



गोपाल झा
जिंदगी की अवधि कितनी होगी, यह किसी को नहीं पता। लेकिन जिंदगी का अर्थ क्या हो, यह जानना हर समझदार इंसान की जिम्मेदारी है। क्योंकि तय है कि न हम कुछ लेकर आए हैं, न कुछ लेकर जाएंगे। पीछे रह जाएंगी तो सिर्फ हमारी यादें और हमारे किए गए आमाल। इसी कसौटी पर अगर किसी जीवन को परखा जाए, तो भगत सिंह का नाम सबसे ऊपर दिखाई देता है। उन्होंने बहुत कम उम्र में यह सच जान लिया था कि जिंदगी की क़ीमत उसकी लंबाई में नहीं, उसके मक़सद में होती है।
हर साल 23 मार्च को हम उन्हें याद करते हैं, माल्यार्पण, नारे और तक़रीरें होती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यही याद करना काफ़ी है? या फिर उनके व्यक्तित्व से सीख लेकर उसे अपने जीवन में उतारना ही सच्ची श्रद्धांजलि है? भगत सिंह की ज़िंदगी हमें कम से कम दस ऐसी प्रेरणाएँ देती है, जो आज भी उतनी ही ज़रूरी हैं।
उद्देश्यपूर्ण जीवन: भगत सिंह ने बहुत जल्दी अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लिया था, देश की आज़ादी। उन्होंने कभी भटके बिना उसी राह पर चलना चुना। यह सिखाता है कि बिना लक्ष्य के जीवन, बिना पतवार की नाव जैसा होता है।
उम्र नहीं, सोच मायने रखती है: जिस उम्र में ज़्यादातर युवा खेल और मस्ती में डूबे रहते हैं, उस उम्र में भगत सिंह समाज, राजनीति और इंक़लाब पर सोच रहे थे। इससे सीख मिलती है कि परिपक्वता उम्र से नहीं, गहरी सोच से आती है।
मौत से बेख़ौफ़ साहस: वे जानते थे कि उनकी शहादत से उसी दिन आज़ादी नहीं मिलेगी, फिर भी वे पीछे नहीं हटे। यह जज़्बा सिखाता है कि बड़े मक़सद के लिए निजी ख़ौफ़ को कुर्बान करना पड़ता है।
जोखिम उठाने का हौसला: आज हम छोटी-छोटी असुविधाओं से घबरा जाते हैं। भगत सिंह बताते हैं कि देशहित या समाजहित में कुछ पाने के लिए जोखिम उठाना ही पड़ता है। बिना ख़तरे के कोई बड़ा बदलाव नहीं आता।
ज्ञान के प्रति लगन: जेल में रहते हुए 300 से ज़्यादा किताबें पढ़ना और फांसी से पहले भी किताब पूरी करने की ख़्वाहिश, यह बताता है कि इल्म उनके लिए सांसों जितना ज़रूरी था। सीख यह कि पढ़ना और सीखना कभी बंद नहीं होना चाहिए।
विचारों के बिना क्रांति नहीं: भगत सिंह मानते थे कि बिना वैचारिक समझ के कोई आंदोलन खोखला होता है। यह हमें सिखाता है कि भावनाओं के साथ-साथ सोच का होना भी ज़रूरी है।
अंधभक्ति से दूरी: वे किसी के पिछलग्गू नहीं थे। हर बात को तर्क की कसौटी पर परखते थे। ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ उनका बौद्धिक साहस दिखाता है। इससे सीख मिलती है कि सवाल करना गुनाह नहीं, ज़िम्मेदारी है।
विवेकपूर्ण देशभक्ति: भगत सिंह की देशभक्ति भावनात्मक नारेबाज़ी नहीं थी, बल्कि समझदार और विवेकपूर्ण थी। वे सिखाते हैं कि बिना विवेक की देशभक्ति भी कमज़ोर पड़ जाती है।
संगठन की ताक़त: उन्होंने युवाओं को संगठित किया, क्योंकि वे जानते थे कि बिखरी हुई ऊर्जा से इंक़लाब नहीं होता। यह आज के समय में भी उतना ही सच है, सामूहिक प्रयास ही बदलाव लाता है।
कर्म ही असली पहचान: भगत सिंह कोई मूर्ति नहीं थे, वे चलते-फिरते विचार थे। उनका जीवन बताता है कि इंसान अपने कर्मों से ज़िंदा रहता है, वरना यादें भी धीरे-धीरे धुंधली हो जाती हैं।
अंत में, भगत सिंह आज भी हमसे सवाल करते हैं, क्या तुम सिर्फ मेरा नाम जानते हो, या मेरे विचारों को जीने का हौसला भी रखते हो? अगर हमने उनकी इन दस प्रेरणाओं में से कुछ को भी अपने जीवन में उतार लिया, तो यही उनके प्रति सच्चा एहतराम होगा। वरना शहादत दिवस बस एक तारीख बनकर रह जाएगा, और हम रस्म निभाकर आगे बढ़ जाएंगे।







