



राजेश चड्ढ़ा.
कहावताँ ना सिर्फ़ लफ़्ज़ दा समूह हुँदियाँ हन सगों साढे़ पूर्वजाँ दे सदियाँ दे अनुभव, नैतिकता अते लोक-सयाणप दा सार हुँदियाँ हन। पँजाबी लोक-परँपरा दी कहावत ‘हथीं अखर, कख ना सखर’ असल विच उस हालत नूँ बयान करदी है जिथे इँसान दी गल विच लफ़्ज़ ताँ मौजूद हन, पर ओहना विच रूह दी मिठास नहीं। ज्ञान है, पर प्रेम नहीं। इल्म है, पर इश्क़ नहीं। एह कहावत अपणे आप विच ना सिर्फ़ बोली दी चतुराई है सगों सूफ़ियाना तजुर्बे दा निचोड़ है।
भाषा ना सिर्फ़ बोलचाल दा ज़रिया है, सगों दिल दी हालत दा शीशा है। जे कर लफ़्ज़ हाथ तक सीमित रह जाण, दिमाग़ विच अटक जाण, ते दिल दी आग नाल ना पिघलण, ताँ ओह ‘अखर’ ताँ हन, पर ‘सखर’ नहीं। ‘अखर’ इल्म दा प्रतीक हन। अजेहा इल्म जो किताबाँ, बहसाँ अते याददाश्त तों मिलदा है। अखर ज़रूरी ताँ है, पर सँपूर्ण इल्म नहीं है। दूजे पासे ‘सखर’ इश्क़ है। रूह दी मिठास है। दिल दी नरमी है। हमदर्दी, प्रेम, दया अते समर्पण है।
सूफ़ी कहँदे हन-इल्म जे इश्क़ तो खाली होवे, ताँ ओह बोझ बण जाँदा है। पँजाबी दी इस कहावत विच श्कख ना सखरश् कह के एह दसेया गया है कि खाली अल्फ़ाज़ विच इश्क़ दी रत्ती भर वी मिठास नहीं हुँदी।
‘हथीं अखर’ दा मतलब सिर्फ़ इन्ना नहीं कि लिखावट हाथ नाल लिखी गई है। एह ओह लफ़्ज़ हन जो दिल तो नहीं, अहँकार तो निकले हन। जेड़े समझ तों पैदा होए हन, एहसास तों नहीं। इन्हाँ नूँ सिखेया अते सिखाया ताँ जा सकदा है पर एह दिल नूँ पिघलौण दी ताकत नहीं रखदे।
एह मनेया जाँदा है कि जद अल्फ़ाज़ दिल तों निकलदे हन, तद ही दिल तक पहुँचदे हन। पर जद एह सिर्फ़ हत्थ या ज़ुबान तक रह जाण, ताँ बेअसर हो जाँदे हन। एह कहावत समझौंदी है कि बिना प्रेम दी नसीहत इक ज़ख़्म बण जाँदी है। बिना हमदर्दी दा सच तलवार बण जाँदा है। शिष्टाचार दे बिना इल्म अजेहा परदा बण जाँदा है जेड़ा रोशनी दी थाँ ते हनेरा कर दिंदा है। इस लयी ‘हथीं अखर, कख ना सखर’ कहावत, उस इँसान दी पछाण है जेड़ा सच ताँ बोलदा है, पर कठोर है। सच्चा लिखदा है, पर बेरहम है, ज्ञान रखदा है, पर मासूम जेहा दिल नहीं रखदा।
सूफ़ी दर्शन दियाँ तिन्न मँज़िलाँ हन- क़ायदा, अध्यात्म अते हक़ीक़त। जेडा इंसान सिर्फ़ क़ायदे तक रुकेया रहे, ओह ‘अखर’ विच फस जाँदा है। अध्यात्म दे राहीं, हक़ीक़त तक ओह ही पहुँचदा है, जिसदे अल्फ़ाज़ विच ‘सखर’ घुली होवे। जिन्हाँ लफ़्ज़ाँ विच मिठास नहीं होंदी, मनेया जाँदा है कि उन्हाँ लफ़्ज़ाँ विच अहँकार बोल रेहा हुँदा है। इन्हाँ लफ़्ज़ाँ दी कुड़तन पीछे, अपणे आप नूँ सही साबित करण दी लालसा अते दूजे नूँ नीवाँ दिखौण दी इच्छा कि श्मैं जाणदा हांश् इस अहँकार नूँ एह कहावत बेनकाब करदी है। बुल्ले शाह आखदे हन-
पढ़ पढ़ आलिम फ़ाज़िल होयों,
कदे अपणे आप नूं पढे़या ही नहीं।
यानी अखर ताँ हज़ाराँ पढ़ लये पर अपणे अखराँ अँदर सखर पैदा नहीं कीती। जेकर बोलण वाला खुद ना बदले अते सुनण वाला खुद ना पिघले अते अल्फ़ाज़ सिर्फ़ जानकारी दिंदे होये, कोई तब्दिली पैदा ना करण ताँ सब कुज बेमानी है। ‘हथीं अखर, कख ना सखर’ कहावत, इन्हाँ बेमानी लफ़्ज़ाँ दी नाकामी दा एलान करदी है।
इस दौर विच एह कहावत होर वी ज़्यादा लागू हो गई है। अज्ज बहोत बोलण वाले हन, बहोत लिखण वाले हन, पर दिल नाल बोलण वाले अते दिल नाल लिखण वालेयाँ दा घाटा है। सोशल मीडिया, भाषण अते लेख बहोत कहे-लिखे जा रहे हन, यानी अखर भरपूर हन, पर उन्हाँ विचकार सखर गुआच गयी है।
इन्हाँ कहावताँ नूँ बचौण दा सब तों चँगा तरीका एह है कि असीं इन्हाँ नूँ अपणी गल्ल-बात विच शामिल करिये। कहावताँ ना सिर्फ़ भाषा नूँ सुंदर बणौंदियाँ हन, सगों घट अल्फ़ाज़ विच वड्ढी गल्ल कहण दी ताकत वी दिंदियाँ हन। ‘हथीं अखर, कख ना सखर’ कहावत असल विच सानूँ एह दसदी है कि बिना इश्क़, इल्म अधूरा है। प्रेम दे बगैर, अल्फ़ाज़ बेजान हन अते बिना हमदर्दी, नसीहत जुल्म है। इँसान ओह नहीं जेड़ा कहे होये नूँ ज़्यादा जाणदा है, इँसान ओह है जेड़ा अनकहे नूँ ज़्यादा समझदा है।
इश्क़ प्याला, लफ़्ज़ सुराही
होवे अखर दी सखर सियाही
तेरे बोल ख़ुदा बण जावण
कहें लिक्खें जे रूह दे राहीं
-लेखक आकाशवाणी के पूर्व वरिष्ठ उद्घोषक और जाने-माने शायर हैं



