विभाग बरसां सूं काम कर रैया है। पण कित्ती नाजोगी बात है कै आज दिन तंई राजधानी री इण जगतपोसाळ में ‘राजस्थानी’ रो कोई विभाग कोनी बण्यो। बणी तो बा ढकणी कोनी, जिण में आपां सगळा नाक डबो लेवां !
हथाई में आज बात राजस्थानी रो विभाग खोलणै, नीं खोलणै री कोनी करां। आपां तो जगतपोसाळ री कुळगुरूआणी, कुळमुखिया राज्यपाल, राज री सरकार, आपणा सांसद, आपणा विधायक अर राज रै सगळै अैलकारां सूं बूझणो चावां-
‘जे राजस्थान में राजस्थानी नीं, तो पछै कठै ? कांई आपरी मायड़ भासा भणन सारू टाबर गोवा जावै ? बठै कुण बड़न देसी भई ? जद जयनारायण व्यास वि.वि., जोधपुर, मोहनलाल सुखाड़िया वि.वि., उदयपुर अर महाराजा गंगासिंघ वि.वि. बीकानेर में राजस्थानी रा विभाग है तो पछै इण जगतपोसाळ में क्यूं नीं है ?, सरम री बात तो आ भी है, कै देस रो राज आपणै अठै रै केन्द्रीय विश्वविद्यालय, अजमेर में मराठी भासा विभाग तो खोल रैयो है, पण राजस्थानी रो कोई नांव नीं।’
अरे गैलसप्पो, चिड़ी, कबूतर कागलां सूं लगा’र सै जीव जिनावर आपरी भासा बोलै, फेर मरूभौम रै मानवी साथै ओ अन्याव क्यूं ? क्यूं थे कैवता कुहाइजता लोग आपरी भासा रै माण सारू हाको नीं करो ? क्यूं राज सामीं जाय’र पग रोप’र नीं कैवो-‘पैली भासा, पछै दूजा सगळा रासा’ ? देख्या कठैई थारै मांयलो लोई धौळो तो कोनी होग्यो ? अरे राज रा धणियों, आपरै चूंठिया बोड’र देखो दिखाण…थे जीवो तो हो के….कठैई मर तो नीं गया ?
थारा डोळ देख’र ई कदास गिरधारी सिंह पड़िहार लिख्यो होवैला-
सीख खड्यां ही सांझ, मोथा मिल्या मिलायदी
बजी मावड़ी बांझ, फरजन्द मूंछ्यांळा फिरै
हक भू भासा हाण, जनखां री जामण झूरै
अणहूतो अणमाप, क्यूं जीवो रे कायरां !
अरे गैलो, आ बात फगत भासा री नीं है। इण सारू चेत्यां आपणै टाबरां रो आगोत्तर भविख सुधर सकै, देस मांय आपां नै बरोबरी स्यूं जीवणै रो हक मिल सकै, कोर्ट कचेड़्यां में न्याव मिल सकै, आपणी पिछाण जीवती रैय सकै, मिनखपणै रा सैनाण बच सकै…। आपणा टाबर, आपणी जगतपोसाळां में आपरी भासा नीं भणैला इण सूं माड़ी बात पछै और कांई ? भांग रै कुवै सूं बारै निसरो अर कीं सोचो दिखाण !
…अर जे कठैई आपणी भासा री सबळाई पेटै थारै कीं गिरगिराट होवै तो आ जाण ल्यो कै आपणी भासा में दुनिया रो सैं सूं मोटो सबदकोस लाधै जठै अेक-अेक चीज रा पांच-पांच सौ पर्यायवाची मिलै। इण भासा नै अमेरिका सूं लगा’र नेपाल री संसद तंई मानता मिल्योड़ी है, दुनिया रा सै भासाविद् अेक सुर में आपणी भासा नै अेक सबळी भासा बताई है। आपणी भासा में 73 बोल्यां री ताकत है जद कै अंग्रेजी में 57, गुजराती में 27 पंजाबी में 29 अर हिंदी में 43 बोलियां ई लाधै। चेक विद्वान स्मेकल रै मुजब एशिया रो सैं सूं सबळो लोक साहित राजस्थानी भासा रो है। भासाशास्त्री जार्ज गियर्सन सूं लेय’र इतालवी विद्वान एल.पी.टेस्सीटोरी तकात आपणी भासा रा गुण गाया है। रेडियो, टेलिविजन सूूं लगा’र केन्द्रीय साहित्य अकादमी आपणी भासा नै मानै। कांई ठाह कित्ताई भणेसरी राजस्थानी में पीएच.डी. कर मेली है, कित्ता ई करण में लाग्योड़ा है। और पछै कांई प्रमाण चाइजै आपनै ?
सेठिया जी री बात चेतै करो दिखाण-
राजनीति री दीठ सूं बणग्यो राजस्थान
पण निजभासा रै बिना लागै ओ निष्प्राण
जे चावो दुनिया मिनखां दांई थारी कदर करै तो आपरी भासा सारू चेतो। मोटामोटी बात इत्ती सीक है कै जैपर में जिका टाबरिया भासा सारू हाको कर रैया है, बां री आवाज बुलंद करो। आपरा भाई बेली जित्ता भी जैपर में बिराजै, बान्नै हाकै सारू सनेसा पुगावो। वार्ड पंच सूं लेय’र सरपंच, विधायक, सांसद अर मंतरयां रा कान खैंचो, पूछो बान्नै कठै है म्हारी भासा ! चुनाव सूं पैली वोटां रै बौपार्यां नै ठोकबजा’र कैवो-
‘बात करां डंकै री चोट, पैली भासा पछै बोट।’
आज नीं तो कद, आपां नीं तो कुण ! बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो।
-लेेखक राजस्थानी व हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं






