



ग्राम सेतु पॉलिटिकल डेस्क.
राजस्थान में करीब दो साल के कार्यकाल के दौरान आम जनता पर अमिट छाप छोड़ने में विफल रहने के बाद भजनलाल सरकार चुनावों का सामना करने का साहस नहीं जुटा पा रही है। हाईकोर्ट की सख्ती के कारण अब सरकार को पंचायतीराज व नगरीय निकाय चुनाव करवाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। ऐसे में सरकार अब आम जनता के साथ पंचायतीराज से जुड़े प्रतिनिधियों को साधने की कवायद में जुटी है। राज्य में पंचायत समितियों और ग्राम पंचायतों की संख्या बढ़ाने के निर्णय को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है।
हनुमानगढ़ जिले में स्थानीय शासन की तस्वीर बदलने वाला बड़ा फैसला सामने आया है। राज्य सरकार ने जिले में पंचायतों और पंचायत समितियों के पुनर्गठन को मंजूरी देते हुए 63 नई ग्राम पंचायतों और तीन नई पंचायत समितियों के गठन की अधिसूचना जारी कर दी है। इससे जिले की पंचायत समितियों की संख्या 7 से बढ़कर 10 हो जाएगी, जबकि ग्राम पंचायतों की संख्या 266 से बढ़कर 329 पहुंच गई है। यह बदलाव न सिर्फ प्रशासनिक ढांचे को नया आकार देगा, बल्कि आने वाले पंचायत एवं निकाय चुनावों के समीकरण भी पूरी तरह बदल देगा।
नई पंचायत समितियों में हनुमानगढ़ जंक्शन, पल्लू और राजपुरा को शामिल किया गया है। वहीं, ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन में सबसे बड़ा हिस्सा नोहर पंचायत समिति क्षेत्र को मिला है, जहां 16 नई ग्राम पंचायतों का सृजन हुआ है। इसके विपरीत संगरिया में केवल एक नई पंचायत गठित हुई है। राज्य सरकार का दावा है कि पुनर्गठन 2011 की जनगणना के आंकड़ों और प्रशासनिक सुविधा के आधार पर किया गया है, लेकिन स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों और कई पूर्व अधिकारी इसे राजनीति और जातीय संतुलन से प्रेरित कदम बता रहे हैं। पुनर्गठन के बाद यह बदलाव जिले के ग्रामीण प्रशासन, चुनावी रणनीति और स्थानीय प्रतिनिधित्व पर गहरा असर डालने वाला है।

जिले में जिन पंचायत समितियों को सबसे ज्यादा फायदा मिला है, उनमें नोहर अव्वल है। यहां 16 नई ग्राम पंचायतें बनाई गई हैं। हनुमानगढ़ में 11, रावतसर में 14, पीलीबंगा में 10, भादरा में 6, टिब्बी में 5 और संगरिया में केवल 1 नई पंचायत बनी है। यह वितरण अपने आप में राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। जिले की तीन पंचायत समितियां, हनुमानगढ़, नोहर और भादरा पहले ही 40 से अधिक ग्राम पंचायतों की सीमा पार कर चुकी थीं। गाइडलाइन के अनुसार नई पंचायत समितियों का गठन आवश्यक माना गया। इसी क्रम में हनुमानगढ़ जंक्शन, पल्लू और राजपुरा को नई समितियों के रूप में शामिल किया गया है। इससे प्रशासनिक बंटवारा आसान होगा, लेकिन राजनीतिक गणित भी नए सिरे से बनेगा।

पंचायतीराज के जानकार व राजस्थान प्रषासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी रामनिवास जाट ने खुले तौर पर कहा है कि पंचायतों की संख्या बढ़ाने का प्रशासनिक औचित्य बेहद कमजोर है और इससे केवल खर्च बढ़ेगा। उनके अनुसार अब पंचायत मुख्यालय की दूरी कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, क्योंकि साधन और सड़कें पहले से बेहतर हैं। उनका तर्क है कि सरकार ने नया करने की चाहत में पुराने सिस्टम को बदलने का रास्ता चुना है, ताकि राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को नया रूप दिया जा सके। पूर्व अधिकारी और कई सामाजिक प्रतिनिधि इस पुनर्गठन को राजनीतिक गणित बताते हैं। उनके अनुसार जातीय समीकरण और आगामी चुनावों की तैयारी ने इस फैसले में प्रमुख भूमिका निभाई है। वे मानते हैं कि पंचायत मुख्यालय की दूरी अब कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, और इतनी बड़ी संख्या में नई पंचायतें प्रशासनिक बोझ बढ़ाएंगी। सरकार इसे विकेंद्रीकरण और सुगम प्रशासन का कदम बता रही है, जबकि आलोचक इसे खर्च बढ़ाने वाला निर्णय मान रहे हैं।



