



रूंख भायला.
धिन-धिन अे धोरां री धरती, राजस्थानी मावड़ी
वीर धीर विद्वान बणाया खुवा खीचड़ो राबड़ी
-भरत व्यास
राजी राखै रामजी ! आपण कैबत है, ‘कै तो बचसी गीतड़ा, का बचौला भीतड़ा!’ राजावां रै बगत थकां ई लोक तो इण सूं आगै री बात कैवतो नीं संक्यो, ‘रैय जासी गीतड़ा, ढह जासी भीतड़ा’। इण लोकवात नै आपां सांपड़दै देखां, आज गढ, कोट, कंगूरा अर म्हल माळिया ढै’वण लाग रैया है पण गीत….बै अमर है, गीत रचणिया अमर है।
‘हेत री हथाई’ में आज धोरां री धरती रै जायै जलम्यै गीतकार भरत व्यास री बात करस्यां, जिकै रै गीतां री सोरम सात समदरां पार तंई पसरयोड़ी है। बां रा लिख्योड़ा गीत आज भी बॉलीवुड री हेमाणी मानीजै।
भरत व्यास रो जलम 6 जनवरी 1918 नै चूरू में होयो, सम्वत मुजब तिथ ही, मिंगसर रै अंधेर पंख री आठ्यूं, अर साल हो उगणीस सौ चौहत्तर। बै पुस्करणा बामण हा। दो बरसां रा होया ई हा कै बां रा जीसा हरिसरण होग्या। बाळपणै में बाप री छियां खुसगी, अर जिनगाणी में पसरगी अणगिण अबखायां। बै जलमजात कळावंत हा, रागळी करया करता। बां रो कवित्व बाळपणै सूं ई सामीं आवण लाग्यो। चूरू सूं हाई इस्कूल री परीक्षा पास करणै रै पछै बै बीकानेर आयग्या अर डूंगर कॉलेज रै कॉमर्स संकाय में दाखलो ले लियो। गीत कविता री तुकबंदी करता-करता बां दिनां बै फिल्मी गीतां री पैरोडी गावण लाग्या। गावण बजावण रै साथै ई बै बॉलीबाल रा घणा रसिया हा। अेक बगत में तो बै डूंगर कॉलेज री वॉलीबॉल टीम रा कप्तान ई रैया।
इंटर री भणाई पछै भरत रोटी-रूजगार सारू कलकत्तै जा पूग्या। छोटी मोटी नौकरी ही, बठै ई बै रंगमंच सूं जुड़ग्या अर चावा कलाकार बणग्या। कलकत्तै रै अल्फ्रेड थियेटर में जद बां रो नाटक ‘रंगीलो मारवाड़’ खेलिज्यो तो बां नै आखै देस में नवी पिछाण मिली। ओ नाटक भोत सराइज्यो। इण रै पछै ‘रामू चनणा’ अर ‘ढोला मरवण’ रा ई शो होया। ‘राजा मोरध्वज’ तो इत्तो चावो होयो कै देस भर में उण रा घणाई शो होया। छेवट बै आपरै अेक भायलै री मारफत सुपनां री मायानगरी बम्बई जा पूग्या, जठै बां आपरै गीतां सूं हिंदी फिल्म जगत में नवो इतिहास रच दियो।
फिल्म ‘दुहाई’ सूं भरत व्यास हिंदी गीतां री सरूआत करी, पैलड़ो मेहनतानो मिल्यो दस रिपिया। बो मेहनतानो इस्यो फळाप्यो कै उण दौर में भरत व्यास फिल्मी गीतां सारू अेक ठावो नांव बणग्यो। ’नवरंग‘, ’सारंगा‘, ’गूूंज उठी शहनाई‘, ’रानी रूपमती‘, ’बेदर्द जमाना क्या जाने‘, ’प्यार की प्यास‘, ’स्त्री‘, ’परिणीता‘ आदि फिल्मां री सफलता रै लारै भरत व्यास रै चावा गीतां रो योगदान भी घणो महताऊ हो। ‘निर्बल से लड़ाई बलवान की…’, ‘आधा है चंद्रमा, रात आधी…’, ‘अे मालिक तेरे बंदे हम…’, ‘आ लौट के आजा मेरे मीत..’, ‘जरा सामने तो आओ छलिए….’, दिल का खिलौना