


रूंख भायला.
राजी राखै रामजी! आपणै अठै अेक चावो गीत है, ‘काळियो कूद पड़्यो मेळै में….!’ म्हूं सोचूं, ‘काळियो ई क्यूं ? काळूराम क्यूं कोनी कूद् यो मेळै में ? जद कदेई भागीरथसिंग ‘भाग्य’ री कविता ‘अेक छोरी काळती, हमेसा जीव बाळती…’ सुणुं तो ई मन में अळोच उठै, ‘काळती क्यूं जीव बाळै ?’ काळी तंई तो बात फेर ई जचौ, क्यूंकै रंग तो दो ई है जगत में, काळो का गोरो…, पण काळती कैय’र आपां तो प्रीत रै नांव री जमां ई घाट राबड़ी करदी !
‘हेत री हथाई’ में आज बात नांवां रै पेटै इणी ‘घाट राबड़ी’ री! आपां जाणां, राज भलंई गांम रो नांव बहलोलनगर राख दियो होवै पण लोक सारू तो बो ‘भलोलियो’ ई रैसी, अनूपशहर होवैलो सरकारू रिकार्ड में, लोक में तो बो ‘अनोपरो’ ई बाजै। भजनलाल जी राज में मुख्यमंतरी चायै बणग्या होवै, लोक तो बान्नै ‘भजनो’ कैय’र ई बतळावै। आ कोई नवी बात कोनी। आपणै लोक में ओछै नांव सूं बतळावणै री जूनी रीत है। गांम में किणी बूढै बडेरै मायत सूं बां रो नांव बूझो दिखाण-हो भलंई बै ‘परभुदयाल’ का ‘फूसाराम’ पण आपरै मूंडै बै आपनै ‘परभूड़ो’ का ‘फूसियो’ ई बतासी। जे बान्नै नांव सावळ बतावणै सारू टोकां तो बां रो ऊथळो ओ ई मिलसी-‘‘नांव तो लाडी रामजी रो होवै, मिनख रा कांई नांव !’’
साची बूझो तो इण बात रै लारै अेक तत है लोक री अपणायत रो। आ अपणायत ‘शूगर कोटिंग’ रा संस्कार नीं जाणै, आछो कैवो भलंई माड़ो, लोक तो इयां ई हेला पाड़ै, के आदमी के लुगाई…! कोई रूसै तो रूसो भलंई। जी’कारा अर हंकारा तो हाजरियां रै मूंडै ई ओपै, लोक बान्नै कद धारै ! आपरी लय में, आपरी रौ में, बिना किणी लाग लपेट बात कैय देवणै री ताकत लोक कन्नै ई तो है, च्यारूं जुगां में जिण री ठसक कोई राजा रजवाड़ा ई नीं बदळ सक्या।
हर भासा अर बोली रो अेक संस्कारित रूप होवै पण लोक कन्नै उण रो जाबक ई काचो सरूप लाधै। दरबार अर भणाई री भासा सूं साव अलायदी आ अेक इसी बोली होवै, जिण नै स्याणा सोता लोग तो भासा ई नीं मानै, ना मानो ! फलाणसिंग जी, ढीकड़सिंग जी, पूंछड़सिंग जी, राणी सा, कंवर सा, कंवराणी जी में जिको भासायी फूटरापो है बो लोक कन्नै है ई कोनी। उण कन्नै तो आपरी बोली है, आपरी ठसक है जिणनै बो आपरै मनचायै रूप में बरतै, चालतो ई नवा बेढबा सबद गढ देवै, चालतो ई आछै भलै सबद नै बिडरूप कर देवै, उण नै रोकणियो कुण ! पण साची बात आ, इणी बरताव में बो आपरी अपणायत अर मनगत रा भाव परगटावै, सीधा अर जाबक सरळ। बोल बंतळ में लोक री आ ठसक सैं सूं पैली मिनख रै ‘नांव’ नै आपरै मनचायै रूप में ढाळै। डोनाल्ड ट्रम्प नै ‘ट्रम्पड़ो’ इयां ई तो कोनी कहीजै ! ‘मोदीड़ो’ का पछै ’भूरी काकी’ रा सम्बोधन लोक सूं ई तो आया है।
आपणी भासा में स्त्रीगत नांवां नै ओछै रूप में देखां तो मूळ नांव रै छेकड़ में ‘ई, ड़ी, की, ती’ लगावणै रो खासा चलण है। बानगी देखो दिखाण-कमला रो कमली, विमला रो बिमली, रेवती रो रेवंतड़ी, शांति रो सायंतड़ी, बाधु रो बाधुड़ी, आरती रो आरतड़ी, पानां रो पानकी, फूलां रो फूलकी, किरण रो किरणती, राणी रो राणती अर इणी ढाळै दूजै नांवां रा रूप बदळबो करै। पुरूष वर्ग में नांव रै लारलै आखर भेळै ‘ओ, यो, ड़ो,’ का फेर ‘लो’ लगाइजै। भैरूं रो भैरियो, बिरजू रो बिरजियो, अजय रो अजियो, गोपी रो गोपियो, कान्है रो कान्हुड़ो, गजानंद रो गज्जूड़ो, फूसाराम रो फूसियो, लाधूराम रो लाधियो, रतिराम रो रतियो, राजू रो राजियो, मदन रो मदनियो, रामै रो रामलो, श्यामै रो श्यामलो आदि भोत सा उदाहरण लिया जा सकै।
आ बात नीं है कै फगत मिनख रा नांव ई ओछैपणै सूं लिया जावै। इण ओछपणै री सागी अपणायत चौफेर लाधै आपनै। जीव-जिनावर, पांख पखेरू, अर चीजबस्त सारू ई लोक में घणी बिरियां इणी ढाळै बरताव होवै। जे संज्ञा सबद स्त्रीलिंग है तो सागी ‘ई, ड़ी, की, ती’ रो प्रयोग होवै अर पुल्लिंग है तो आदम्यां सारू बरतीजण वाळा प्रत्यय लगाइजै। बिल्ली नै बिलड़ी, कुत्तै नै कुतियो, गा नै गावड़ी, चिड़िया नै चिड़कली, काग नै कागलो तो सदाई कैवां ई हां। आछी भली गाडी नै गाडली, बस नै बसड़ी, जीप नै जीपड़ी, घड़ी नै घड़कली, कुड़तै नै कुड़तियो, प्याज नै प्याजियो, गिलास नै गिलासड़ी, थाळी नै थाळती, चिमटै नै चिंपियो कैवां ई हां नीं।
सबदां रै इण औघड़पणै रो अेक दूजो रूप ई है जिण नै लोक वक्रोक्ति रै रूप में बरतै। केसां नै झींटा, सिर नै भोड, आंख्यां नै डोभा, नाक नै नास, मूंडै नै बाको, जीभ नै लालीबाई, पगां नै खुरड़ा और ई कांई ठाह कांई….। बूढै नै डैणियो, जवान नै छैल, छोरै नै टिंगर, टाबर नै कुचमादी, स्याणै नै डेढ हुंस्यार, भोळै नै झालर, साधू नै मोडो और ई कांई ठाह कांई…..। जातां री बात करां तो जूनै दिनां में बामण नै गरड़ो, बाणियै नै किराड़, जाट नै खोतो, कुम्हार नै टिपलो, नायक नै रूंगो और ई कांई ठाह कांई कैवता हा, पण के मजाल कोई रूस जावै। आ लोक री बा सबदावली है जिकी किणी सबदकोस में नीं आ सकी।
लारलै दिनां री बात चेतै आवै, म्हारै पाड़ौस में जाटां रो अेक र्भ यो पूरो घर हो। घरधणी रा बेटो बीनणी मास्टर मास्टरणी हा, बां रै पांच-छव बरसां रो अेक अळबादी गीगलो, नांव तो उणरो निलेश, पण लाड कोड सूं सै नीलू-नीलू करता। बूढिया दादो, जिकां नै कीं कम सूझतो, बै मांचौ बैठ्या अपणायत सूं पोतै नै हेलो मारता –
-बेटा लीलिया ! कठै है ?
-अठै हूं !
-लीलिया कठै है रै ?
-अठै हूं !
-अरै लीलिया ! कठै है रै, सुणै ई कोनी ?
-अठै हूं दादा !
-अठै के धी गा नाना लाठी ल्यै !
बां री बिनणी नै आ बंतळ भोत अपरोगी लागती, उण नै भोत झूंझळ आवती। बा आपरी सासू सूं कैवती, दादोजी नीलू रो नांव तो बिगाडै़ ई है, चजसर बोलणो ई नीं सिखावै। बडा होयां टाबर ई इयां ई बोलसी। म्हानै लागतो, चासणी री सबदावली भण्योड़ी बा मास्टरणी लोक री अपणायत स्यार जाणै ई कोनी !
आज री हथाई रो सार ओ है कै जे कदेई कोई आपरो हेताळू चार लोगां रै बिच्चाळै आपनै ओछै नांव सूं बतळा रैयो है तो मकोड़ो नीं बणनो, रीस नीं करणी। जीकारा देय’र बतळावणिया तो आपनै घणाई लाधसी, पण लोक ब्यौहार री अपणायत रा हेला पाड़ता मिनख घणा कोनी, अलबत्त घटता जा रैया है। बां री संभाळ करणी है, आपां सारू इण ओछपणै रो सांचो हेत, आपां री बोली, मिनखपणै री ठसक जद ई बचौला ! बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी के सशक्त हस्ताक्षर हैं


