



रूंख भायला.
राजी राखै रामजी !
हैं ओ…, थे ‘मळ’ उतार लिया के !!
बै कियां उतरै ? म्हानै तो ठाह ई कोनी।
तो पतो लगावो लाडी, घरै मायतां कन्नै दो घड़ी बैठ्या करो।
हें….हें…हीं….हीं…., म्हूं सोचूं, किणी रै कब्जी होयोड़ी है, जणाई ‘मल’ उतारणै री बात कर रैया हो।
आछी ऊत गई है थारी, थान्नै ‘मल’ अर ‘मळ’ रो ई ठाह कोनी। अरे डोफो, इणी अणजाणपणै में थे आछै भलै डूंगरमल रो नांव ‘हिलशिट’ कर देवो अर भूरामल रो ‘ब्राऊनशिट’। कोई के करल्यै !
म्हारी हांसी ना करो भाईजी, बतावो नीं, मळ उतारणो के होवै ?
तो राजी राखै रामजी, ‘हेत री हथाई’ में आज मळ उतारणै री बात ई कर लेवां। सूरज-चांद अर धरती रै भूंवणै री गति सूं बगत अर महीनां री गिणत होवै। आपणै सनातन में जद सुरजी देव धनु अर मीन राशि में होवै तो उण महीनै नै ‘मळमास’ का ‘खरमास’ कहीजै। ओ भी कहीजै कै इण महीनै में सूरज रा घोड़ा बिसांई लेवै। लोकवात आ है कै बारूं महीना चालता सुरजीदेव रै रथ रा घोड़ा जद थाक जावै तो पाणी पीवण सारू किणी तळाब कन्नै ठमै। रथ ठमतां ई संसार री गति ठम जावै। संसार नीं ठमणो चाइजै, ओ बिचार करता सुरजिदेव उणी तळाब सारै उभ्या दो खर (गधिया) रथ में जोड़ देवै। गधियां जुप्यो रथ चाल तो पड़ै पण उणरी गति मांदी पड़ जावै। छेवट दोरो सोरो महीनै रो काळ चकरियो सक्रांत नै पूरो होवै अर सुरजी रा घोड़ा फेरूं नवी उरमा रै साथै रथ में जुपै। इणी कारणै मळमास नै अळसायो मास कहीजै जिण में कोई सुभ कारज ब्याव सगाई, जात झड़ूला, घर रो न्यांगळ आद नीं होवै। हां, दान पुन्न खूब करीजै, अठै तंई कै सक्रांत आवते-आवते तो लुगायां बैन स्वासण्यां नै भांत-भांत री तेरहा चीजां न्यारी बांटणी सरू कर देवै, कै आगोत्तर मिलै ज्यूं !
इणी दान पुन्न री बात नै आगै निभावणै री रीत है ‘मळ उतारणो’। आपां ‘मळ उतारणो’ कैवां तो कई ‘पौष बड़ा’ कैय देवै। साची बात तो आ कै पौ रो महीनो सियाळै रो, अरे भई दिसम्बर अर जनवरी…. जिण में भूंडकी डांफर बाजै, न्हावता ई डर लागै, इस्यै मौसम में जे गरमागरम गुलगला, दाळ रा बड़ा अर सीरो खावण नै मिलै तो पछै कैवणो ई कांई ! मळ उतारणै रै मिस आपणै घरां में अे चीजां बणाइजै। दान-पुन्न सारू सैं सूं पैली गळी बास रै भंडारीजी यानी कुतियां नै गुलगला खुवाइजै, मंगतै भिर्खा यां नै ई बांटीजै, बैन स्वासण्या नै जिमाइजै, आड़ौसी-पाड़ौसी रै घरां परसादी रै रूप में पुगाइजै। आ अलायदी बात है कै आजकलै गुलगला होवै का बड़ा, बांटणै री ठौड़ थे तो आप ई चेपबो करो !
मळ उतारणै में आपणी दादी नानी सदांई कैवै, थावर नै तेळ बाळनो चाइजै, गुड़ रा गुलगला, दाळ रा बड़ा अर पकौड़ा बणावणा चाहीजै। अबै थे बूझस्यो, थावर के होयो ? भाइड़ो, थावर मतलब शनिवार…। आपणै अठै थावर री महीमा ई न्यारी। ‘थावर कीजै थरपना’! मुरधरा में गढ़ होवै चायै महल माळिया, घर होवै का मिंदर देवरा, थावर नै लगायोड़ी नींव भोत सुभ मानीजै। थावर पछै ई तो सुरजी रो वार अदीतवार आवै।
भाईजी, बड़ा किसी दाळ रा बणै ? चीणां री दाळ का मूंग री ?
ना रे ! चीणां रो तो बेसण होवै, जिण सूं पकौड़ां बणै। बड़ा तो मोठां री दाळ रा ई होवै, इयां बणावण नै लोग उड़द रा ई बणा लेवै। बड़ां री बात करां तो आपणै इलाकै में महाजन, लूणकरणसर, सूडसर, डूंगरगढ़ रा बड़ा सदांई जगचावा रैया है। आजकलै तो सगळी जिग्यां ई मिलै। बड़ा तो बड़ा ई होवै, कचोळी-पकौड़ा बांरी बरोबरी कद कर सकै ! भीज्योड़ी दाळ री दरदरी पिसाई, उण में कांदो, हरी मिरच्यां, थोड़ी घणी अदरक, हींग अर दूजा मसाला…. जे बड़ां री तेल में चोखी सिकाई करयोड़ी होवै तो खावण में न्यारो ई आनंद आवै। रूंख भायलै री अेक चावी गजल में ई आं बड़ां रो जिकर है, शेर बांचो दिखाण –
चीकणा घड़ा रे म्हे तो चीकणा घड़ा
पाणी मांखर काड लेवां दाळ रा बड़ा
आं बड़ां रै सागै जे गुलगलां री बात नीं करां तो मळ उतरै ई कोनी। साची बूझो तो गुलगलो कैवता ई मुंडो मिठास सूं भर जावै।
कणक रै आटै में गुड़ रो पाणी रळाय’र बणाइजै गुलगला, थोड़ी घणी सूंफ घाल देवां तो कैवणो ई के ! इण सूं गुलगला बादी कोनी करै। सरस्यूं रै तेल में जे ढंगसर गुलगला बणेड़ा होवै तो गुलाबजामन नै ई कड़खै बिठाणै। अे पोला पोला जाणै जीम ई बोकरो। मळ उतारै उण दिन तो बडा बडेरां सूं लगाय’र सै टाबरटोळ सिंझ्या ढळे तंई बड़ा गुलगला ठोक ई बोकरै, पाण भलंई आ जावो, मन नीं भरै।
मन तो भाईजी, अबै म्हारो ई मळ उर्ता यां ई भरसी।
उतारो, कुण रोकै ! आज री हथाई रो सार ओ ई है कै पौष बड़ा कैवोे भलंई मळ उतारणो, आपणी संस्कृति री आं जूनी परम्परावां नै बिसरावणो नीं। आगली पीढ़ी नै दान पुन्न री अे रीत निभावणै रा संस्कार दियां ई थारी पिछाण बंचौला। बाकी बातां आगली हथाई में…..। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं





