



राजेश चड्ढ़ा.
एह इक जाणेया-पछाणेया तथ है कि साहित्य दी शुरुआत मौखिक परंपरा नाल ही होयी, जित्थे कवि अते श्रोते सन। जद साहित्य लिखित तौर ते आया, ताँ कवि, पाठ अते पाठक तिन पख होये। छपाई तों बाद बाद साहित्य चार पखाँ विच वँडेया गया-लेखक, किताब, किताब बाज़ार अते पाठक। जिसने साहित्य विच लोकतंत्रीकरण लेयाँदा।
साहित्य दी इक शैली क़िस्सा साहित्य वी है। क़िस्सा दर असल किसे दिलचस्प घटना दा वर्णन या किसे अनुभव दा दुबारा कहणा हुँदा है, जो किसे कहाणी या घटना दा इक सरल वृताँत हुँदा है। एह इक असली घटना बारे विच हुँदा है, जिस विच कहाणियाँ दी वरतों करके इसदे वख-वख पहलुआँ नूँ दसेया जाँदा है।

क़िस्सा साहित्य दा इतिहास मौखिक परंपरा नाल शुरू हुँदा है। जित्थे कहाणियाँ नूँ मौखिक तौर ते बयान कीता जाँदा सी। एह क़िस्सा साहित्य, मध्यकाल विच उर्दू साहित्य दी इक प्रसिद्ध गद्य शैली विच विकसित होया।
क़िस्सा साहित्य दा इतिहास सिर्फ़ इक भाषा तक सीमित नहीं है, सगों भारती भाषावाँ विच वी इसदा विकास होया है।
एह साहित्य समाज, सभ्याचार अते धार्मिक विश्वासाँ नूँ दस्तावेज़ी रूप दिंदा है, जिस विच कई कहाणियाँ समाज दे रवैये नूँ दर्शाैंदियाँ हन।

पंजाबी क़िस्सा साहित्य-प्रेम, सामाजिक कदराँ-कीमताँ अते बगावत दियाँ कवितावाँ अते कहाणियाँ दा इक समृद्ध रूप है, जो मध्ययुगी काल तों विकसित होया है अते जिस विच फ़ारसी दे नाल-नाल भारती लोक परंपरावाँ नूँ मिलौंदा है। इसदा इतिहास फारसी अते भारती सभ्याचार दे सुमेल नाल शुरू हुँदा है। बाबा नानक दे समय विच धार्मिक अते आध्यात्मिक महता प्राप्त करदा है। इस वजहों ही अट्ठारहवीं सदी तक ‘हीर-रांझा’ वरगे प्रसिद्ध प्रेम-आधारित क़िस्से सामणे औंदे हन। क़िस्सा शैली ने पँजाबी लोक संँगीत नूँ वी प्रेरित कीता है।

पँजाबी क़िस्सेयाँ दी शुरुआत विच, फ़ारसी अते इस्लामी परंपरावाँ दा असर सी, जेड़ा प्रेम, बहादुरी अते आदर ते आधारित कहाणियाँ विच साफ़ दिखायी दिंदा है। अरब अते ईरानी प्रवासियाँ राहीं दक्खणी एशिया विच पहुँचण तों बाद, क़िस्सेयाँ ने अपणियाँ जड़ाँ नूँ इस्लाम तों पहलाँ दे पँजाबी सभ्याचार अते लोकधारा विच समा लेया।

सिख धर्म अते इसदे धार्मिक ग्रंथाँ ने पँजाबी साहित्य दियाँ जड़ाँ नूँ मजबूत कीता। इस वजहों सूफ़ी कवितावाँ अते धार्मिक साहित्य वी क़िस्सा शैली तों प्रभावित होये, जेड़े बाद विच क़िस्सेयाँ दा आधार बणे।
क़िस्सेयाँ विच ज़्यादातर कहाणियाँ सन।
क़िस्सेयाँ नूँ पँजाबी लोक सँगीत नूँ प्रसिद्ध करण दा श्रेय दिता जाँदा है। इन्हाँ परंपरावाँ दा मौखिक या लिखित रूप पीढी़ दर पीढी़ चलदा सी अते अक्सर एह बच्चेयाँ नूँ सौण वेले कहाणियाँ दे रूप विच सुणाया जाँदा सी या लोक गीताँ दे रूप विच संगीतक तौर ते पेश कीता जाँदा सी।

अट्ठारहवीं सदी तक, क़िस्सा शैली बहोत प्रसिद्ध हो गयी। हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल अते मिर्ज़ा-साहिबा वरगियाँ प्रेम अते जुनून ते आधारित कहाणियाँ क़िस्सा शैली विच ही रचियाँ गइयाँ। एह क़िस्से आम लोकाँ विच बेहद मशहूर होये अते इन्हाँ नूँ स्थानक सरपरस्ताँ ने उत्साहित करदे होये भारत दे होर हिस्सेयाँ विच फैलाया।

पँजाबी क़िस्से अक्सर दोस्ती, वफ़ादारी, प्रेम अते क़ौल-करार वरगियाँ महत्वपूर्ण पंजाबी कदराँ-कीमताँ ते आधारित हुँदे हन। इन्हाँ विच प्यार, जुनून, धोखा, कुर्बानी अते व्यवस्था दे खिलाफ आम आदमी दी बगावत वरगे विषयाँ नूँ शामिल कीता जाँदा है। क़िस्सेयाँ नूँ लोकसँगीत दी प्रेरणा मनेया जाँदा है अते इन्हाँ किस्सेयाँ दी पेशकश विच गायकी, सँगीत अते ताल दा ढूँगा सँबँध हुँदा है।

उन्नीसवीं अते बीसवीं सदी दौरान पँजाबी साहित्य विच होर ज़्यादा फ़र्क आया, जिस विच कवितावाँ, नावलाँ अते नाटकाँ दी नवियाँ शैलियाँ दा विकास होया। अमृता प्रीतम ने वँड अते औरताँ दे अनुभवाँ वरगे विषयाँ ते लिखेया। शिव कुमार बटालवी दी लूणा अपणे आप विच पँजाबी क़िस्सा साहित्य दी उत्तमता दी गवाही है।
पँजाबी क़िस्सा साहित्य दा इक लँबा अते समृद्ध इतिहास है जो प्रेम, मनुखी भावनावाँ अते सभ्याचारक कदराँ-कीमताँ दी कहाणियाँ दे ज़रिये अज्ज वी पँजाबी सभ्याचार अते भाषा दा इक महत्वपूर्ण हिस्सा बणेया होया है।
-लेखक जाने-माने शायर और आकाशवाणी के पूर्व वरिष्ठ उद्घोषक हैं




