February 2, 2026

1 thought on “मिट्टी दी खुशबू: गंगा गयां गल मुकदी नाहीं

  1. “बुल्ले शाह गल मुकदी ताहीं,
    जद मैं नूं मार मुकाइये” कितनी अच्छी बात कही है,काश यह सभी को समझ आ जाए। बहुत बढ़िया भाई साहब 🙏🏻😊

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