हाय टूट गया….’, तेरी शहनाई बोले….’, जीवन में पिया तेरा साथ रहे….’, ‘जा तोसे नहीं बोलूं, घूंघट नहीं खोलूं…’, ‘चाहे पास हो चाहे दूर हो…’, ‘तू छुपी है कहां, मैं तड़पता यहां…’, ‘जोत से जोत जलाते चलो…’ जिस्या अलेखूं गीत भरत व्यास री कलम सूं रचीज्या अर जगचावा बण्या। कई गीत तो बां आपरै मनोभावां मुजब लिख मेल्या जिका बाद में फिल्मां में घालिज्या। लगटगै सवा सौ रै नेड़ै लिख्यिोड़ा बां रा हिंदी गीत लोक में गूंज रैया है।
हिंदी सूं इतर राजस्थानी में रचाव बाबत भरत व्यास री बात करां तो बां भोत सा चावा गीत राजस्थानी फिल्मां सारू ई लिख्या। वीर दुर्गादास फिल्म में लता अर मुकेश रो गायोड़ो गीत ‘थांनै काजळियो बणाल्यूं, थान्नै नैणां में रमाल्यूं राज…’ तो प्रीत रो लोकगीत बणग्यो। बाई चाली सासरियै फिल्म रो गीत ‘छोटी सी उमर परणाई ओ बाबो सा…’ आजलग सीख रो चावो गीत गिणीजै जिण में घर सूं ब्हिर होती बेटी री मनगत रो भोत सांतरो चितराम है। लोकदेव रामसा पीर री महिमा रो गुणगान करतो गीत ‘अजमालजी रा कंवरा थान्नै खम्मा घणी…’ जिण नै महेन्द्रकपूर गायो है, आज भी मेळां में, जातरा में रंग लगावतो सुणीजै। व्यासजी रै अेक छड़छड़ीलै राजस्थानी गीत री बानगी तो देखो दिखाण-
‘म्हे तो ले’र आया हां बरात, सगीजी म्हां सूं बात करो
आ रात बड़ी रंगीली, सगीजी थे थोड़ो साथ करो
थारी पागड़ली रा पेच पुराणा, सगाजी मत बात करो
म्है तो….
म्हारी नथली नै थे मत निरखो, कै मोती टूट जावैलो
अरररर टूट जावण द्यो….
म्हारो घूंघटियो मत खोलो, कै धणी म्हारो रूस जावैलो
अररररर रूस जावण द्यो…
थां री खोटी निजर है सगाजी, मत बात करो
म्हैं तो….
व्यास जी रै गीतां में मिनखा जूण री संवेदना, बिरहण धण री पीड, जोग संजोग अर भाव भगती साव निगै आवै। उण बगत रा चावा फिल्मकार व्ही. शांताराम तो भरत व्यास नै भोत मान्या करता, जणाई बां री फिल्मां रा ज्यादातर गीत व्यास जी रा रच्योड़ा है। बां रै गीतां नै नामी संगीतकार सी. रामचन्द्र, एस. एन. त्रिपाठी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याण जी-आनन्द जी, बसंत देसाई अर राहुलदेव बर्मन कानां मिसरी घोळतै सुरां सूं सजायो। मरूधरा रै इण मानवी आपरी कलम रै पाण जित्तो जसजोग पायो, बो लोक में कमती देखण नै मिलै। 4 जुलाई 1982 नै भरतजी हरिसरण होग्या पण बां रा गीत अजेस ई चौफेर गूंजै, सुणनियां रै अंतस में मधरी मिठास अर तिरस जगावै।
ते फेर सरधा पुसब चढावो व्यास जी रै, अर रानी रूपमती रो गीत ‘आ लौट के आजा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं….’ नै सुणो दिखाण ! बाकी बातां आगली हथाई में। आपरो ध्यान राखो, रसो अर बसो….।
-लेखक राजस्थानी और हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं



