



राजेश चड्ढ़ा.
दशम गुरु गुरुगोबिंद सिंह जी दुआरा रचेया ‘ज़फ़रनामा’ औरंगज़ेब नूँ लिखेया ना सिर्फ़ इक ख़त है, सगों इक रूहानी दस्तावेज़ है। सच दी फ़तह दा ऐलान अते इक सच्चे फ़कीर-योद्धे दी आत्मिक गवाही है। ज़फ़रनामा ना सिर्फ़ इक बादशाह नूँ लिखेया पत्तर है, सगों इँसाफ़, हिम्मत, सच अते इश्क़-ए-हक़ दी एकता दा भाव है।
फ़ारसी छँदाँ विच लिखेया गया ज़फ़रनामा 1705 ईस्वी विच दो सिख सूरमे-भाई दया सिंह अते भाई धर्म सिंह दे जरिए औरंगज़ेब नूँ भेजेया गया सी। गुरु गोबिंदसिंह जी इस गल नूँ जाणदे सन कि सम्राट इस नूँ पढ़ के हत्थोंहथ प्रतिक्रिया देवेगा, इस करके एह पत्तर जाणबूझ के बादशाह दे दूताँ नूँ नहीं सौंपेया गया। गुरु जी ने भाई दया सिंह नूँ हुक्म दित्ता सी कि-औरँगज़ेब नूँ पत्तर सुपुर्द करदे वक्त निडरता अते हिम्मत नाल बोलणा है, अते भाई दया सिंह ने बिल्कुल एहो ही कीता।

इक्याणवें साल दे औरँगज़ेब ने जद पत्तर पढे़या, ताँ उसने गुरु जी नूँ बहोत बुद्धिमान, सच्चा अते निडर योद्धा दे रूप विच स्वीकार कीता।
आख़ेया जाँदा है कि ज़फ़रनामा पढ़ के अपणे जीवन कर्म दा पश्चाताप करदे होये औरँगज़ेब कँबण लग पेया। औरंगज़ेब ने कलम चुकेया अते गुरु जी नूँ पहलाँ पत्तर ना लिखण दी अपणी मजबूरी ज़ाहिर कीती अते बिना झिझके बेनती कीती कि गुरु जी उस नाल अहमदनगर विच जल्दी तों जल्दी मुलाकात करण।
ज़फ़रनामा दर असल इक उच्चे आत्मिक दर्जे वाले इँसान वलों इक जालिम, बिगड़े होये अते अण-मनुखी हाकम नूँ दित्ती गई कठोर फटकार वरगा दस्तावेज़ है।
गुरु जी ने इस पत्तर दे 111 श्लोकाँ विच औरँगज़ेब नूँ ओसदियाँ मनुखी कमियाँ, फ़रेब अते ज्यादतियाँ लयी सख़्त फटकार लगायी है। बावजूद इसदे कि गुरु जी ने निजी तौर ते बहोत वड्ढा नुकसान सेहा, ओहना ने सर्वशक्तिमान परमात्मा विच अपणे यकीन अते अटूट आस्था नूँ इस पत्तर विच दोहराया है।
ज़फ़रनामा नूँ जेकर सूफ़ियाना नज़रिये नाल समझण दी कोशिश कीती जावे ताँ इस दी शुरुआत ही इस गवाही नाल हुँदी है कि सच दी रज़ा बिना कोई जीत मुकम्मल नहीं।
गुरु साहिब फ़रमौंदे हन कि ओहना ने हथियार तद चुकेया जद सारे शाँतिपूर्ण जरीए बँद हो गए। सूफ़ी सँत वी सदियाँ तों एही कहँदे आये हन-
जद सजदा सच वल होवे,
ताँ खड़ग वी इबादत बण जाँदा है।
ज़फ़रनामा दे इस भाव विच गुरु साहिब दी आवाज़ रूहानी ते सूफ़ियाना हो जाँदी है। गुरूजी आखदे हन-
हक़ दे रस्ते तों हटणा गुनाह,
ते हक़ लयी खड़ना इबादत।
यानी एह जँग तलवार दी नहीं,आत्मा दी शुद्धता दी है।

ज़फ़रनामा दा सब तों तेज़ अते सब तों ज़्यादा छूण वाला हिस्सा है गुरु साहिब दुआरा औरँगज़ेब नूं दिती रूहानी फटकार। गुरु साहिब कहँदे हन-
तूँ बादशाह ताँ ज़रूर हैं, पर तेरे दिल विच सुल्तानियत नहीं।
सूफ़ी फ़कीर वी एही कहँदे हन-
जिस दिल विच ख़ुदावँद दा डर नहीं
ओस दे कारज, सिर्फ़ तख़्ताँ नाल सजदे नहीं बणदे।
गुरु साहिब औरँगज़ेब नूँ आईना दिखौंदे ने कि झूठियाँ क़समाँ, दग़ाबाज़ी, तसल्ली दे झूठे वादे, एह सब बादशाहत नूँ चमका ताँ सकदे ने, पर रूहानी तौर ते उस दी अँदरूनी बदसूरती नूँ बेनकाब करदे ने।
सत्ता दे अहँकार नूँ जिस तरहाँ सूफ़ी सँत सदियाँ तों खारिज करदे आये हन, ओसे तरहाँ ज़फ़रनामा वी सूफ़ी परँपरा दा इक उच्चा दस्तावेज़ है।
सूफ़ियाना सोच कहँदी है कि जद दिल विच हक़ दी लौ दहक रही होवे, ताँ हल्की तों हल्की किरण वी अक्खाँ दी चमक बण जाँदी है। सूफ़ी सँताँ दे मुताबिक-रब्ब जिस नूँ फ़तेह दे नाल मालामाल कर देवे, ओस नूँ फौजाँ दी लोड़ नहीं रहँदी।
गुरु साहिब दी अजेही रूहानी ताक़त दी ज़फ़रनामा वरगी मिसाल कमज़ोरी नूँ वी ताकतवर बणा दिंदी है।
ज़फ़रनामा विच गुरु साहिब औरँगज़ेब नूँ ज़िंदगी दी हकीकत याद करौंदे होये आखदे हन-
तूँ उम्र दे अखीरी पड़ाव ते खड़ा हैं इस लयी सच दे सामने रुक नहीं सकेंगा।
गुरु साहिब दी एह आवाज़ एत्थे सख़्त घट अते रूहानी दया नाल भरी होयी ज़्यादा लगदी है। सूफ़ी वाणी वी कहँदी है-
जिस्म दी उमर मुक्क जाँदी है
पर कर्म दी किताब खुली रहँदी है।
गुरूजी बादशाह नूँ कहँदे हन-
ज़ुल्म दी उमर छोटी है,
सच अते इँसाफ़ हमेशा अमर है।
एह इक अजेही चेतावनी है जिस विच इक इँसान दा दूजे इँसान नूँ आध्यात्मिक सच दसेया गया है, एह जँग दा एलान कत्तई नहीं है।
ज़फ़रनामा दे कई श्लोक उस दर्द नूँ वी बयान करदे हन जेहड़ा गुरु साहिब ने अपणे चार साहिबजादेयाँ, माता जी, अते अनेका प्यारी सँगताँ दे शहीद होण ते महसूस कीता। पर एह दर्द शिकवा नहीं, इश्क़-ए-हक़ यानी ईश्वरीय प्रेम दी बुलँदी बण के सामने औंदा है। सूफ़ी फ़कीराँ दे मुताबिक-
जो रब्ब दी राह विच कुर्बान हो जावे, ओह अमर हो जाँदा है।
गुरु साहिब दा दिल रोया ताँ ज़रूर, पर टूटेया नहीं। क्योंकि ओह जाणदे सन कि सच दी राह विच दिती गयी कुर्बानी पत्थर ते नहीं, अस्मान ते लिखी जाँदी है।
गुरु साहिब लिखदे हन-
जब सब तरिका होत प्रगट
तब ही करूँ मैं सारें।
एह सिद्धाँत सूफ़ीयत दा मुख नियम है कि हिंसा कदी नहीं होणी चाहीदी, पर जुल्म दे सामने खामोशी वी गुनाह है। हक़ दे वास्ते आवाज़ उठाणी फ़र्ज़ है, नहीं ताँ रूहानी सफ़र वी अधूरा है।
गुरु साहिब दी जँग सत्ता लयी नहीं सी, एह जँग इँसानी इज़्ज़त, स्वतँत्रता अते रूहानी हक़ दी रक्षा लयी सी।
ज़फ़रनामा विच गुरु साहिब औरँगज़ेब दी बादशाहत नूँ सवाल करदे हन-
तेरी सल्तनत ते फौजाँ दा की मतलब,
एह ताँ तद हुँदा है जद दिल विच डर नहीं धोखा भरेया होवे।
सूफ़ीयत वी इस गल दी गवाही दिन्दी है कि सच्चा राज ओह है जेड़ा दिलांँ विच वसदा है। इँसाफ़ ज़ोर तों नहीं, प्रेम अते नूर तों पैदा हुँदा है।
फ़कीर बुल्ले शाह वी एही आखदे हन-
जे तूंँ जग दा मालिक एँ,
ताँ दिलांँ विच वस।
ज़फ़रनामा एह साबित करदा है कि सच्ची सल्तनत उसदी हुँदी है जिसदे ज़मीर विच रोशनी होवे।
ज़फ़रनामा सच दे पख विच इक अजेहा रूहानी फ़तवा है जेड़ा ज़ुल्म दे खिलाफ अते मनुखी गरिमा दी रक्षा लयी दिता गया है। जिस दा सूफ़ियाना सार एह है कि-
सच अकाल है अते सच दे सामने कोई झूठ टिक नहीं सकदा।
हक़ दी जँग आत्मा दा उत्थान है।
कमज़ोरी विच नूर पौण वाला रब्ब खुद लड़दा है।
बादशाहत दा असली ताज इँसाफ़ अते नियत है, ना कि फौजाँ अते तलवाराँ।
जो रब्ब नाल जु़ड़दा है, ओह दुनिया नूँ हरा सकदा है, दुनिया ओस नूँ नहीं।
ज़फ़रनामा पढ़के महसूस हुँदा है कि गुरु गोबिंद सिंह जी दी वाणी तलवार नालों तेज़, सूफ़ीयत नालों नरम अते अमृत वाँगू मीठी है।
एत्थे एह जानणा वी बहोत ज़रूरी है कि अपणे राजस्थान दे श्रीगँगानगर ज़िले विच 3 जुलाई 1942 नूँ जन्मे श्रद्धेय मोहन आलोक ने गुरु गोबिंद सिंह जी दे इस ऐतिहासिक पत्तर श्ज़फ़रनामाश् दा हिंदी विच अनुवाद वी कीता है, जेड़ा ओहना दे खास कारजाँ विचों इक, बेमिसाल कारज है। राजस्थान साहित्य अकादमी अते केंद्र दी साहित्य अकादमी, नवीं दिल्ली वलों सम्मानित आदरजोग मोहन आलोक राजस्थानी भाषा दे अजहे प्रयोगात्मक कवि रहे हन, जिन्हाँ ने ‘डाँखळा’ (लिमरिक) अते ‘रूबाई’ वरगियाँ विधावाँ नूँ राजस्थानी विच बेहद मशहूर कीता है। 19 अप्रैल 2021 नूँ सानूँ हमेशा लयी अलविदा कहण वाले श्री मोहन आलोक ने ‘ज़फ़रनामा’ दा हिंदी अनुवाद कर के सिर्फ़ इस महान कृति नूँ वड्डे पाठकाँ तक ही नहीं पहुँचाया, सगों हिंदी, राजस्थानी अते पँजाबी साहित्य नूँ वी समृद्ध किता है।
असल विच ज़फ़रनामा इक फ़कीर-राजा, इक रूमानी अते आध्यात्मिक योद्धे दुआरा रची गयी इक अमर रचना है।
ज़फ़रनामा ज़ालिम दा परदा फ़ाश वी करदी है अते ओस नूँ आत्मिक तौर ते तौबा दी राह वी दिखौंदी है।
ज़फ़रनामा दे हर शब्द दा सूफ़ियाना रँग एह कहँदा है कि-
हक़ दी फ़तेह मुकद्दर नहीं
परमात्मा दा कानून है।
इसलयी ज़फ़रनामा आज वी कहँदा है कि-
ज़ुल्म दी रात चाहे किन्नी वी लँबी हो जावे
सच दा सूरज ज़रूर चढ़दा है।
-लेखक आकाशवाणी के पूर्व वरिष्ठ उद्घोषक और जाने-माने शायर हैं




