



ग्राम सेतु ब्यूरो.
राजस्थान की 11 हजार से ज्यादा पंचायतों में कार्यकाल पूरा कर चुके सरपंच और पंच अब फिर से सक्रिय हो गए हैं। सरकार ने उन्हें पट्टे बांटने का अधिकार देकर एक तरह से पंचायतों की सत्ता फिर उनके हाथ में सौंप दी है। पंचायतीराज आयुक्त एवं सचिव जोगाराम की ओर से सभी जिला परिषदों को जारी चिट्ठी ने गांव-गांव में नई हलचल पैदा कर दी है। चिट्ठी के मुताबिक, राजस्थान पंचायती राज नियम, 1996 के प्रावधानों के तहत अब उन पंचायतों में, जिनका कार्यकाल समाप्त हो चुका है, निवर्तमान सरपंच को प्रशासक, और उपसरपंच व वार्ड पंचों को प्रशासकीय समिति के सदस्य बनाया गया है। यह कमेटी मिलकर पट्टा आवंटन का काम करेगी। यानी, कार्यकाल खत्म होने के बावजूद पुराने जनप्रतिनिधि अब भी गांवों में सरकारी जमीनों पर पट्टे बांट सकेंगे।

सरकार के इस फैसले के बाद पंचायतों में पट्टा वितरण अभियान जोर पकड़ने लगा है। प्रदेश में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए पहले से चल रहे सरकारी अभियानों में अब ये कमेटियां भी सक्रिय भूमिका निभाएंगी। लेकिन, आदेश जारी होते ही विवाद भी गहराने लगा है।

विरोधी धड़ा सवाल उठा रहा है कि पंचायत चुनावों से कुछ महीने पहले कार्यकाल पूरा कर चुके सरपंचों को इस तरह का अधिकार देना राजनीतिक रूप से संदिग्ध कदम है। विरोधियों का कहना है कि ‘प्रशासक’ के नाम पर ये कमेटियां गांवों में मनमाने तरीके से पट्टे बांट सकती हैं, जिससे चुनाव से पहले राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिशें तेज होंगी।

वहीं, समर्थक तर्क दे रहे हैं कि पंचायतों के कामकाज को ठप नहीं किया जा सकता। सरकार के अनुसार, प्रशासक और प्रशासकीय समिति को सीमित प्रशासनिक अधिकार देकर केवल लंबित कार्यों को निपटाने की सुविधा दी गई है।
फिलहाल, यह आदेश पंचायतों में सत्ता-संघर्ष का नया अध्याय खोल चुका है। एक ओर जहां निवर्तमान सरपंच पट्टे बांटने की तैयारी में जुट गए हैं, वहीं विपक्षी धड़े इसे चुनावी तोहफा और संभावित भ्रष्टाचार का रास्ता बता रहे हैं। अब देखना होगा कि गांवों में बांटे जा रहे पट्टे विकास का दस्तावेज बनेंगे या चुनावी हथियार।

