

रूंख भायला.
राजी राखै रामजी ! आज बात प्रीत री, प्रीत री रीत री। हैं…..थारो मतलब ‘इलू इलू…’? इयां कियां ? अरे भई, इलू इलू रो नसो तो जित्ती खाताई सूं चढै उणी ढाळै उतर जावै पण प्रीत रो मद तो इस्यो है कै अेकर चढ्यो अर चढ्यो, उतरण रो बठै काम ई कोनी। थे ई बतावो, जिको सिंझ्या ढळतांई उतर जावै उण नै प्रीत कियां मानां !
‘मैं थान्नै भोत प्रेम करूं’ आ बात कैवण री नीं मैसूस करण री होवै, कैवतां ई तो प्रीत रो बळ ओछो पड़ जावै। कई छोरा छोरी प्रीत री आड़ में घर सूं भाजै पण बांरै भाजणै में प्रीत रो अंस नीं, वासना री छियां चढ़योड़ी लखावै, छियां उतरी अर पोत उघड़्या। अेक और बात, जे थे जाणो, प्रीत फगत आदमी लुगाई बिच्चाळै होवै तो गैलापणो है, प्रीत रा रंग तो टाबर सूं लेय बूढै बडेरै, दरखत सूं लेय जीव जिनावर अर भौतिक चीजां ई माथै भी चढ सकै। प्रीत रो रंग चढ्यां आदमी सबळो बणैै।
…..तो पछै प्रीत करणी चाइजै ?
बा कदेई कर्यां थोड़ी होवै, आप मतैई हो जावै। जे कर्यां ई होवै तो कर’र देखल्यो दिखाण, कदास पार पड़ै ई तो ! कबीर तो कैय दियो है-
प्रेम न बाड़ी उपजै प्रेम न हाट बिकाई
राजा प्रजा जेहि रूचौ सीस देय ले जाई
घनानंद तो प्रीत नै आपरै कवित्त में सीध सट्ट यूं सरकाई है-
अति सूधो स्नेह को मारग है जहां नेकू सयानप बांक नहीं
तहां सांच चलैं तजि आपनपो झिझकैं कपटी जे निसांक नहीं
घनआनंद प्यारे सुजान सुनो यहां एक ते दूसरो आंक नहीं
तुम कौन सी पाटी पढें हो लला, मन लेहु पे देहु छटांक नहीं

मीरां रा परभु गिरधर नागर आप मतैई बण्या हा, कोई बणावण सारू थोड़ी आयो। मीरां तो बस आपरी धुन में गाय लियो, ‘कोई कैवै महंगो, कोई कैवै सस्तो, मैं तो लियो अमोलक मोल…’। ढोला मारू रा दूहा रचणिया कवि कल्लोल लिख्यो है-
अकथ कहाणी प्रेम री किण सूं कही न जाई
गूंगै का सपना भया सुमिर सुमिर पछताई

देस दुनिया में जियां राधा किरसन, हीर रांझा, लैला मजनूं सीरी फरहाद, रोमियो जूलियट, पेरिस हेलन री प्रीत जगचावी बणी उणी ढाळै आपणै मुरधर देस में ई घणी प्रेम कथावां लाधै। आं कहाण्यां नै बांचां तो ठाह लागै प्रीत तो हरख सूं बेस्सी त्याग री डांडी है, जिण पर चालणो घणो दोरो। आपणै अठै ढोला मारू, जेठवा उजली, महेन्द्र मूमल, भारमली, रामू चनणा, जलाल बूबना, सोरठा, आसा, केहर, सैंणी, झीमां चारणी, जसमल ओडणी, भूमि परक्खो, आभलदे, नागजी आद भोत सी बातां है जिकी ऊंडी प्रीत नै बखाणै ई कोनी, जीवै है। आं कथावां माथै जचौ जित्ती हथाई हो सकै। ल्यो फेर, अेक प्रेम कथा री तो कर ही लेवां-
आ प्रेम कथा है, उजळी री ! उजळी कैवो तो जेठवै री प्रीत। इग्यारवैं सइकै री इण बात में कथीजै जेठवो हालामण रियासत री धूमली नगरी रै राजा भाण जेठवै रो बेटो हो। उण रो नांव मेहा जेठवो हो, उणी रियासत में अमरै चारण री बेटी उजळी सूं उण री प्रीत लागी पण चारण अर राजपूत तो आपसरी में भाई भाई गिणीजै पछै सगपण कियां होवै। ना होवो भलंई प्रीत कद किणी बंधण नै मानै, लागी सो लागी पण परवाण नीं चढ सकी। काची उमर में ई जेठवै री मौत हो जावै तो उण री याद में उजळी सैंतरी बैंतरी होय भटकती फिरै, चारण री बा बेटी जेठवै नै सम्बोधित करतां प्रीत रा कित्ता ऊंडा सोरठा रचौ, कीं बांचो दिखाण-
टोळी सूं टळतांह, हिरणां मन माठा हुवै
वाल्हा बिछड़ंतांह, जीणो किण विध जेठवा
जोड़ी जग में दोय चकवै नै सारस तणी
तीजी मिली नै कोय जोय जो हारी जेठवा
चकवा सारस वाण नारी नेह तीनूं निरख
जीणों मुसकल जाण जोड़ो बिछड़्यां जेठवा

लोक में प्रीत नै लेय’र भोत सा चावा ठावा दूहा रच्योड़ा है, आं दूहा में अेक तत है, अेक सत है जिको प्रीत नै न्यारै निरवाळै ढंग सूं अरथावै। दो च्यार दूहा और बांचल्यो-
ढोलो बूझै मारवी प्रीत कित्ता मण होय
लागतड़ां लेखो नहीं, टूट्यां टकै री होय
सुपना थूं सोभागियो, उत्तम थारी जात
सौ कोसां साजन बसै, आय मिलावै रात
साजन आया अे सखी कांई भेंट करां
थाळ भरां गजमोतियां उपर नैण धरां

बात आगै बधावां तो आदम जात री छोड़ो, आपणै अठै तो जीव जिनावरां री अकथ प्रेम-वातां बडेरां सूं सुणता आया हां। चेतै करो दिखाण, राज हंस री बात। इण बात में कहीजै कै चन्नण रो अेक बन हो, उण में भोत सा जीव जिनावर, पखेरूवां रो बासो हो। चंन्नण रै अेक घेर घुमेर गाछ माथै अेक राजहंस ई रैवतो। अेक दिन उण बन में आग लागगी तो सै जीव जिनावर, पांख पखेरू आपरै बचाव सारू भाजण लाग्या। आग बधती रैयी, देखतां ई देखतां सगळै जंगळ खाली होग्यो पण राजहंस उणी दरखत री डाळ्यां में बैठ्यो रैयो। उण नै बैठ्यो देख चनण रो बो गाछ बोल्यो-
आग लगी बनखंड में दाझ्यो चंदन बंस
म्हारी आई म्हे बळां, थूं क्यूं दाझै हंस
प्रेम री परतीती देखो, कवि रो राजहंस कांई उथळो देवै-
पान मरोड़्या रस पियो बैठ्या थारी डाळ
थे दाझो म्हे उड़ चलां जीणो कित्ती’क ताळ

इणी ढाळै लोक में दो सहेल्यां री बात आवै जिकी भोत बिरियां सुणी होवैला। और सुणल्यो भई, टक्का तो लागै कोनी। बात इयां ही कै जूनै बगत में दो सहेल्यां किणी रोही में डांडी डांडी बगै ही। मारग में बान्नै अेक सूकेड़ो तळाब दीस्यो जिण में चोभी जितरो कै पाणी होवैला। बां देख्यो, उण तळाब रै सारै अेक हिरणियो अर हिरणी मर्या पड़्या है। दोनां री आ हालत देख अेक साथण दूजी नै बूझै-
खड़्यो नीं दीसै पारधी लग्या नीं दीसै बाण
म्हूं तन्नै बूझंू अे सखी किण बिध तजिया प्राण
दूजी कीं स्याणी अर कवि हिड़दै री ही, बण चौफेर तकायो अर फेर उथळो दियो-
जळ थोड़ो नेह घणो लग्या प्रीत रा बाण
तू पी तू पी कैवता आं दोनूं तजिया प्राण
सोचो दिखाण ! जठै रै लोक में जीव जिनावर अर पखेरूवां बिच्चाळै अपणायत री ओ भाव है बठै प्रीत री जड़ां कित्ती ऊंडी होसी। मंच रा चावा कवि भागीरथसिंग भाग्य रै इण दूहै सूं आज री हथाई नै बिसांई देवां कै-
पाती लेज्या डाकिया जा मरवण रै देस
प्रीत बिना जीणो किसो दीजो ओ संदेस
बाकी बातां आगली हथाई में, आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
–लेखक राजस्थानी व हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं


