


डॉ. पीयूष त्रिवेदी.
‘जल ही जीवन’ कोई काव्यात्मक जुमला नहीं, जैविक सच्चाई है। पानी शरीर का ईंधन है, यह कोशिकाओं को जिंदा रखता है, टॉक्सिन बाहर निकालता है और अंगों की मशीनरी को चिकना चलाता है। लेकिन अगर पानी का एक गिलास जाते ही वॉशरूम की दौड़ लग जाती है, तो यह सुविधा नहीं, संकेत है। शरीर अक्सर शालीनता से नहीं, सीधे-सीधे चेतावनी देता है।
एक स्वस्थ व्यक्ति दिन में 3-5 लीटर पानी पीने पर हर 3-4 घंटे में पेशाब के लिए जा सकता है। कुल मिलाकर 5-7 बार जाना सामान्य माना जाता है। इससे अधिक बार जाना, खासकर रात की नींद तोड़ दे, तो इसे आदत समझकर टालना समझदारी नहीं है। नॉर्मल ब्लैडर 200 से 450 मिलीलीटर तक यूरिन रोक सकता है, अगर यह क्षमता बार-बार जवाब दे रही है, तो कहीं न कहीं गड़बड़ है।
मानसिक तनाव और थकान ब्लैडर को चिड़चिड़ा बना देते हैं। डायबिटीज में शरीर अतिरिक्त शुगर को मूत्र के रास्ते बाहर फेंकता है, इसलिए पेशाब बढ़ता है। यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन में जलन के साथ बार-बार पेशाब की जरूरत महसूस होती है। पुरुषों में प्रोस्टेट की समस्या रास्ता संकरा कर देती है। एडीएच हार्माेन की कमी शरीर को पानी रोकना नहीं सिखा पाती। ठंडे मौसम में भी किडनी फिल्ट्रेशन तेज हो जाता है, इसलिए सर्दियों में टॉयलेट ट्रिप बढ़ती है।
जब पानी पीते ही पेशाब आ जाए, जब बार-बार जाना दिनचर्या और नींद बिगाड़ दे, जब जलन, दर्द, बदबू या खून दिखे, या जब वजन तेजी से घट रहा हो, ये सब शरीर की भाषा में लिखी चेतावनियां हैं। अनदेखी मत कीजिए।
पहला कदम है नोटिस करना, कितना पानी, कितनी बार पेशाब। कैफीन और शराब ब्लैडर को उत्तेजित करते हैं, सीमित रखें। देर रात बहुत पानी पीना कम करें। डायबिटीज का टेस्ट करवाएं, पेशाब की जांच कराएं। अगर समस्या बनी रहे, तो डॉक्टर से मिलें। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा, दोनों में समाधान हैं, लेकिन निदान के बिना इलाज तीर चलाना है।
बार-बार यूरिन आना कभी-कभी सामान्य हो सकता है, पर जब यह पैटर्न बन जाए या नींद तोड़े, तो इसे शरीर का संकेत मानकर समय रहते जांच करानी चाहिए। पानी दोस्त है, पर शरीर का व्यवहार दर्पण। उसमें दिख रही दरारों को सजावट समझकर मत ढकिए, यही समझदारी है, यही सेहत।
-लेखक जाने-माने आयुर्वेद विशेषज्ञ हैं



