



एडवोकेट मिताली अग्रवाल.
महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण की वह पावन रात्रि है जब मनुष्य अपने भीतर छिपी दिव्यता को महसूस करता है। यह वह क्षण है जब प्रकृति भी मानो ठहर जाती है, वातावरण में एक अद्भुत शांति फैल जाती है, और साधक अपने अंतर्मन की गहराइयों में उतरकर उस शक्ति से जुड़ने का प्रयास करता है, जिसे हम महादेव कहते हैं। कहा जाता है कि शिवरात्रि की रात ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने सबसे शांत और प्रभावी रूप में होती है। इस रात किया गया ध्यान, जप और साधना मन को स्थिरता प्रदान करती है। जब मन स्थिर होता है, तो जीवन के उलझे हुए प्रश्न भी धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगते हैं। तन को शांति मिलती है और आत्मा अपने मूल से जुड़ने लगती है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि को केवल पूजा-पाठ का दिन नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव की रात्रि कहा जाता है।
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन केवल बाहरी उपलब्धियों का नाम नहीं है। सच्ची साधना भीतर के भय, भ्रम और अहंकार को त्यागने में है। महाशिवरात्रि वह अवसर है जब हम अपने डर छोड़ते हैं, अपने भ्रम तोड़ते हैं और विश्वास, साहस तथा प्रकाश की ओर कदम बढ़ाते हैं। यह आत्ममंथन की रात हैकृजहाँ हम स्वयं से प्रश्न करते हैं और स्वयं में ही उत्तर खोजते हैं।
जनमानस की शिवभक्ति अत्यंत सरल और निष्कपट होती है। इसमें न कोई जटिल विधि है और न कठोर नियम। लोगों की आस्था सीधी और सहज है, हमें बस इतना पता है कि शिव हमारे हैं और हम शिव के। यही भावना इस पर्व का मूल है। शिव किसी आडंबर में नहीं, बल्कि सच्चे भाव में बसते हैं। भव्यता से अधिक महत्व भावना का है। सच्चे हृदय से किया गया एक छोटा-सा स्मरण भी महादेव तक पहुँच जाता है।
जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब परिस्थितियाँ कठिन हो जाती हैं। जब हालात हमारा साहस तोड़ने लगते हैं, जब अपने भी पराये जैसे लगते हैं, तब भीतर से एक विश्वास भरी आवाज उठती है, ‘महादेव संभाल लेंगे।’ यह आवाज किसी मंदिर की घंटियों से नहीं, बल्कि हमारे अंतःकरण से आती है। यह वही भीतर का शिव है जो हमें हर संकट में संभालने की शक्ति देता है।
शिव का स्वरूप हमें जीवन का संतुलन सिखाता है। वे विरक्ति के भी प्रतीक हैं और करुणा के भी। वे संहारक भी हैं और सृजनकर्ता भी। उनका संदेश स्पष्ट है, हार अंत नहीं है, जीत अहंकार नहीं है, और जीवन का हर उतार-चढ़ाव एक सीख है। महाशिवरात्रि हमें यह समझाती है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, धैर्य और विश्वास बनाए रखना ही सच्ची साधना है।
इस पावन रात्रि में लाखों श्रद्धालु महादेव के समक्ष अपनी चिंताएँ, पीड़ा, थकान और आशाएँ अर्पित करते हैं। वे जानते हैं कि शिव दिखावा नहीं देखते, वे केवल भाव देखते हैं। भोलेनाथ का संदेश सरल है, ‘भक्ति को कठिन मत बनाओ, बस उसे सच्चा बनाओ।’
महाशिवरात्रि हमें विवेक देती है ताकि हम सही निर्णय ले सकें; करुणा देती है ताकि हम दूसरों के दुख को समझ सकें; शक्ति देती है ताकि कठिनाइयों में डट सकें; और साहस देती है ताकि सत्य के लिए अकेले भी खड़े रह सकें।
अंततः यही सत्य है कि हमारी शक्ति, हमारी आशा और हमारा सहारा सब महादेव ही हैं। यदि मन शिवमय हो जाए, तो जीवन स्वतः शांत और प्रकाशमय हो जाता है। यही सच्ची पूजा है, यही ध्यान है और यही महाशिवरात्रि का वास्तविक सार है।







