

डॉ. एम.पी. शर्मा
भारतीय साहित्य में कुछ रचनाएँ ऐसी होती हैं जो न केवल भाषा और भावों की सीमाओं को लांघती हैं, बल्कि लोकमानस को नई दृष्टि से देखने का साहस भी करती हैं। ऐसी ही एक कालजयी रचना है ‘लूना’, जिसे पंजाब के अमर कवि शिव कुमार बटालवी ने लिखा। यह न केवल एक काव्य नाटिका है बल्कि एक ऐसा महाकाव्य भी है जो लोकगाथा, विद्रोह, करुणा और नारी-वेदना का अभूतपूर्व संगम है। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और जम्मू क्षेत्र में सदियों से पूरण और लूना की लोकगाथा सुनाई जाती रही है। यह कथा कुछ यूँ है। राजा सलवान एक वृद्ध राजा है और उसकी युवा रानी लूना होती है, जिसकी उम्र मात्र 18 वर्ष है। लूना का चित्त अपने पति से नहीं जुड़ता। इसी दरबार में राजकुमार पूरण (या पूर्णचंद), राजा की पहली रानी से उत्पन्न पुत्र है, जो गुणवान, तेजस्वी और आध्यात्मिक प्रवृत्ति का युवक है।
लोकगाथाओं में लूना को एक खल चरित्र के रूप में प्रस्तुत किया गया। वह पूरण पर आसक्त हो जाती है, परंतु पूरण उसे ‘माँ’ कहकर संबोधित करता है। इस अपमान से तिलमिलाई लूना राजा से पूरण को दंड दिलवाती है। किंवदंती है कि देवी की कृपा से पूरण दंड से मुक्त हो जाता है और बाद में सिद्ध बन जाता है।

साहित्य अकादमी से सम्मानित शिव कुमार बटालवी ने इस कथा को नई दृष्टि दी। उन्होंने पहली बार लूना के दृष्टिकोण से कथा को प्रस्तुत किया। एक स्त्री जो अपने मन के भावों के लिए शापित है, जो यौवन में भी एक वृद्ध के साथ बाँध दी जाती है, जिसकी भावनाएँ कुचली जाती हैं, और जिसे समाज ने मात्र वासना की प्रतीक बना दिया।
‘लूना’ (1965) एक लंबी पंजाबी काव्य-नाटिका है, जिसमें शिव ने लूना की पीड़ा को आत्मा की आवाज़ बनाया। यह रचना मात्र नारी संवेदना की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि उस पितृसत्तात्मक समाज के प्रति प्रतिवाद है जो स्त्री की इच्छाओं, उसकी स्वतंत्रता और उसकी विवशताओं को नहीं समझता।
‘लूना’ की करुण पुकार मन को विभोर कर देता है। कवि कहता है,
जिथे वी लेख लिखे गए ने, ओथे मै अपने लहू नाल लिखी आ।
यानी जहाँ भी लेख लिखे गए हैं, वहाँ मैंने अपने लहू से लिखा है। यह पंक्ति बताती है कि ‘लूना’ केवल कल्पना नहीं, कवि के लहू से निकली संवेदना है। इसी तरह एक जगह कवि कहता है
मेरा जी लगदा ना राणियां विच, मेरे वांग किसे दी ज़िंद ना होवे!
यानी मुझे रानियों के बीच जीने में सुख नहीं, मेरी जैसी ज़िंदगी किसी की ना हो! दरअसल, लूना की गूंगी चीख, जिसे शिव कुमार ने शब्द दिए। एक रानी होते हुए भी वह सबसे ज्यादा अकेली थी। एक और पंक्ति देखिए….
मैं प्यार कीता सी, मेरा जुर्म एही सी।
यानी मैंने प्रेम किया था, यही मेरा अपराध था। यह पंक्ति सिर्फ लूना की नहीं, हर उस स्त्री की आवाज़ है जिसने प्रेम को चुना और समाज से सज़ा पाई। कुछ और पंक्तियां हैं जिनमें लूना के माध्यम से कवि ने नारी की पीड़ा का बखूबी चित्रण किया है।
मैं सिर्फ़ इक औरत हां, पर मेरे अंदर वी इक दिल है!
अर्थात मैं सिर्फ एक औरत हूँ, पर मेरे भीतर भी एक दिल है! इस पंक्ति में शिव ने नारी की मनोस्थिति को अत्यंत मार्मिकता से चित्रित किया। एक और पंक्ति देखिए..
कदे ना पछताओ मेरी क़ब्र दे कोल, मैं जिउंदी रही क़ब्रां विच ज़िंदगी भर।
मतलब, कभी मेरी क़ब्र के पास पछताना मत, मैं ज़िंदगी भर क़ब्रों में ही ज़िंदा रही हूँ। दरअसल, यह लूना की आत्मा की अंतिम पुकार है, जिसने जीते जी मृत्यु से बदतर जीवन जिया। इन पंक्तियों के माध्यम से शिव कुमार बटालवी ने साहित्य में न केवल एक नयी दृष्टि दी, बल्कि उन अनसुनी आवाज़ों को शब्दों का साहस भी दिया, जिन्हें समाज ने सदियों से दबा रखा था। इस रचना की भाषा में लोकगीतों की मिठास, पंजाबी संस्कृति की गंध, और युवा हृदय की तड़प है। इसमें श्रृंगार, करुण, विद्रोह और अध्यात्म सभी रस एक साथ प्रवाहित होते हैं। यह केवल प्रेम की कथा नहीं है, बल्कि एक स्त्री की आत्मा की पुकार है, जिसने सामाजिक अन्याय को सहा है।

1967 में शिव कुमार बटालवी को ‘लूना’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया। वह उस समय सिर्फ 28 वर्ष के थे, और इस प्रकार वे उस समय तक के सबसे युवा साहित्य अकादमी विजेता बन गए। यह उनकी रचना की शक्ति और विचार की नवीनता का प्रमाण था। आज जब हम स्त्री स्वतंत्रता, बाल विवाह, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, ‘लूना’ और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यह रचना हमें याद दिलाती है कि हर खलनायक की भी एक कहानी होती है। हो सकता है, वह पीड़ा से जन्मी हो।
शिव कुमार ने लोककथा के पारंपरिक ढाँचे को तोड़ते हुए एक ऐसा साहित्यिक स्तंभ रचा, जिसमें इतिहास, मनोविज्ञान, स्त्रीवाद और करुणा का संगम है। ‘लूना’ सिर्फ एक काव्य रचना नहीं, बल्कि एक स्त्री की कराहती आत्मा की आवाज़ है, जिसे सदियों तक गलत समझा गया। शिव कुमार बटालवी ने जिस साहस और करुणा के साथ इस लोकगाथा को नया जीवन दिया, वह उन्हें अमर कर गया।
आज भी जब कोई युवा हृदय प्रेम, विद्रोह, पीड़ा और सामाजिक जकड़ों के बीच जूझता है, तो उसे ‘लूना’ में अपनी आवाज़ सुनाई देती है। यह रचना भारतीय साहित्य का एक उज्ज्वल स्तंभ है और शिव कुमार की अमर कविता का प्रमाण।
-लेखक सामाजिक चिंतक, सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं


