



डॉ. एमपी शर्मा.
भारतीय समाज की रीढ़ उसकी संस्कृति है, और इस संस्कृति को जीवित रखने वाले प्रमुख स्तंभों में ब्राह्मण समुदाय सदियों से अग्रणी रहा है। फिर भी विडंबना यह है कि इन्हीं लोगों कोकृजो जन्म से लेकर मृत्यु तक हर हिंदू परिवार के जीवन में अपना योगदान देते हैं, आजकल छुटभैये नेताओं, कुछ बड़े राजनीतिक चेहरों और यहाँ तक कि उच्च प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारियों द्वारा खुलेआम अपमानित किया जा रहा है। यह केवल अनादर नहीं, बल्कि हिंदू समाज की आत्मा पर प्रहार है, और ऐसा प्रहार अब बर्दाश्त करने का समय समाप्त हो चुका है।
इतिहास का कड़वा सत्य,जो समाज के लिए खड़े रहे, उन्हें ही निशाना बनाया जा रहा है। यह बात इतिहास का सामान्य विद्यार्थी भी जानता है कि भारत पर विदेशी आक्रमणों के दौर में धर्म की रक्षा, मंदिरों की सुरक्षा, संस्कारों की परंपरा, और जबरन धर्मांतरण के विरोध में ब्राह्मणों ने अग्रिम पंक्ति में लड़ाई लड़ी। फिर भी आज वही समुदाय राजनीति के लिए आसान निशाना बना दिया गया है।

क्यों? क्योंकि उन्हें अपमानित करना ‘सेफ टार्गेट’ माना जाता है? जवाब भी नहीं देंगे और वोटबैंक भी नहीं बिगड़ेगा। यह कायरता है, सामाजिक नेतृत्व नहीं। सार्वजनिक मंचों पर गिरती भाषा, क्या यह स्वीकार्य है? जब सनियर आईएएस अधिकारी संतोष कुमार वर्मा द्वारा ‘बेटी दान’ जैसे शब्दों को तोड़-मरोड़ कर अपमानजनक अर्थ में उपयोग किया जाता है, तो यह न केवल ब्राह्मणों का अपमान है, बल्कि पूरी वैदिक परंपरा पर हमला है। क्या एक अधिकारी को यह शोभा देता है कि वह समाज की संवेदनाओं को ठेस पहुँचाए? क्या यह संविधान और सेवा नियमों का पालन है? निश्चित रूप से नहीं।

यह सीधी-सीधी मानसिक दिवालियापन है। ब्राह्मणों को गाली देना ‘फैशन’ बन चुका है, यह फैशन रोका जाएगा। आज कुछ लोग समझ बैठे हैं कि धर्म को गलत तरीके से प्रस्तुत करो, परंपरा का मज़ाक उड़ाओ, और ब्राह्मणों को कोस दो, बस तालियाँ मिल जाएँगी। लेकिन यह समझ लेना चाहिए कि ब्राह्मण सिर्फ एक जाति नहीं, हिंदू समाज की आध्यात्मिक मेरुदंड हैं। जो व्यक्ति इस मेरुदंड पर वार करता है, वह पूरी संरचना गिराने का जिंमेवार बनता है।

आलोचना स्वीकार है, अपमान नहीं। सुधार चाहिए, बिलकुल चाहिए। परंपराओं पर चर्चा भी स्वागत योग्य है। लेकिन सुधार के नाम पर एक संपूर्ण समुदाय का अपमान, और परंपरा का जघन्य विकृतिकरण, कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता। समाज को जोड़ने की जगह तोड़ने का कोई भी प्रयास, चाहे नेता करे, अधिकारी करे या बुद्धिजीवी, स्पष्ट रूप से अपराध है। अब कार्रवाई होगी, यह संदेश स्पष्ट होना चाहिए।
अपमानजनक भाषा को दंडनीय माना जाए। समाज को सार्वजनिक बयान देने वाले लोगों के लिए जवाबदेही निश्चित करनी होगी। पद पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी तय हो। अफसर हो या नेता, संविधान ने पद दिया है, किसी समुदाय को अपमानित करने का लाइसेंस नहीं। समाज में आत्म-सम्मान जागृत हो। ब्राह्मणों को यह स्वीकार करना होगा कि अपमान को अनदेखा करना भी अन्याय को बढ़ावा देना है। अब चुप रहना विकल्प नहीं। हर हिंदू को समझना होगा, यह लड़ाई सिर्फ ब्राह्मणों की नहीं। परंपरा पर वार कहीं भी हो, नुकसान पूरे समाज का होता है।
सम्मान माँगा नहीं जाता, दिखाया जाता है। समाज तभी आगे बढ़ता है जब उसकी जड़े सुरक्षित हों। ब्राह्मणों का अपमान केवल व्यक्तियों का अपमान नहीं, यह हिंदू परंपरा, संस्कृति और सामाजिक संतुलन का अपमान है। इसलिए अब समय आ गया है कि गलत बयानों का प्रतिकार हो, दोषियों को सजा मिले, और समाज स्पष्ट संदेश दे कि किसी भी समुदाय का अपमान, विशेषकर उस समुदाय का जिसने हजारों वर्षों तक संस्कृति को जीवित रखा, उसके खिलाफ ‘जहर’ उगलने वालों को अब बख्शा नहीं जाएगा।
-लेखक सामाजिक चिंतक, सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं



