

ग्राम सेतु ब्यूरो.
शारदा सिन्हा और छठ पर्व जैसे एक-दूसरे के पूरक हैं। पूर्वांचल की भूमि से उठे इस त्योहार के आराधक-वलारी जब उगते सूर्य को मेघों के बीच निहारते हैं, तो उनके मन में उन रगों की मधुर धुन जाग उठती है जो शारदा सिन्हा के स्वर में बचपन से सुनी आ रही है। उनकी वाणी में ठहराव, भाव और लोक गीतों की मरस ऐसा मेल बांधती है कि छठि मइया-की भक्ति स्वर और सूर्यजी-को समर्पित व्रत-कथा भी एक संगीतात्मक मेले में परिवर्तित हो जाती है।
पूर्वांचल की कोश में बसी छठ की चार कड़ी, नहाय खाय, खरना, आरघा, बदह घट इनमें शारदा सिन्हा के गाए छठ गीत विशेष स्थान पाते हैं। उनके गीतों में प्रत्यक्ष रूप से धरती, जल-घाट, नदी-किनारा, सूर्य-देवता, व्रत की भक्तिमय शक्ति और परिवार-उन्नति की कामना प्रतिध्वनित होती है। शारदा सिन्हा ने कुल 62 छठ-गीत गाए हैं, जो नौ एल्बमों में रिलीज हुए।
आइए, शारदा सिन्हा के प्रमुख गीतों की कुछ बानगी पर नजर केंद्रित करते हैं, जिन्हें सुनकर श्रद्धालु अब भी विभोर हो उठते हैं….
-‘केलवा के पात पर उगेलन सुरुज मल झांके झुके’
-‘पहिले पहिल हम कइनी, छठी मइया व्रत तोहार’
-‘हो दीनानाथ…. ’
-‘सुनिह अरज छठी मइया’
-‘आदित मनाईल’
-‘ए करे लु छठ बरतिया से’
-‘उगह हे सुरज देव’
-‘बाँझी कवदवा ढहले था’
-‘जोड़े-जोड़े फलवा सुरुज देव’
इन गीतों में पंक्तियों के साथ हृदय भाव, लोक-स्वर और त्योहार-प्रेरणा की मधुर मेज़बानी है। शारदा सिन्हा की आवाज़ ने इन गीतों को सिर्फ भजन नहीं बनाया, बल्कि एक अनुभव-स्थान बनाया जहाँ पूर्वांचल-मूल के करोड़ों लोग छठ की पूजा-व्रत के बीच खुद को मिलते हैं। शारदा सिन्हा ने अपने लोक-स्वरों से यह संदेश दिया कि ‘परंपरा तभी जीवित रहती है जब हम उससे भाव से जुड़ें’। उनकी वाणी में छठि मइया के प्रति अटल श्रद्धा, पानी-घाट की शांति, सुरजदेव के सामने भेंट का उत्सव और उत्थान-कामना सब कुछ समाहित है।
इस प्रकार, छठ का गीत और शारदा सिन्हा का स्वर एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं, जहाँ छठी मइया का व्रत है, वहाँ उनके गीत हैं; जहाँ व्रतकर्ता का मन है, वहाँ उनकी आवाज़ है। त्योहार की रूपरेखा अगर सूर्य-आराधना, जल-घाट, परिवार-संगठन और श्रद्धा है, तो उनके गीत वहीं का संगीत बन उठते हैं। इस संयोजन ने पूर्वांचल-मूल के दिलों में शारदा सिन्हा को विराट स्थान दिया है, एक-साथ पूजा-गीत, लोक-धुन और मानव-भाव का संवहन।



