

रूंख भायला.
राजी राखै रामजी! दियाळी री रामा-श्यामा, मूंडो मीठो करो दाळ रै सीरै सूं ! ‘हैं….!!’ हैं क्यां री, मीठै रै मिस आज हथाई में बात करस्यां दाळ रै सीरै री, बो ई सीरो जिको आपणै घणकरै घरां में बार तिंवार बणाइजै, बो ई सीरो जिको हेत सूं जनेत नै जिमाइजै, बो ई सीरो जिण री गोळ्यां बणा’र सग्गै परसंग्यां री मनवार करीजै, अर बोई सीरो जिकै नै बणावती बेळा मा अर जीसा का पछै धणी लुगायां बिच्चाळै ‘सीरा पुराण’ बंचौ !

…तो आपां ई खोलां, इण ‘सीरा पुराण’ रा कीं खाटा मीठा पानां….। आप सोचता होवोला, हथाई में दाळ रो सीरो ! आ के बात होई !! भई कीं बात तो है ईं सीरै में, इणरी मिठास में…। चेतै करो दिखाण ! लारलै दिनां ‘गगनयान मिशन’ पर भारत रा शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष में पूग्या तो आपां सगळा भोत घणा मोदिज्या। मोदिजणै री अेक और बात थान्नै बताय दूं, शुक्लाजी इण जातरा में मूंग दाळ सीरो ई साथै लेयग्या हा, ‘इसरो’ घणै चाव सूं बां रै साथै जीमण सारू लाडू, बूंदी अर कतल्यां री जिग्यां ओ ई सीरो घाल्यो। अबै आप कैय सको, आपणै मूंग दाळ रै सीरै री मिठास तो आकासां जा पूगी है। पूगै क्यूं नीं, ‘हलवै’ नै भलंई कोई अरब देस रो बतावतो होवै, ओ सीरो तो आपणी धरती यानी थळी रो जायो जलम्यो है, जिण नै बणावती बेळा सोरम अर मिठास तो बापरै ई, आजलग ई आपणै घरां में ‘सीरा पुराण’ चालती रैवै।

हेत रा पानां आगै बधावां। पण पैली तै करणो पड़सी, बंतळ में किरदार धणी लुगाई रा राखां का पछै मा अर जीसा र…, कांई फरक पड़ै। है तो दोनूं ई सीरै रा कारीगर, पण म्हारी जाण में मायत ई ठीक रैयसी, जे हथाई में कीं ऊकचूक होगी पछै कूटीजस्यां तो कीं कमती ! मा छियां तो पटकसी, नीं पछै आपणी जोड़ायत तो दे घुत पर घुत, पेमली डुक सणै चूंठियां…. बोक ई नीं सकां किणी रै सामीं….। फेर तो मा अर जीसा ई ठीक है, आगै राजी राखै रामजी !

काणती दियाळी रो दिन! मा रो सवाल ‘‘दाळ कित्ती’क भिजोवां…..?’’ बस अठै सूं ई आ ‘सीरा पुराण’ सरू होवै जिण में जीसा नै शुकदेवजी दांई ऊथळो देवण रो काम सूंपीजेड़ो है। आंगणै में अखबार बांचता बै आगै सूं कैवै, ‘‘देख लै…, थां सूं कांई छान्नो है !’’ पण ईं सुहावती बात नै कानां कुण धरै, भई, धणी लुगाई है बै तो…। दाळ भिजोवती मा बड़बड़ावै, ‘‘आन्नै कदेई कीं बूझल्यो, सावळ बतावै ई नीं….लोगां रा धणी बापड़ा सीरो बणाय’र चक्क्यां तंई काट देवै…..डब्बां में ई घाल देवै।’’ जीसा मन ई मन गावै, ‘ज्यांही बिधी राखे राम ताहीं बिध रहिए…!’

इण अेक तरफा बंतळ में किलो-डोढ किलो मूंग छिलका दाळ मा रै हिसाब सूं भीज जावै, पण जीसा कीं कोनी बोलै। बोलै ई कांई ! अजेस तो पुराण सरू होई है, आगै देखो। दाळ भीजणै सूं धोवण तंई रो सो भार मा पर है, इयां म्है टाबरिया ई कीं सारो लगावां पण बो किसी गिणती में….।
दाळ धुपगी तो मा फेर सरू, ‘‘दाळ पीसण में कित्ती अबखाई है, ठाह है के…..! इयां नीं कीं सारो ई लगा देवां…..आ मिक्सी बळै घड़ी-घड़ी बंद होवै…, दियाळी पर अेक मिक्सी ई बपरा देवता तो ई जाणती, कीं तो नवो लाया घर में…. इण सूं तो सीला-लोढो चोखो, दोरी सोरी पीस तो लेवती…।’’ पण शुकदेवजी बोलै कोनी, मुळकबो करै।

