



डॉ. एमपी शर्मा.
कुछ जीवन शब्दों में नहीं, संस्कारों में बसते हैं। वे बोलकर नहीं, जीकर सिखाते हैं। मेरे पिताजी, स्वर्गीय श्री मन फूल राम जी शर्मा, ऐसे ही जीवन थे। मौन, सरल और गहरे। 19 जनवरी 2026 को उनका शारीरिक सान्निध्य भले ही समाप्त हो गया, पर उनके मूल्य, उनकी दृष्टि और उनकी सादगी आज भी हमारे घर-आंगन, खेत-खलिहान और मन के कोनों में जीवित हैं। यह केवल एक पिता का जाना नहीं था, यह उस जीवन-दर्शन का ओझल होना था जो बिना शोर किए सही दिशा दिखाता है।
92 वर्षों का उनका जीवन किसी पद, पुरस्कार या शहरी चमक से नहीं, बल्कि मिट्टी की खुशबू, पसीने की ईमानदारी और सिद्धांतों की दृढ़ता से गढ़ा गया था। वे किसान थे, सच अर्थों में अन्नदाता। प्रकृति से उनका रिश्ता स्वामित्व का नहीं, सहभागिता का था। खेत उनके लिए केवल उत्पादन का साधन नहीं, एक जीवंत संवाद थे। पक्षियों को दाना चुगते देख वे मुस्कराकर कहते,
‘राम जी की चिड़ियाँ हैं, राम जी का खेत है।
खाने दो, अनाज कम नहीं होगा, बढ़ेगा ही।’
यह वाक्य उनके पूरे जीवन-दर्शन का सार था, करुणा घटाती नहीं, बढ़ाती है।
औपचारिक शिक्षा उन्होंने सातवीं कक्षा तक ही प्राप्त की थी, पर शिक्षा का मर्म उनसे बेहतर शायद ही कोई समझता हो। वे कहते थे कि विद्या नौकरी का टिकट नहीं, आत्मसम्मान और विवेक का दीपक है। बच्चों को उन्होंने पढ़ाई इसलिए नहीं सिखाई कि वे केवल कमाएँ, बल्कि इसलिए कि वे सोच सकें, सवाल कर सकें और सही-गलत का भेद जान सकें। संस्कृत का श्लोक? ‘विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्’ उनके जीवन में किताब की पंक्ति नहीं, आचरण की सच्चाई था।
संयुक्त परिवार में पले-बढ़े पिताजी ने पारिवारिक मूल्यों को जीवन का आधार माना। अपने बड़े भाई, स्वर्गीय श्री उदमी राम जी, के प्रति उनका सम्मान देवतुल्य था। उनके व्यवहार में विनम्रता और अनुशासन स्वाभाविक थाकृकोई दिखावा नहीं, कोई उपदेश नहीं। वे मानते थे कि परिवार साथ रहने की व्यवस्था नहीं, एक-दूसरे का संबल बनने की परंपरा है। आज जब परिवार शब्द सिमटता जा रहा है, उनका जीवन हमें उसकी व्यापकता याद दिलाता है।
ईश्वर के प्रति उनकी आस्था स्थिर और शांत थी। वे प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में उठते, शुद्धि के बाद ध्यान और उपासना में लीन हो जाते। जीण माता जी के प्रति उनकी श्रद्धा आडंबर से मुक्त, पूर्ण निष्ठा से भरी हुई थी। सादा भोजन, सीमित आवश्यकताएँ और शांत स्वभाव, यही उनका वैभव था। ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ कोई नारा नहीं, उनकी रोजमर्रा की आदत थी।
धोती-कुर्ता उनकी पहचान थी, परंपरा से जुड़ाव का प्रतीक। वे समय के साथ चलने के विरोधी नहीं थे, पर चेतावनी स्पष्ट थी, ‘आगे बढ़ो, पर अपनी जड़ें मत भूलो।’ गाँव का घर, खेत, भूमि और पूर्वजों का सम्मान उनके लिए स्मृति नहीं, जिम्मेदारी थे। उन्होंने कभी परिस्थितियों से समझौता नहीं किया; उन्होंने परिस्थितियों को अपने सिद्धांतों के अनुसार ढाला। यही असली मजबूती है, जो हालात से नहीं, मूल्यों से जन्म लेती है।
पिताजी ने हमें सिखाया कि धन से अधिक संस्कार जरूरी हैं, पद से अधिक मानवता और सफलता से अधिक सदमार्ग। उनके लिए जीत का अर्थ आगे निकलना नहीं, सही रहना था। आज वे हमारे बीच शारीरिक रूप से नहीं हैं, पर उनके विचार हमारी सोच में, उनके संस्कार हमारे निर्णयों में और उनका आशीर्वाद हमारी हर कोशिश में मौजूद है।
पिताजी, आपकी ईमानदारी, करुणा और सिद्धांतों पर टिका जीवन ही हमारी असली विरासत है। उन मूल्यों को जीना और अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना ही आपके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।
आपकी स्मृति को शत-शत नमन।
-लेखक जाने-माने सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं







