



प्रो. सुमन
भारतीय समाज में पीढ़ियों से एक सवाल बच्चों की पहचान पर मुहर लगाता आया है, ‘तेरा पिता कौन है?’ यह प्रश्न साधारण नहीं था; यह सत्ता, संरचना और सोच का प्रतीक था। लेकिन समय कभी स्थिर नहीं रहता। हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट के एक ऐतिहासिक निर्णय ने इस जमे हुए सवाल की जमीन हिला दी है। अदालत ने साफ कहा है कि जो माँ बच्चे को जन्म देती है, पालती है, उसका भविष्य गढ़ती है, वही उसकी पहचान तय करने का अधिकार भी रखती है। यह फैसला केवल काग़ज़ों में उपनाम बदलने की अनुमति नहीं है, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था पर गहरा प्रश्नचिह्न है, जो मातृत्व से त्याग तो माँगती रही, पर अधिकार देने में संकोच करती रही। यह निर्णय उन अनगिनत अकेली माताओं के संघर्ष को वैधानिक मान्यता देता है, जिनकी मेहनत अब तक फाइलों और फार्मों में अदृश्य थी। यहाँ से एक नया संवाद शुरू होता है, जहाँ पहचान खून से नहीं, ज़िम्मेदारी और प्रेम से तय होती है।
दरअसल, न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि एक अकेली माँ द्वारा पाले जा रहे बच्चे के दस्तावेजों में माँ का सरनेम (उपनाम) लिखना न केवल वैध है, बल्कि यह बच्चे का संवैधानिक अधिकार भी है। यह फैसला महज एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि भारतीय समाज में:मातृत्व’ को परिभाषित करने वाले पुराने मानदंडों में आया एक क्रांतिकारी बदलाव है।
अकेली माताओं, चाहे वे तलाकशुदा हों या विधवा हों। उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती ‘दस्तावेजीकरण’ रही है। स्कूल में एडमिशन से लेकर पासपोर्ट और आधार कार्ड तक, हर जगह ‘पिता का नाम’ अनिवार्य होना एक ऐसी व्यवस्था थी जो उन्हें बार-बार उनके अकेलेपन का अहसास कराती थी। इस निर्णय की गूंज उन लाखों घरों में सुकून लेकर आई है, जहाँ एक माँ अकेले अपने बच्चे की दुनिया संवार रही है। अब तक की व्यवस्था एक विडंबना ही थी। जिस माँ ने बच्चे को नौ महीने कोख में रखा और अकेले संघर्ष कर उसका पालन-पोषण किया, जब वही माँ बच्चे का स्कूल में दाखिला कराने या पासपोर्ट बनवाने जाती थी, तो सिस्टम उससे पिता का नाम मांगता था।
कल्पना कीजिए उस मानसिक प्रताड़ना की, जब एक महिला को उस व्यक्ति का नाम दस्तावेजों में दर्ज करने के लिए बाध्य किया जाता है, जिसने उसे और उसके बच्चे को त्याग दिया हो। यह स्थिति न केवल माँ के आत्म-सम्मान को चोट पहुँचाती थी, बल्कि अबोध बच्चों को भी एक असहज हीनभावना से भर देती थी। सरकारी दफ्तरों में ‘पिता का अनापत्ति प्रमाण पत्र लाओ’ की रट ने अनगिनत माताओं को रुलाया है। न्यायालय का यह फैसला उस नौकरशाही लालफीताशाही पर करारा तमाचा है, जो अब तक बच्चे के सर्वाेत्तम हित से ऊपर पिता के नाम को रखती आई थी।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि पालन-पोषण करने वाली माँ ही बच्चे की ‘नैसर्गिक अभिभावक’ है। यदि पिता ने जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लिया है, तो उसे केवल जैविक आधार पर बच्चे की पहचान पर एकाधिकार जमाने का कोई हक नहीं है।
यह फैसला इस प्रगतिशील सोच को पुख्ता करता है कि परिवार की परिभाषा अब बदल रही है। परिवार का अर्थ ‘पिता का होना’ नहीं, बल्कि ‘प्रेम और सुरक्षा का होना’ है। अगर वह सुरक्षा माँ दे रही है, तो पहचान भी माँ के नाम से ही होनी चाहिए। यह निर्णय महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक मील का पत्थर है, जो बताता है कि एक महिला ष्बिना किसी सहारे के भी अपने आप में एक संपूर्ण इकाई है।
एक शिक्षिका और समाज के जागरूक नागरिक के तौर पर, मैं इस फैसले को आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुखद संकेत मानती हूँ। यह उन बच्चों को आत्मविश्वास देगा जो ‘पिता का नाम’ न होने पर समाज में खुद को अधूरा महसूस करते थे। अब उनके पास अपनी माँ के नाम का गर्व होगा, उस माँ का नाम, जिसने उनके लिए पिता और माता दोनों की भूमिका निभाई है।
न्यायपालिका ने समाज को आईना दिखा दिया है; अब जिम्मेदारी हमारी है कि हम इस बदलाव को खुले दिल से स्वीकार करें। बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला गवाही देता है कि रिश्तों में खून से ज्यादा अहमियत ‘स्वेद’ (पसीने/संघर्ष) की होती है।
अब बच्चे से कोई पूछे
तुम कौन हो?
तो वह मुस्कुराकर कह सके
मैं अपनी माँ का साहस हूँ,
उसके संघर्ष की संतान हूँ,
उसकी पहचान ही मेरी पहचान है।
लेखिका राजकीय एनएमपीजी कॉलेज में सहायक आचार्य हैं







