




ग्राम सेतु ब्यूरो.
हनुमानगढ़ में उच्च शिक्षा से जुड़े एक अहम मुद्दे पर सामाजिक संगठनों की चिंता खुलकर सामने आई है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के प्रस्तावित नए नियमों/विधेयक को लेकर सर्व ब्राह्मण महासभा, हनुमानगढ़ ने कड़ा विरोध जताते हुए इसे उच्च शिक्षा की आत्मा के खिलाफ बताया है। महासभा ने इन नियमों को जातिगत विभाजन को बढ़ावा देने वाला और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को प्रभावित करने वाला बताते हुए राष्ट्रपति के नाम एक विस्तृत ज्ञापन जिला कलेक्टर के माध्यम से प्रेषित किया। ज्ञापन में देशभर के शिक्षाविदों, छात्रों, अभिभावकों और जागरूक नागरिकों की गंभीर चिंताओं को समाहित करते हुए नियमों में तत्काल परिवर्तन की मांग की गई है।
प्रस्तावित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों/विधेयक में परिवर्तन की मांग को लेकर सर्व ब्राह्मण महासभा, हनुमानगढ़ की ओर से महामहिम राष्ट्रपति के नाम एक विस्तृत ज्ञापन जिला कलेक्टर के माध्यम से सौंपा गया। ज्ञापन में कहा गया है कि यूजीसी द्वारा प्रस्तावित नए नियम उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए नुकसानदायक साबित हो सकते हैं और इससे शिक्षा संस्थानों का वातावरण प्रभावित होने की आशंका है।

महासभा के जिलाध्यक्ष दुर्गा प्रसाद शर्मा ने कहा कि यूजीसी के प्रस्तावित नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत विभाजन को बढ़ावा दे सकते हैं। उन्होंने चिंता जताई कि इन नियमों से विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता कमजोर हो सकती है और शैक्षणिक निर्णयों में अनावश्यक हस्तक्षेप बढ़ेगा। उनका कहना था कि प्रस्तावित प्रावधान संविधान में निहित समानता, न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप प्रतीत नहीं होते।
महासभा ने यह भी तर्क दिया कि देश में पहले से ही भारतीय न्याय संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, एंटी-रैगिंग नियम तथा अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे सख्त कानून प्रभावी हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए अलग से नए जातिगत नियम लाने की आवश्यकता पर गंभीर पुनर्विचार होना चाहिए। महासभा का मत है कि कानून का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि भय और अविश्वास का वातावरण पैदा करना।
ज्ञापन में महासभा ने अपनी प्रमुख आपत्तियाँ विस्तार से दर्ज कराई हैं। महासभा का स्पष्ट मत है कि यदि किसी छात्र या व्यक्ति द्वारा जातिगत भेदभाव किया जाता है, तो उसके खिलाफ सख्त और प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी आवश्यक है कि झूठे अथवा दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाने वालों के विरुद्ध भी कठोर दंड का स्पष्ट प्रावधान नियमों में शामिल किया जाए। महासभा ने कहा कि नए नियमों में इस तरह के प्रावधानों का अभाव गंभीर चिंता का विषय है।
महासभा ने आशंका जताई कि प्रस्तावित नियमों की वर्तमान संरचना से सामान्य वर्ग को पहले से ही दोषी मानने की धारणा बन सकती है, जो न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है। इससे शिक्षा संस्थानों में भय, असुरक्षा और आपसी तनाव का माहौल बन सकता है। महासभा ने यह भी उल्लेख किया कि वर्ष 2012 से पूर्व लागू नियमों में झूठे आरोप सिद्ध होने की स्थिति में दंड या जुर्माने का स्पष्ट प्रावधान था, लेकिन नए नियमों में इसका उल्लेख नहीं किया गया है।
महासभा का कहना है कि शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान, समानता, समरसता और बौद्धिक विकास है। यदि नियमों के कारण छात्रों और शिक्षकों के बीच अविश्वास का वातावरण पैदा होता है, तो इससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और संस्थानों की प्रतिष्ठा दोनों प्रभावित होंगी। इसी कारण महासभा ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि प्रस्तावित नियमों की पुनर्समीक्षा कर सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित और न्यायसंगत संशोधन किए जाएं।
ज्ञापन सौंपने के दौरान सर्व ब्राह्मण महासभा और विभिन्न सामाजिक संगठनों के अनेक पदाधिकारी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे। इनमें जिलाध्यक्ष दुर्गा प्रसाद शर्मा, संरक्षक नरेंद्र सारस्वत, वरिष्ठ उपाध्यक्ष आशीष पारीक, पूर्व पार्षद महेश शर्मा, रामानंद बोहरा, संगठन महासचिव चंद्रभान तिवाड़ी, उपाध्यक्ष महेंद्र कुमार शर्मा, उपाध्यक्ष एडवोकेट मनोज शर्मा, युवा प्रकोष्ठ तहसील अध्यक्ष हिमांशु शर्मा, विधि सचिव भोजराज भार्गव, मूलचंद शर्मा, शंकरलाल शर्मा, खाण्डल विप्र समिति के अध्यक्ष विश्वमित्र शर्मा, उपाध्यक्ष पुरुषोत्तम कौशिक, झमनलाल पालीवाल, मनोहरलाल, सुशील जोशी, एडवोकेट अनिल शर्मा, पूनम शर्मा, भगवती प्रसाद, सतीश शर्मा, देवकीनंदन चोटिया, नोटरी हरिमोहन महर्षि, इंद्राज शर्मा, सतपाल सिंह, साहब राम शर्मा (अध्यक्ष, डबली पेमा), रतन लाल शास्त्री, वरिष्ठ एडवोकेट जितेंद्र सारस्वत, नवरत्न उपाध्याय, पवन बबेरवाल, एडवोकेट नरेश पारीक, विकास शर्मा (सतीपुरा), एडवोकेट दलीप सारस्वत, इंद्राज जोशी, राजाराम गौतम, सोमप्रकाश, चन्द्र प्रकाश जोशी, एडवोकेट विजेंदर शर्मा, मेघराज शर्मा, भूपेंद्र कौशिक, दीपेंदर कान्त जोशी, मनीष शर्मा, विनोद कुमार शर्मा सहित अन्य समाज के लोग मौजूद थे।
महासभा ने स्पष्ट किया कि जब तक प्रस्तावित नियमों में संतुलन और न्याय सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक उनका विरोध जारी रहेगा और इस मुद्दे को लोकतांत्रिक तरीके से हर मंच पर उठाया जाएगा।