‘‘….देख्या सावळ पीसीजगी के ?’’ मा जीसा सामीं पीसेड़ी दाळ सूं भर्याे धामो करै। जीसा चस्मै री डांडी सावळ जचा’र आंगळी पर दाळ रो पेस्ट लगावै, उण नै अंगूठै सूं मसळ’र देखै-
‘‘कीं दरदरी लागै भई !’’
‘‘आछी लागी, … थान्नै कीं ठाह ई कोनी, सीरै में कीं मोटी राखीजै !’’ मा कैवै।
‘‘थन्नै ठाह है जणां म्हां सूं बूझै ई क्यूं ?’’
‘‘स्याणो कर’र बूझूं, पण थे किस्या सावळ बतास्यो, म्हूं ई गैली मरूं…!’’
बड़बड़ावती मा फेरूं रसोई में अर जीसा री आंख्यां भळै अखबार में….। थोड़ीक ताळ में दाळ री सिकाई सरू…..जीसा सदांई कैवै, ‘‘थारी मा दाळ सूं बेसी मन्नै सेकै !’’ पण मा रै कानां अे सबद पड़ै ई कोनी। मा रा तो आपरा सबद होवै, ‘‘देख्या सीकगी के….सुरम तो आवै…घी थोड़ो तो कोनी…..काची नीं रै जावै !’’
‘‘थारै आगै काची रैय जावै, कोई मजाक है के !’’ जीसा मा नै बिड़दावण री कोसिस करै। पण बै स्यात जाणै कोनी, काची रैवै भलंई, घणी सिकै, आ भूंड तो बां रै पांती ई घलसी, सावळ बतायो कोनी। पण जीसा तो जीसा है, जोड़ायत री बात नै कद धारै, भई धार्यां सरै ई कोनी।

चलो, दाळ तो आछी माड़ी सिकगी, जीसा री देखरेख में मा ओळमो झाल्योड़ो घीदार मावो ई रळा दियो उण सिकेड़ी दाळ में…। अबै सीरै पुराण रो सैं सूं चावो कांड सरू होसी, ‘चासणी कांड !’
चासणी मीठी, पण इण मिठास में चरकास घलतां जेज ई कांई ! मा भेळै जीसा ई उभ्या है रसोई में, संकर गवरजा सा। कडाही में कुड़छी हलावती मा अंगूठै अर तरजनी सूं चासणी री जाच करै, जीसा री आंख्यां सामीं करती बोलै ‘….देख्या ओ, तार बणै तो है के…. चासणी काची नीं रैय जावै…..चक्कयां चोखी बैठणी चाइजै !’ किणी पारखी कंदोई दांई जीसा ई आंगळी-अंगूठै सूं जाचौ, ‘‘अजे काची है…..दो तार पड़ना चाइजै….।’’ पण मा रै सबर कठै, ‘‘म्हानै तो लाग्या दो तार पड़ग्या… आ देखो….काठी ना करा देया…।’’ इणी चालती बंतळ में मा जीसा सूं हंकारो भरवा लेवै, ‘‘हां, अबै ठीक है !’’

पण आ ठीक तो चक्क्यां कटसी जणा ठाह लागसी। चासणी बैठी का ढीली रैयगी, इण री सगळी भूंड जीसा रै खातै खताइजैली। पाड़ौसण सूं लगाय’र मासी, भुवा अर मा री भायल्यां तंई बात पूग जावैली, ‘‘अबकै तो आं चासणी काठी कराय दी….ढीली रखाय दी….म्हूं तो घणोई कैयो हो, पण थे जाणीजाण हो, म्हारी तो सुणै ई कोनी !’’
जद तंई घर में ओ बणेड़ो सीरो निवड़ैला नीं, आ गांगरथ चालती रैयसी। मा अर जीसा होवै का पछै कोई दूजा धणी लुगाई, गिरस्त गाडो तो अेक रै मून धार्यां ई सावळ चालै, तिंवार रै मौकै आ ई सीख देवै ‘सीरा पुराण’।
आ सीरा पुराण जे आपरै घर में होई होवै, तो बताया दिखाण ! आज री हथाई रो सार ओ है, घरबीती बातां इयां ई चालती रैवै, जोगमाया री मैर बणी रैवै, बाकी बातां नवी बात रै साथै आगली हथाई में…..। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं

