



रामनवमी आते ही एक नाम गूंजता है, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम। दुर्भाग्य यह है कि समय और राजनीति के चक्रव्यूह ने इस विराट व्यक्तित्व को एक सीमित खांचे में कैद करने की कोशिश की है। कहीं उन्हें नारे में बदला गया, कहीं प्रतीक में, कहीं विवाद में। लेकिन राम इन सबसे बहुत बड़े हैं। राम जीवन जीने की पद्धति हैं। वे ग्रंथों में नहीं, व्यवहार में बसते हैं। अगर राम को सच में समझना है, तो मंदिर से बाहर, अपने आचरण के भीतर झांकना होगा।
निराला झा.
श्रीराम के जीवन में हर मोड़ पर विकल्प थे, सत्ता का, सुविधा का, स्वार्थ का। लेकिन उन्होंने वह चुना जो कठिन था, पर सही था। वनवास स्वीकार करना कोई मजबूरी नहीं थी, बल्कि वचन और व्यवस्था के प्रति सम्मान था। आज के समय में, जहां हर व्यक्ति ‘मेरे अधिकार’ की बात करता है, राम हमें ‘मेरे कर्तव्य’ की याद दिलाते हैं। बेहतर इंसान बनने की पहली शर्त यही है, संतुलन।
राम के रिश्ते आदर्श इसलिए नहीं हैं कि वे भावुक नहीं थे, बल्कि इसलिए कि वे भावनाओं से संचालित नहीं थे। पुत्र के रूप में आज्ञाकारी, भाई के रूप में उत्तरदायी, पति के रूप में प्रतिबद्ध और राजा के रूप में न्यायप्रिय। हर भूमिका में उन्होंने निजी इच्छा से ऊपर सामाजिक दायित्व रखा। आज का मनुष्य रिश्तों में सुविधा खोजता है; राम रिश्तों में जिम्मेदारी निभाते हैं। उनसे यह सीख मिलती है कि प्रेम का अर्थ सिर्फ अपनापन नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व भी है।
राम का न्याय कठोर नहीं, विवेकपूर्ण है। रावण से युद्ध करते समय भी वे उसे केवल शत्रु नहीं मानते, बल्कि एक विद्वान और योद्धा के रूप में सम्मान देते हैं। युद्ध के बाद विभीषण को गले लगाना, शत्रु-पक्ष में भी सत्य का सम्मान करना, यह राम का न्यायबोध है। आज जब असहमति को दुश्मनी मान लिया जाता है, राम सिखाते हैं कि न्याय और करुणा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। एक बेहतर इंसान वही है जो सत्य के साथ खड़ा रहे, लेकिन संवेदना छोड़े बिना।
राम का नेतृत्व आदेश देने वाला नहीं, उदाहरण प्रस्तुत करने वाला है। वे सेना के आगे चलते हैं, पीछे छिपते नहीं। वन में रहते हुए भी राजसी अहंकार नहीं, और अयोध्या के राजा बनकर भी साधारण जीवन। आज के नेतृत्व में अक्सर पद बड़ा होता है, लेकिन कद छोटा। राम हमें बताते हैं कि सच्चा नेतृत्व वही है जिसमें त्याग, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व हो। अगर हर व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्र में ‘राम जैसा’ नेता बन जाए, तो समाज खुद-ब-खुद सुधर सकता है।
राम का जीवन आसान फैसलों का नहीं, सही फैसलों का संग्रह है। सत्य बोलना, वचन निभाना, अन्याय का विरोध करना, ये सब सुविधाजनक नहीं होते। लेकिन राम यही करते हैं। आज के समय में जब ‘जुगाड़’ को बुद्धिमानी कहा जाता है, राम का जीवन विवेक की पाठशाला है। वे सिखाते हैं कि तात्कालिक लाभ नहीं, दीर्घकालिक मूल्य ही मनुष्य को ऊंचा उठाते हैं।
राम को अगर सच में मानना है, तो उन्हें पोस्टर, मंच या बहस से निकालकर अपने आचरण में उतारना होगा। वे मंदिर में पूज्य हैं, इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन वे जीवन में अनुकरणीय हों, यही उनके प्रति सच्ची भक्ति है। राम राजनीति से बड़े हैं, समय से परे हैं। वे हमें बेहतर हिंदू नहीं, बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देते हैं। और यही रामनवमी का असली अर्थ है, राम को याद करना नहीं, राम जैसा बनने का प्रयास करना।






