



रूंख भायला.
राजी राखै रामजी ! आज बात राजस्थानी में अलायदै ढंग सूं रचणियै कवि भूंगर री! हैं….भूंगर……कुण भूंगर ? थ्यावस राखो भई, हथाई सूं पैली वांरै अेक दो घेसळां रो आनंद तो ल्यो-
भूंगर चाल्यो सासरै, साथै च्यार जणां
भली जिमाई लापसी, वा रै कस्सी डंडा !
का पछै-
चूल्है लारै के पड़्यो, म्हे जाण्यो लड़लूंक
पूंछ ऊंचो कर’र देखां, तो टाबरां री मा है !
ना ओ…., आ के कविता होई, दूहो भी कोनी बण्यो! ना बणो भलंई, भूंगर कद दावो करै, पण कीं बात तो है उण रचाव में….बरसां पछै ई लोग भूंगर रै घेसळां नै याद राखै अर मौकै बेमौकै पुरसबो करै। घेसळो साहित री किसी विधा होई ? आ तो कदे सुणी ई कोनी ! साची बात तो आ कै आपणो लोकसाहित्य जग में सिरै। आपणी हथाई अर बात में चूंठियां भेळै ओखाणा, कैबतां अर भांत-भांत री आड्यां ई है। साहित्य अजब-गजब तो कथणियां बी अजब-गजब। इस्या ई गजबी हा भूंगर कवि जिका घेसळा लिख’र अमर होग्या। वां रो जलम कद अर कठै हुयो, इण रो कोई परवाण नीं। कई विद्वान उण नै अमीर खुसरो रै बगत रो बतावै। भूंगर रो ठिकाणो कई लोग बीकानेर जिलै री नोखा तै’सील बतावै तो कई वान्नै रतनगढ़ रा बतावै। बात तो आ भी चलै कै भूंगर नागौर रै साठिका या भदोरै गांव रा हा। खैर कद रा या कठै ई रा हा, पण हा राजस्थान रा ई। इण लाखीणी बात पेटै ल्यो अेक और घेसळो-
भिड़क भैंस पींपळ चढी, दोय भाजग्या ऊंठ
गधै मारी लात री, हाथी रा दोय टूक
लुगायां, लाठी ल्याओ अेे, गूदड़ै में डोरा घालां !

चावा ठावा कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ भूंगर रै रचाव रा घणा रसिया हा। वां भूंगर माथै अेक सांतरो आलेख लिख्यो है। वां रै मुजब भूंगर कवि बेमेळा सबदां री भेळप सूं बेअरथी कविता लिखता। अे कवितावां आज भी भूंगर रा घेसळा सिरैनांव सूं लोक में भंवै। बां आपरै घेसळां सूं राजस्थान अर राजस्थानी भाषा रो जस चौफेर पुगायो। अे घेसळा बेतुका होवता थकां बी रसाल है। ल्यो चाखो-
बरसण लाग्या सरकणा, भीजण लागी भींत
ऊंठ सरिसा बैयग्या, दाळ रो सुवाद आयो ई कोनी !
आपणै लोक में घेसळो लाठी रो दूजो नांव है। बोरटी री अणघड़ जाडी अर बांकी-बावळी लकड़ी सूं बण्योड़ो चलताऊ सोट जकै सूं खळै में बाजरी रै सिट्टां नै कूट’र दाणा काढ़्या करै। इण नै रेरू, खोटण का घेसळो कैवै। भूंगर री कविता…. नंई, नंई घेसळा बी इण भांत ई बांका-बावळा अर बेअरथा हुवै।
गुवाड़ बिचाळै गोह पड़ी, म्है जाण्यो गणगौर
पूंछड़ो ऊंचो कर’र देखूं तो, दियाळी रा दिन तीन ही है !

कवि ‘कागद’ रो कैवणो है, हिन्दी में अमीर खुसरो, घासीराम अर वासूजी ई घेसळां माफक ढकोसळा लिख्या है। इण भांत रै बेअरथै छंद नै हिन्दी में ढकोसला, परसोकला या झटूकला कथिज्यो। आं सगळां में सिरै पण भूंगर रा घेसळा ई थरपीज्या। भूंगर नै राजस्थानी लोक साहित्य में आं घेसळां रै पण बो मुकाम मिल्यो जको अमीर खुसरो नै हिन्दी जगत में मिल्यो। भूंगर आपरी रौ में हंसावणियां अर बेअरथा घेसळा लिख्या है। आं घेसळां री खास बात आ है कै आं में बेमेळा सबद है अर छेकड़ली तुक नीं मिलै। देखो दिखाणं-
गुवाड़ बिचाळै पींपळी, म्हे जाण्यो बड़बोर
लाफां मार्याे घेसळो, छाछ पड़ी मण च्यार
लुगायां, कांदा चुगल्यो अेे, चीणां री दाळ-सा !
तुक री बात पर चेतै आयो, भूंगर नै हिंगलाज माताजी री अेक फटकार ही कै थारी कविता में जकै दिन लारली तुक मिलसी उण बगत थारी मौत हो जासी। मौत तो हरेक नै आवै। भूंगर नै बी आवणी ई ही। पण भूंगर री मौत फटकार नै साची करगी। अेक दिन री बात। भूंगर सांढ माथै गांवतरै पर हा। मारग में अेक सुन्नो कुओ हो। कुअै में पड़्यो कोई कूकै हो।
‘बचाओ-बचाओ….!’

भूंगर कुअै में तकायो तो एक आदमी मांय पड़ेड़ो तिरै हो। भूंगर नै दया आयगी। उण मिनख नै बारै काढ़ण री जुगत बिठाई अर सांढ नै कुओ डकावण सारू तचकाई। सांढ ताती अर तगड़ी दौड़ाक ही, अेक फाळ में ई कुओ डाकगी। सांढ तो परलै पार पण भूंगर धै दणी कुअै में…। विपदा में भूंगर कुअै में तिरतै आदमी री टांग पकड़ली। अब भूंगर बीं आदमी री टांग पकड़योड़ा कुअै में तिरै। कवि मन इण विपदा में भी अेक कविता कर दी जिकी बां रै हियै सूं होठां आयगी-
‘‘डाकणी ही सांढ, डाकगी कुओ
एक तो हो ई, एक और हुओ’’
भूंगर नै चाणचक चेतै आई, आज तो बेटी कविता में हुओ री तुक कुओ सूं मिलगी, अबै मौत तो आयोड़ी ही है। पण थोड़ी’क ताळ में उण नै लखायो कै माताजी री फटकार बेअसर होगी दीसै, अजेस तो जीवता हां। फटकार रो असर होवतो तो मर नीं जावता ! बस….., बण इणी हरख में बण ताळी बजाई कै धर…….धम्म….. अर कुअै रै पींदै में जा पड़्यो। पड़तां ई भूंगर रो हंसलो उडग्यो। इण ढाळै लोक सूं भूंगर री विदाई होगी। पण उण रा घेसळा आज भी राजस्थानी साहित री हेमाणी गिणीजै। ल्यो अेक और बांचो-
चरड़-चरड़ फळसो करै, फळसै रै दो सींग
आगै जाय’र देखूं तो, कुतड़ी पाल्लो खाय
चरण देवो बापड़ी नै, गऊ री जाई है !

आज री हथाई रो सार ओ है कै फगत अेक मांयली लय रै कारणै भूंगर री बांकी बावळी ओळ्यां जगचावी बणी, नीं पछै बेअरथो अर बेतुको आप कैय’र देखलो ! बात तो लय री है, लय में तत है, लय में सत है। आ सागी लय मिनखा जियाजूण में है, उण नै बणाये राखां तो आपणो मान ई बधसी। बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बस्सो….।
-लेखक राजस्थानी व हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं


